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तीन हिंदी कविताएँ

1. समीना

हम तुम मारे जाएंगे समीना !

निश्चित ही होगी हत्या हमारी 
मैं पंडित होकर भी होना चाहता हूँ तुम्हारा
और तुम भी साथ होना चाहती हो मेरे
इसका अंत इस से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता कि 
मारे जाएंगे अंततः हमदोनों,

हो सकता है कि तुम्हारे परिजनों के चाकू
मेरे गर्दन को जब धीरे-धीरे सहलायें
तो मुझे उस वक्त याद आयेगी
तुम्हारी मदहोश कर देने वाली आवाज़ में 
वो गज़ल
"हुजूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता"
जिसे अपने एकांत क्षण में
कॉलेज कैम्पस के पिछली चारदीवारी के उस पार
गंगा की खुली बाहों में
घंटों बैठकर कहा-सुना करते थे हमदोनों,

और हो तो ये भी सकता है कि 
तुम्हें याद आये मेरी कोई ऐसी कविता 
जिसको सुनाते वक़्त अक्सर
झिझकता रहता था मैं
ठीक उस वक्त 
जब मेरे सम्बन्धी तुम्हें राह में घेरकर
बार-बार बलत्कृत कर रहे होंगे,

किसी छोटी सी बात को बड़ा बनाने की कोशिश में
जब मैं हार जाता हूँ तुम्हारे स्नेहपूर्ण तर्क से
तो चेहरा उतर जाता है मेरा और कहती हो तुम-
"हारी तो पी के संग"
इसका कोई मोल नहीं होगा समीना 
हमारे तुम्हारे परिजनों की आँखों में,

याद है कई बार हॉस्टल के मेरे रूम में
महज़ छोटी-छोटी बातों पर
मेरे कई तकियों को असमय शहीद कर दिया था तुमने,
मैंने कई बार कोशिश की थी कि तुम्हें बताऊँ
कि मेरी दादी ने दिये थे मुझे वो तकिये
जब मैं गाँव छोड़कर 
पहली बार शहर आया था
लेकिन नहीं बता सका,
जानती हो क्यों ?
क्योंकि मुझे बेहद प्रिय लगता था 
तुम्हारे चेहरे पर इठलाता वो हसीन झूठा गुस्सा,

मगर मैं नहीं जान सका था कि
हम दोनों को देनी होगी अपनी-अपनी जान
अपने प्रेम को गढ़ने में,

जानती हो समीना 
आजकल सबसे सस्ता होता है 
किसी की जान ले लेना,
और इस तरह सस्ते में निपट गए हम दोनों,

सुनो !
इस समय जब कि जी रहे हैं हम दोनों
अपने-अपने हिस्से की मृत्यु,
मुझे बहुत याद आ रही हो तुम समीना,
मुझे पता है तुम्हें भी हो रहा होगा
ऐसा ही कुछ-कुछ...


2. गुलों में रंग भरे..

अपनी प्रेमिकाओं से मिलने से पहले 
जिन्हें होती है बिछुड़ने की घबराहट
उनके लिए कहना है कि
उन्माद आवश्यक होता है प्रेमी के लिए,

और उन्माद का क्या है
किसी के ​भी ​आँगन को 
कभी भी महका सकता है
ठीक वैसे ही जै​सा​ अब​के 
महका है मेरा आँगन

जब सूखे होंठों के रंग बदलकर सुर्ख होने लगेंगे
एक बार बस जीभ फेर देने से,
जब आखों के बीच से झाँकेंगी
परिवर्तन करने और होने की कशमकश,
तब बहार के आँखों में आँखें डालकर
बाहर से भीतर तक परिवर्तनशील होकर
चिल्लायेगी अपनी प्यासी माटी
तब मैं सबसे नज़र बचाकर कहूंगा तुमसे
कनफुसकी के क्रम में -
'क्रांति एक रंग है जानाँ ​
मैं चाहता हूँ कि अबकी
इसी रंग से खेलूँ तुम्हारे संग
ताकि भींग सके तुम्हारी चिर-प्रतीक्षित इच्छा और 
अंत हो सके ​मेरे ​अंधकारमय युग का...

3. उसने कहा था

उसने कहा था मुझे जाना है छोड़कर तुम्हें
मैंने उसपर लिखी अपनी सारी कविताएँ फाड़ दी,

उसने कहा 
मुझे लड़ना है तुमसे
मैंने उसे अपनी कविताओं के पात्र में खड़े होने दिया
और वे पात्र 
लगातार लड़ते रहे हैं मुझसे,

उसने कहा 
बदला लेना चाहती हूँ
मैंने अपनी एक दीर्घ कविता के अंत में लिखा-
'मृत्यु एक जंग है आत्मा के ख़िलाफ़'

उसने कहा 
मुझे फिर लौट आना है तुम्हारे पास
विस्मृत होने की क्रिया से ठीक पहले
मैं अब पूरी करने बैठ गया हूँ
उसके नाम की अपनी कई अपूर्ण कविताएँ...

Gunjan Shree
कवि - गुंजनश्री 

Comments

चर्चित पोस्ट

तीनटा सम्बन्धपरक कविता

1. नानी

कतेको राग-उपरागक अछैतो
चुप्पे बिलहैत रहलै
अप्पन एकमात्र आमदनी
सूदिक पाइ
हम्मर माम सबहक भरण-पोषण मे,

मुदा
मामा लोकनि
भरित-पोषित भेलाक बाद
भ' गेलथिन एकात

मुदा
ताहि सँ कोनो खास फर्क नै पड़लैक
परिवर्तन बस यैह भेलैक जे
पहिले  खुअबैक पंचटकिया टॉफी
आ आब चारिअनिया लबनचूस,
चुप्पे, मामा सँ नुका कए
हम्मर ममियौत सब के,

मुदा
से कतेक दिन खुऔतैक
बुढ़िया पेलसिम मे
पाइये कतेक दैत छैक सरकार ?

2. दादी

अहाँक पक्का भुलकत रोइयाँ
जखन स्पर्श करत दादी
अहाँक हाथक कंगुरिया आँगुर के,
कियैक त' ई स्पर्श
सिर्फ ओकरे स्पर्श टा नहि छैक
ई दू शताब्दीक स्पर्श थिकैक
जकरा अंगेजने अछि दादी
अप्पन झूर-झमान भेल लटकल
मुदा दपदप करैत चमड़ी मे

दू शताब्दीक दू टा पीढ़ीक मिलान पर
ठाढ़ हेबा सँ पहिने
ओ रहैक एन-मेन हमरे-आहाँ सन,
ओकरो रहैक मनोरथ
जे बाबा आजीवन रखथिन्ह संग
आ ओहो हेतैक ताहि प्रवाह मे प्रवाहित
जाहि मे होइत छथि कोनो सामान्य स्त्रीगण
मुदा बाबा
से नै पुरौलथिन आस,
संग के कहय
अन्तिमों क्षण मे
नहि सामीप्य भेलैक प्राप्त,

आ ताहि दिन सँ दादी
भ' गेल अछि एसगर
मुदा ई बात कहैत नहि छैक ककरो
बेटा सब छथिन पढ़ल-लिखल
मुदा नहिए सन पढ़ि पबैत छथि दादी के

मुदा
दादी पढ़ैत छैक सबटा
दाद…

तीन टा मैथिली कविता - गुंजनश्री

1. रहना नहीं देश वीराना है

मीत !
कोना रहब पार लगैत अछि
ओहि नगर मे जाहि ठामक
सुरुज गछारल हो
मोन झमारल हो
किरण जे अबैत हो चानि पर
गिरहथ विर्त हो
लगेबा लेल ताहि पर
रंग-बिरंगक फिल्टर

झूर-झमान होइत लोक जतय
बाट तकैत हो दिन घुरि अयबाक,
झुझुआन होइत जाइ जतय
सरोकारक अनिवार्य मुदा हेराइत संस्कृति ,
लतखुर्दन कयल जाइत हो जतय
लोकतंत्रक सबटा गुण-धर्म
आ एहि सभ पर
मुस्की छिड़ियबैत हो सिंहासन
भाभाक हँसय ओकर चौदहो देबान,
कमला बलान मे संविधान केँ
दहा देबाक लेल रचल जाइत हो
नित-नव व्यूह,

एहि व्यूहरचनाक ओस्ताज सबहक नगर मे
कतेक दिन बाँचल रहि सकब हम-आहाँ मीत
चलू ने कोनो आन ठाम
जतय दिन
असगन्नी पर ओलरल नितुआन
मैल-कुचैल निरासि देल गेल अंगा सँ फराक
अपन अस्तित्व गढ़बाक व्योंत मे हो
आ राति
नढ़ियाक भूखब सुनबाक अभ्यस्त कानक रकबा सँ
अपना केँ एकात क'
चन्द्रमाक आभा मे नहयबाक सूर-सार करैत हो...


2. एना किएक करैत छलाह ओ ?
एहि शताब्दीक माथ पर अप्पन समस्त उर्जाक साक्षी राखि अपन आबय बला पीढ़ीक लेल करय चाहैत रहथि ओ एकटा दसखत जकरा देखि कहल जा सकैछ जे ई पुरखा छलाह हमर जे नहि अबडेरलाह कहियो कोनो राजनितिक क्षत-विक्षत नीति केँ
हुनका आजीवन…

मिशन भाइसाहेब : दू पड़ाव (संस्मरण) - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

पहिल पड़ाव : छाड़इत निकट नयन बह नीरे
साहित्यमे हमर प्रवेश भेल नाटक बाटे। प्रारम्भ हम नाटकेसँ कयल। पटनाक मैथिली रंगमंचसँ। प्रायः 1990-91 सँ। अभिनयक रुचि अवश्य छल मुदा से प्रधान नहि। नाटकक अन्य पार्श्व-सहयोगी तत्वसभ आकर्षित करैत छल। ताहूमे एकर संगीतपक्ष सर्वाधिक। नाटकक साहित्य आ संगीत दुनूक अपन-अपन भाषा छैक। एहि दुनूक अपन-अपन सौन्दर्य-प्रभावादि आ संगहि एहि दुनूक अंतर्सम्बन्ध हमरा बेर-बेर आकर्षित करैत छल। ग’र लगने किछु काजो करैत जाइ। गोटपगरा लोक प्रशंसो करथि। तहिया पटनाक मैथिलीओ रंगमंच बेस सक्रिय छल। एकर प्रदर्शन-क्रममे निरन्तरता छलैक। मैथिली रंगमंच आ एकर गतिविधिक प्रमुख केन्द्र विद्यापति भवन होइत छल। एतय रंगकर्मीलोकनिक जुटान नियमित भेल करय। हमहूँ पहुँचय लगलहुँ। मंचनमे प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग करय लगलहुँ। आ एहिये मंचनसभक दर्शक-दीर्घामे मैथिलीक समस्त साहित्यकारलोकनिकेँ देखय लगलहुँ।
श्री शरदिन्दु चौधरीजीसँ हमर सम्पर्क भेल। ओ ‘समय-साल’सँ हमरा जोडि़ लेलाह। यद्यपि समय-साल लेल हम बड़ बेसी नहि लिखलहुँ मुदा एकर उपलब्धि ई भेल जे नाटकसँ इतर एकटा नव साहित्यिक बाट देखबा जोग भेल। विभिन्न आयोजनसभमे डोरिया…