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तीन हिंदी कविताएँ

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1. समीना
हम तुम मारे जाएंगे समीना !
निश्चित ही होगी हत्या हमारी  मैं पंडित होकर भी होना चाहता हूँ तुम्हारा और तुम भी साथ होना चाहती हो मेरे इसका अंत इस से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता कि  मारे जाएंगे अंततः हमदोनों,
हो सकता है कि तुम्हारे परिजनों के चाकू मेरे गर्दन को जब धीरे-धीरे सहलायें तो मुझे उस वक्त याद आयेगी तुम्हारी मदहोश कर देने वाली आवाज़ में  वो गज़ल "हुजूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता" जिसे अपने एकांत क्षण में कॉलेज कैम्पस के पिछली चारदीवारी के उस पार गंगा की खुली बाहों में घंटों बैठकर कहा-सुना करते थे हमदोनों,
और हो तो ये भी सकता है कि  तुम्हें याद आये मेरी कोई ऐसी कविता  जिसको सुनाते वक़्त अक्सर झिझकता रहता था मैं ठीक उस वक्त  जब मेरे सम्बन्धी तुम्हें राह में घेरकर बार-बार बलत्कृत कर रहे होंगे,
किसी छोटी सी बात को बड़ा बनाने की कोशिश में जब मैं हार जाता हूँ तुम्हारे स्नेहपूर्ण तर्क से तो चेहरा उतर जाता है मेरा और कहती हो तुम- "हारी तो पी के संग" इसका कोई मोल नहीं होगा समीना  हमारे तुम्हारे परिजनों की आँखों में,
याद है कई बार हॉस्टल के मेरे रूम में महज़ छोटी-छोटी बातों पर मेरे कई तकियों को असमय …

नाटक चलिये रहल छैक...

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जँ समुच्चा ग्लोब केँ एकटा रंगमंच मानी त' देखा पड़ैछ जे सबठाम नाटके चलि रहल अछि। सब व्यस्त अछि नाटके मे। सब नटकीया। सब ओस्ताज। घमासान एहि केँ जे 'बड़ा नाटकीया के !', मुदा एहि नाटक मे जे नहि तय क' पबैत छी हम वा आहाँ से छैक 'स्क्रिप्ट'। हमरा अहाँक जे स्क्रिप्ट लीखि रहलाह अछि तकरा पर हम आ अहाँ खेलाइत रहैत छी पटाक्षेप तक चलय वला एकटा अंतहीन नाटक। जेना-जेना जीवनक नाटक चलैत छैक तेना-तेना चलैत छी हम आ आहाँ। 

मुदा हम आ आहाँ एकटा आर नाटक करैत छी जे दर्शकक लेल होइत अछि। आ एहि नाटक मे होइत छैक खगता कतेको सरंजामक। प्रायः करितो छी हमरालोकनि। लेकिन कतेक ठाम हूसि जाइत छी। ई हूसब जँ सब सँ बेसी ककरो दीक करैत छैक त' ओ छथि दर्शक। आ जँ दर्शकके नहि त' नाटक कत्त' पाबी। पटनाक मैथिली रंगमंच एखन लगभग एहि सब दिकदारीक सामना क' रहल अछि। आइ जखन की समस्त वैश्विक रंगमंच प्रयोग केँ आधार मानि नित-नित नव-नव प्रयोग क' अप्प्पन रंगमंच आ रंगकर्म केँ माँजि रहल अछि, ठीक ताहि क्षण पटनाक मैथिली रंगमंच आ रंगकर्म अपना केँ रखने अछि ओतय जतय ई कम सँ कम दस-पंद्रह बर्ख पहिने छल। हमरा जनतबे नाट…