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Showing posts from August, 2018

तीन हिंदी कविताएँ

1. समीना
हम तुम मारे जाएंगे समीना !
निश्चित ही होगी हत्या हमारी  मैं पंडित होकर भी होना चाहता हूँ तुम्हारा और तुम भी साथ होना चाहती हो मेरे इसका अंत इस से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता कि  मारे जाएंगे अंततः हमदोनों,
हो सकता है कि तुम्हारे परिजनों के चाकू मेरे गर्दन को जब धीरे-धीरे सहलायें तो मुझे उस वक्त याद आयेगी तुम्हारी मदहोश कर देने वाली आवाज़ में  वो गज़ल "हुजूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता" जिसे अपने एकांत क्षण में कॉलेज कैम्पस के पिछली चारदीवारी के उस पार गंगा की खुली बाहों में घंटों बैठकर कहा-सुना करते थे हमदोनों,
और हो तो ये भी सकता है कि  तुम्हें याद आये मेरी कोई ऐसी कविता  जिसको सुनाते वक़्त अक्सर झिझकता रहता था मैं ठीक उस वक्त  जब मेरे सम्बन्धी तुम्हें राह में घेरकर बार-बार बलत्कृत कर रहे होंगे,
किसी छोटी सी बात को बड़ा बनाने की कोशिश में जब मैं हार जाता हूँ तुम्हारे स्नेहपूर्ण तर्क से तो चेहरा उतर जाता है मेरा और कहती हो तुम- "हारी तो पी के संग" इसका कोई मोल नहीं होगा समीना  हमारे तुम्हारे परिजनों की आँखों में,
याद है कई बार हॉस्टल के मेरे रूम में महज़ छोटी-छोटी बातों पर मेरे कई तकियों को असमय …

नाटक चलिये रहल छैक...

जँ समुच्चा ग्लोब केँ एकटा रंगमंच मानी त' देखा पड़ैछ जे सबठाम नाटके चलि रहल अछि। सब व्यस्त अछि नाटके मे। सब नटकीया। सब ओस्ताज। घमासान एहि केँ जे 'बड़ा नाटकीया के !', मुदा एहि नाटक मे जे नहि तय क' पबैत छी हम वा आहाँ से छैक 'स्क्रिप्ट'। हमरा अहाँक जे स्क्रिप्ट लीखि रहलाह अछि तकरा पर हम आ अहाँ खेलाइत रहैत छी पटाक्षेप तक चलय वला एकटा अंतहीन नाटक। जेना-जेना जीवनक नाटक चलैत छैक तेना-तेना चलैत छी हम आ आहाँ। 

मुदा हम आ आहाँ एकटा आर नाटक करैत छी जे दर्शकक लेल होइत अछि। आ एहि नाटक मे होइत छैक खगता कतेको सरंजामक। प्रायः करितो छी हमरालोकनि। लेकिन कतेक ठाम हूसि जाइत छी। ई हूसब जँ सब सँ बेसी ककरो दीक करैत छैक त' ओ छथि दर्शक। आ जँ दर्शकके नहि त' नाटक कत्त' पाबी। पटनाक मैथिली रंगमंच एखन लगभग एहि सब दिकदारीक सामना क' रहल अछि। आइ जखन की समस्त वैश्विक रंगमंच प्रयोग केँ आधार मानि नित-नित नव-नव प्रयोग क' अप्प्पन रंगमंच आ रंगकर्म केँ माँजि रहल अछि, ठीक ताहि क्षण पटनाक मैथिली रंगमंच आ रंगकर्म अपना केँ रखने अछि ओतय जतय ई कम सँ कम दस-पंद्रह बर्ख पहिने छल। हमरा जनतबे नाट…

तीनटा सम्बन्धपरक कविता

1. नानी

कतेको राग-उपरागक अछैतो
चुप्पे बिलहैत रहलै
अप्पन एकमात्र आमदनी
सूदिक पाइ
हम्मर माम सबहक भरण-पोषण मे,

मुदा
मामा लोकनि
भरित-पोषित भेलाक बाद
भ' गेलथिन एकात

मुदा
ताहि सँ कोनो खास फर्क नै पड़लैक
परिवर्तन बस यैह भेलैक जे
पहिले  खुअबैक पंचटकिया टॉफी
आ आब चारिअनिया लबनचूस,
चुप्पे, मामा सँ नुका कए
हम्मर ममियौत सब के,

मुदा
से कतेक दिन खुऔतैक
बुढ़िया पेलसिम मे
पाइये कतेक दैत छैक सरकार ?

2. दादी

अहाँक पक्का भुलकत रोइयाँ
जखन स्पर्श करत दादी
अहाँक हाथक कंगुरिया आँगुर के,
कियैक त' ई स्पर्श
सिर्फ ओकरे स्पर्श टा नहि छैक
ई दू शताब्दीक स्पर्श थिकैक
जकरा अंगेजने अछि दादी
अप्पन झूर-झमान भेल लटकल
मुदा दपदप करैत चमड़ी मे

दू शताब्दीक दू टा पीढ़ीक मिलान पर
ठाढ़ हेबा सँ पहिने
ओ रहैक एन-मेन हमरे-आहाँ सन,
ओकरो रहैक मनोरथ
जे बाबा आजीवन रखथिन्ह संग
आ ओहो हेतैक ताहि प्रवाह मे प्रवाहित
जाहि मे होइत छथि कोनो सामान्य स्त्रीगण
मुदा बाबा
से नै पुरौलथिन आस,
संग के कहय
अन्तिमों क्षण मे
नहि सामीप्य भेलैक प्राप्त,

आ ताहि दिन सँ दादी
भ' गेल अछि एसगर
मुदा ई बात कहैत नहि छैक ककरो
बेटा सब छथिन पढ़ल-लिखल
मुदा नहिए सन पढ़ि पबैत छथि दादी के

मुदा
दादी पढ़ैत छैक सबटा
दाद…