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Showing posts from January, 2019

रोग (कथा) - अजित आजाद

-‘चान पर घर बनतै। घरमे लोक रहतै। लोक मुदा कतयसँ आओत? कोना केँ आओत?’ मिसरजी चिन्तामे। यादवजी चिन्तामे। खान साहेब सेहो चिन्तामे। तीनू वैज्ञानिक चिन्तामे।

यादवजी मौन तोड़लनि। कहलनि- ‘लोक आओत धरतीसँ। जेना हमसभ अएलहुँ।’

खान साहेबकेँ सेहो फुरेलनि। कहलनि- ‘लोक आओत यानसँ। जेना हमसभ अएलहुँ।’

मिसरजीमे कोनो हलचल नहि। हुनक चिन्ता नहि कमलनि।

खान साहेब अचरजमे। यादवजी सेहो अचरजमे। दुनू संगे बजलाह- ‘मिसरजी ?’

मिसरजीक भक् टुटलनि। बजलाह- ‘से तँ बुझलहुँ। मुदा पहिने के आओत? के सभ आओत? के बिन परिवारक आओत? के हित-महिम संग आओत?’

खान साहेब फेरीमे। यादवजी सेहो फेरीमे। मिसरजीक कहब उचित! पहिने के आओत? ककर परिवार आओत? आओत कि नहि आओत? एकर समाधान की?

एक बेर फेर मौन। तीनू कात तकैत। समाधान तकबामे अपस्याँत।

कातमे चन्द्रयान ठाढ़ छल। यान-तिरंगा सन छल। तीन रंगक। लाल, उज्जर आ’ हरियर। तीनू रंग तीन खाढ़ीमे। बीचला खाड़ीमे चक्र। जे देखत से कहत,यान भारतक थिक। एहि पर तिरंगा बनल छैक। मुदा तीनू वैज्ञानिक अलग। हिनका सभक पोशाक सफेद। जेबी लग तिरंगा बनल। माथ पर टोपा। टोपासँ तीनूक नाक झँपाएल। तीनूक कान झँपाएल। तीनूक मुह झँपाए…

उपेन्द्र ठाकुर ‘मोहन’क काव्यपक्ष (संदर्भ- बाजि उठल मुरली) - आलोचना - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

कोनहु विशेष संदर्भ मे कोनहु कवि किंवा हुनक कविताक प्रसंग विचार करबाकाल कविक रचना, विचार आ हुनक वैचारिक वक्तव्य तीनू महत्वपूर्ण होइत अछि। कविक वैचारिके स्थिति अपन विभिन्न अनुकूल अंगोपांगक संग अन्यान्य दैशिक-कालिक सहयोगी स्थितिक आश्रय ग्रहण करैत, शिल्प-शैली-भाषा प्रभृति तत्वसभक समर्थन पाबि कविताक रूप धारण करैत अछि। रचना-प्रक्रियाक शृंखलाक रूप मे एकरा एहि प्रकारे सेहो कहल जा सकैत अछि जे कविक व्यक्तित्वेक अपवर्तित रूप अछि कविक विचार आ एहिए विचारक अपवर्तित रूप अछि कविता। कविक वैचारिक स्थिति हुनक कविताक पृष्ठभूमि-भावभूमिक निर्माणक एकटा प्रमुख तत्व अछि। जीवन-जगतक अंतर्बाह्य अनुभव सभ जखन कविक मोन मे विचाररूप मे आलोडि़त होइत अछि तखने कविता-बीजक सम्भावना प्रबल भ’ जाइत अछि। 
काव्य आ कविता, दुनू शब्दक प्रयोग मे बरू एकटा बेस मेहींए सन, पातरे सन सही मुदा अन्तर अवश्य अछि। मात्र छन्दोबद्ध रचनाक लेल ‘पद्य’ शब्दक प्रयोगक उचित, मुदा ‘कविता’ शब्द पद्य सँ ऊँच स्थितिक द्योतक अछि। यद्यपि व्यापक रूप मे छन्दोबद्ध रचनामात्रक लेल ‘कविता’ शब्दक प्रयोग होइछ, मुदा संकीर्ण अर्थ मे, विशेष क’ आधुनिककाल मे ‘कविता’ श…

सिमान केँ दुरुस्त करैत कविता- डॉ. कमल मोहन चुन्नू

ठोस प्रश्न ई नहि जे कविता गामक अछि आ कि शहरक अर्थात् कविताक केन्द्रीय कक्ष मे गाम अछि किंवा शहर। ठोस प्रश्न ई होइछ जे ओहि गाम आ कि शहरक कविता मे जीवन कतेक अछि, जीवन सँ कविताक कतेक सम्पृक्ति छैक, संघर्ष सँ कतेक संयुक्त छैक। जीवनक तत्व कविताक जीवित रहबाक प्रमाण बनैछ आ संघर्षक तत्व कविताक जागृत रहबाक। अभिप्राय जे कविता केँ ने त’ मृत होयब अपेक्षित आ ने निस्तेज होयब अभीष्ठ। कविताक मृत होयब आ निस्तेज होयब प्रकारान्तर सँ पर्यायवाचीए बूझल जाइछ। स्तुतिगान, विरुदावली, गुण-कीर्तन, अतीतमुग्धता, दया-कृपाकांक्षा आदि तत्व मृत कविताक प्रमुख लक्षण गनल जा सकैछ संगहि जनपक्षीय सरोकार, नव चेतना, आधुनिकता-बोध, आक्रोश, असहमति, प्रगतिशीलता, प्रतिरोध, व्यंग्य, संघर्ष प्रभृति तत्व केँ कविताक जीवन-पक्षक लक्षण मानल जा सकैछ। कविता मे जीवन-तत्वक रूप-चित्रदि कविक जीवन-जगत सम्बन्धी अनुभव पर निर्भर करैछ। कविताक भूस्पर्शीय प्रवृत्ति जतेक ठोस होयत, कविता ततेक प्रखर होयत, तेजोमय होयत। वायवीय कविता किंवा अज्ञात लोकक यात्र करैत-करबैत रहबा लेल कृत संकल्पित कविता सँ आमजन आ कि सर्वहारा सभक सम्बन्ध-सरोकार शीघ्रहि समाप्त भ’ ज…

मिशन भाइसाहेब : दू पड़ाव (संस्मरण) - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

पहिल पड़ाव : छाड़इत निकट नयन बह नीरे
साहित्यमे हमर प्रवेश भेल नाटक बाटे। प्रारम्भ हम नाटकेसँ कयल। पटनाक मैथिली रंगमंचसँ। प्रायः 1990-91 सँ। अभिनयक रुचि अवश्य छल मुदा से प्रधान नहि। नाटकक अन्य पार्श्व-सहयोगी तत्वसभ आकर्षित करैत छल। ताहूमे एकर संगीतपक्ष सर्वाधिक। नाटकक साहित्य आ संगीत दुनूक अपन-अपन भाषा छैक। एहि दुनूक अपन-अपन सौन्दर्य-प्रभावादि आ संगहि एहि दुनूक अंतर्सम्बन्ध हमरा बेर-बेर आकर्षित करैत छल। ग’र लगने किछु काजो करैत जाइ। गोटपगरा लोक प्रशंसो करथि। तहिया पटनाक मैथिलीओ रंगमंच बेस सक्रिय छल। एकर प्रदर्शन-क्रममे निरन्तरता छलैक। मैथिली रंगमंच आ एकर गतिविधिक प्रमुख केन्द्र विद्यापति भवन होइत छल। एतय रंगकर्मीलोकनिक जुटान नियमित भेल करय। हमहूँ पहुँचय लगलहुँ। मंचनमे प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग करय लगलहुँ। आ एहिये मंचनसभक दर्शक-दीर्घामे मैथिलीक समस्त साहित्यकारलोकनिकेँ देखय लगलहुँ।
श्री शरदिन्दु चौधरीजीसँ हमर सम्पर्क भेल। ओ ‘समय-साल’सँ हमरा जोडि़ लेलाह। यद्यपि समय-साल लेल हम बड़ बेसी नहि लिखलहुँ मुदा एकर उपलब्धि ई भेल जे नाटकसँ इतर एकटा नव साहित्यिक बाट देखबा जोग भेल। विभिन्न आयोजनसभमे डोरिया…