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पिता जी द्वारा उपहृत कविता

गुंजन जी तेरा जन्मदिन तुझे सालों-साल मुबारक हो
उम्र  तेरी दिन-रात चौगुनी , ये शुभ दिन विस्तारक हो
ध्यान से सुन मेरे 'गुंजन',ये कविता है उपहारों में
इसको तुम उपहार समझ कर,रखना ना गलियारों में
तेरा ये फूलों से जीवन,में हरदम हरियाली रहे
मर्यादा के भीतर तेरे खुशियों की दिवाली रहे
तू बन प्यारा कृष्णा-कन्हैया सबके नयनों का तारा
सुन्दर मति सुज्ञान के बूते बने रहो सबका प्यारा
बढ़ते रहना अपने पथ पर उज्वल निश्छल दिनकर सा
चलते रहना अपनी धुन में सरिता के स्वर अविरल सा
अपने क्रियाकलापों से ना मान घटे परिवारों की
ऐसी कोशिश रहे सदा की बढे कोष सुबिचारों की
अपने प्रियजन घरवालों का पल-पल अनुशासित रहना
अपने सुन्दर आचरणों से सबसे आह्लादित रहना
तेरी शिक्षा वैसी जैसी सूर्य किरण की तेज प्रभा
दृढ वाणी से झंकृत करना चुप हो जाए विद्व-सभा
धन प्रिय होता है धनवानों का और विद्या है विद्वानों का
लेकिन कहता सबसे पूंजी स्वाभिमान इंसानों का
कुछ भी कठिन नहीं है जग में गर सच्ची लगन के साथ बढ़ो
शुरू करो अपनी शिक्षा और उन ग्रंथों के पास रहो
शिक्षा की हो प्राप्ति वैसी जैसे हैं मेरे अरमान
अपनी मिहनत से ये होंगे पूरा कर देंगे भगवान
सच्चा वीर वही होता जो अपने पर रखता विश्वास
कभी नहीं खाता धोखा वह कभी नहीं उसका परिहास
तेरी छोटी तेरी "कीर्ती" ,तेरी वो गुडिया रानी
रहे स्नेह तुम दोनों का लच-लच हो तेरी वाणी
ऐ 'गुंजन' और 'कीर्ती' दोनों लेना माता का आशीष
वही श्रेष्ट हो सका है जिनको इन चरणों से मिलता सीख
मेरे इस छोटे तोहफे को अपने मन में बसा के रख
मैंने जो लिखा है उसको फूलों जैसे सजा के रख
इस शुभ अवसर पर मै लिखा,इन बातों का रखना ध्यान
बढ़े चलो मत पीछे देखो ऐसे ही बढ़ते इंसान
मै गरीब और दे क्या सकता,शिक्षा की ये दो-तीन बात
दुआ करूँ भगवान से मै,गुंजन शिक्षा से हो निष्णात
ऐसा कभी नहीं करना की मेरा मस्तक लज्जित हो
तू है मेरा नन्हा सैनिक तेरा बाग़ सुसज्जित हो
कभी ना डिगना अनुशासन से समय न देना ब्यर्थ बातों में
मेरी ओर से यही भेंट है ,रखना अपनी यादों में
तुम दोनों पर लगे आश हैं पूरा करना जीवन में
जीवन रण  है बड़ी कठिन,आगे रहना इस रण में|

लेखक :- डॉ. कमल मोहन चुन्नू

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चर्चित पोस्ट

तीनटा सम्बन्धपरक कविता

1. नानी

कतेको राग-उपरागक अछैतो
चुप्पे बिलहैत रहलै
अप्पन एकमात्र आमदनी
सूदिक पाइ
हम्मर माम सबहक भरण-पोषण मे,

मुदा
मामा लोकनि
भरित-पोषित भेलाक बाद
भ' गेलथिन एकात

मुदा
ताहि सँ कोनो खास फर्क नै पड़लैक
परिवर्तन बस यैह भेलैक जे
पहिले  खुअबैक पंचटकिया टॉफी
आ आब चारिअनिया लबनचूस,
चुप्पे, मामा सँ नुका कए
हम्मर ममियौत सब के,

मुदा
से कतेक दिन खुऔतैक
बुढ़िया पेलसिम मे
पाइये कतेक दैत छैक सरकार ?

2. दादी

अहाँक पक्का भुलकत रोइयाँ
जखन स्पर्श करत दादी
अहाँक हाथक कंगुरिया आँगुर के,
कियैक त' ई स्पर्श
सिर्फ ओकरे स्पर्श टा नहि छैक
ई दू शताब्दीक स्पर्श थिकैक
जकरा अंगेजने अछि दादी
अप्पन झूर-झमान भेल लटकल
मुदा दपदप करैत चमड़ी मे

दू शताब्दीक दू टा पीढ़ीक मिलान पर
ठाढ़ हेबा सँ पहिने
ओ रहैक एन-मेन हमरे-आहाँ सन,
ओकरो रहैक मनोरथ
जे बाबा आजीवन रखथिन्ह संग
आ ओहो हेतैक ताहि प्रवाह मे प्रवाहित
जाहि मे होइत छथि कोनो सामान्य स्त्रीगण
मुदा बाबा
से नै पुरौलथिन आस,
संग के कहय
अन्तिमों क्षण मे
नहि सामीप्य भेलैक प्राप्त,

आ ताहि दिन सँ दादी
भ' गेल अछि एसगर
मुदा ई बात कहैत नहि छैक ककरो
बेटा सब छथिन पढ़ल-लिखल
मुदा नहिए सन पढ़ि पबैत छथि दादी के

मुदा
दादी पढ़ैत छैक सबटा
दाद…

तीन टा मैथिली कविता - गुंजनश्री

1. रहना नहीं देश वीराना है

मीत !
कोना रहब पार लगैत अछि
ओहि नगर मे जाहि ठामक
सुरुज गछारल हो
मोन झमारल हो
किरण जे अबैत हो चानि पर
गिरहथ विर्त हो
लगेबा लेल ताहि पर
रंग-बिरंगक फिल्टर

झूर-झमान होइत लोक जतय
बाट तकैत हो दिन घुरि अयबाक,
झुझुआन होइत जाइ जतय
सरोकारक अनिवार्य मुदा हेराइत संस्कृति ,
लतखुर्दन कयल जाइत हो जतय
लोकतंत्रक सबटा गुण-धर्म
आ एहि सभ पर
मुस्की छिड़ियबैत हो सिंहासन
भाभाक हँसय ओकर चौदहो देबान,
कमला बलान मे संविधान केँ
दहा देबाक लेल रचल जाइत हो
नित-नव व्यूह,

एहि व्यूहरचनाक ओस्ताज सबहक नगर मे
कतेक दिन बाँचल रहि सकब हम-आहाँ मीत
चलू ने कोनो आन ठाम
जतय दिन
असगन्नी पर ओलरल नितुआन
मैल-कुचैल निरासि देल गेल अंगा सँ फराक
अपन अस्तित्व गढ़बाक व्योंत मे हो
आ राति
नढ़ियाक भूखब सुनबाक अभ्यस्त कानक रकबा सँ
अपना केँ एकात क'
चन्द्रमाक आभा मे नहयबाक सूर-सार करैत हो...


2. एना किएक करैत छलाह ओ ?
एहि शताब्दीक माथ पर अप्पन समस्त उर्जाक साक्षी राखि अपन आबय बला पीढ़ीक लेल करय चाहैत रहथि ओ एकटा दसखत जकरा देखि कहल जा सकैछ जे ई पुरखा छलाह हमर जे नहि अबडेरलाह कहियो कोनो राजनितिक क्षत-विक्षत नीति केँ
हुनका आजीवन…

मिशन भाइसाहेब : दू पड़ाव (संस्मरण) - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

पहिल पड़ाव : छाड़इत निकट नयन बह नीरे
साहित्यमे हमर प्रवेश भेल नाटक बाटे। प्रारम्भ हम नाटकेसँ कयल। पटनाक मैथिली रंगमंचसँ। प्रायः 1990-91 सँ। अभिनयक रुचि अवश्य छल मुदा से प्रधान नहि। नाटकक अन्य पार्श्व-सहयोगी तत्वसभ आकर्षित करैत छल। ताहूमे एकर संगीतपक्ष सर्वाधिक। नाटकक साहित्य आ संगीत दुनूक अपन-अपन भाषा छैक। एहि दुनूक अपन-अपन सौन्दर्य-प्रभावादि आ संगहि एहि दुनूक अंतर्सम्बन्ध हमरा बेर-बेर आकर्षित करैत छल। ग’र लगने किछु काजो करैत जाइ। गोटपगरा लोक प्रशंसो करथि। तहिया पटनाक मैथिलीओ रंगमंच बेस सक्रिय छल। एकर प्रदर्शन-क्रममे निरन्तरता छलैक। मैथिली रंगमंच आ एकर गतिविधिक प्रमुख केन्द्र विद्यापति भवन होइत छल। एतय रंगकर्मीलोकनिक जुटान नियमित भेल करय। हमहूँ पहुँचय लगलहुँ। मंचनमे प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग करय लगलहुँ। आ एहिये मंचनसभक दर्शक-दीर्घामे मैथिलीक समस्त साहित्यकारलोकनिकेँ देखय लगलहुँ।
श्री शरदिन्दु चौधरीजीसँ हमर सम्पर्क भेल। ओ ‘समय-साल’सँ हमरा जोडि़ लेलाह। यद्यपि समय-साल लेल हम बड़ बेसी नहि लिखलहुँ मुदा एकर उपलब्धि ई भेल जे नाटकसँ इतर एकटा नव साहित्यिक बाट देखबा जोग भेल। विभिन्न आयोजनसभमे डोरिया…