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मैथिल फाल्केक प्रसूति-व्यथा: मॉलीवुडक आह्वान - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

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मैथिली मे त’ आब कएक टा सिनेमा बनि गेल अछि। घुसकुनियाँ कटैत ई क्रम चलितो रहत से कहल जा सकैत अछि। एकर गुणवत्ता आ निर्माणक बहस होइते रहत आ तकर अछैत मैथिली अपन किछु घबाह आशावादक संग ‘रील लाइफ’क यात्र तय करिते रहत। मुदा मैथिलीक फिल्म निर्माणक 50 वर्ष होइतहुँ ई एकटा कर्णचुम्बी आँकड़ा सँ बेसी किछु नहि कायम भ’ रहल अछि। मैथिलीक गीतनादक मंच पर रवीन्द्र-महेन्द्रक जोड़ी सुविख्यात रहल अछि। कहल जाइत अछि जे रवीन्द्रजी गीत लिखथि, महेन्द्रजी तकर धुन बनाबथि आ स्वर सेहो देथि। यद्यपि ई धुन आ स्वरबला स्थापना आइ कएक वर्ष सँ हमरा मान्य नहि भ’ रहल अछि। महेन्द्रजीक संगीतज्ञान सँ त’ आइयो असहमते छी मुदा स्वर अवश्य नीक छलनि। जे-से। त’ तहिया सुनियैक जे रवीन्द्र-महेन्द्र ‘ममता गाबए गीत’ नामक एकटा सिनेमा बनौने छलाह। कएक बेर त’ स्वयं महेन्द्रजी सेहो ई बात बाजल करथि आ लगले एहि फिल्मक गीत- ‘अर्र बकरी घास खो’ आ कि ‘माता जे विराजै मिथिले देश मे’ प्रभृति गाबियो देथि। लोक एकरा ‘बाबा वाक्ये प्रमाणम्’ बूझि मानियो लेल करय। दू दशक सँ बेसीए धरि हमहूँ एहि भ्रम मे पड़ल रहलहुँ। जखन केदारनाथ चौधरीक टटका पोथी ‘अबारा नहितन’ पढ़लहुँ…

प्रेमक रेखागणित (कथा) - श्याम दरिहरे

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‘‘तों हमर आब केन्द्रविन्दु बनि गेल छें।’’

‘‘आऽ तों हमर की बनि गेल छें ?’’

‘‘हम छी बनि गेल तोहर परिधि। चारु दिससऽ तोरा आवृत कएने।’’

‘‘तखन हमर तोहर एकठाम हैब कोना संभव अछि संदीप ? तों हमर परिधि बनल चारुभर घुमैत रहबें आ हम केन्द्र बनि निश्चल अपन स्थानमे सटल रहब। तखन तऽ भेल प्रेमक सबटा गुड़ गोबर।’’ रेखा बाजलि।

‘‘न्न ! से कोना हेतैक गुड़ गोबर। एखन हमर बनाबट पूरा कहाँ भेलए। तों केन्द्र बनल रहबें आ हम परिधि बनि प्रेमक त्रिज्यासऽ जुड़ैत रहब। तों जखन रेसीप्रोकेट करबें तखन दुनू त्रिज्या मिलि व्यास बनि जेतैक आ प्रेम पूर्ण भऽ जेतैक प्रिये रेखा मैडम।’’ संदीप कहलकैक आ दुनूकेँ हँसी लागि गेलैक।

‘‘से व्यास तऽ कहिआ ने बनि गेलौ तखन आइ एतेक फेकि किए रहल छें। सेहो छौ एकदम खाँटी मैथेमेटिकल फेक।’’ रेखा हँसिते हँसिते कहलकैक।

‘‘गलत एकदम गलत। एक तऽ हम ई फेकि नइ रहल छी ई तऽ अछि हमर प्रेमक अभिव्यक्ति। दोसर जे ई हमर मैथेमेटिकल नहि बल्कि तोहर सेवामे जेओमेट्रिकल अभिव्यक्ति अछि मैडम।’’ संदीप कहलकैक।

फेर दुनू गोटाकेँ हँसी लागि गेलैक।

‘‘जेओमेट्रिकल अभिव्यक्ति प्रेममे बेसी कारगर होइत छैक।’’ संदीप बाजल।

‘‘से कोना ?’’ रेखा बिहुँसत…

फगुआ: मिथिला-मैथिलक गर्व-पर्व - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

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समस्त मानव समुदाय हेतु पाबनि-तिहारक एकटा विशेष महत्व अछि। एकटा खास तरहक जीवन शैलीमे दीर्घकाल धरि रचैत-बसैत लोकक मनः स्थितिमे एक प्रकारक श्रांति आबि जाइत छैक जे कि जीवनक आनो प्रभागके प्रभावित करय लगैत छैक। एहि श्रांति (थाकनि) के पुनर्गति प्रदान करबाक हेतु मानवक जीवन शैलीमे उत्सवक व्यवस्था धराओल गेल अछि। ई उत्सव आ कि पाबनि तेहार अपन विभिन्न रूप-प्रतिरूपसँ हमरा सभक जीवन आ ओकर गतिके समृद्ध करैए। उत्सव-पर्वादिक आनंदोत्सव आ विरहोत्सव नाम सँ दू टा मुख्य प्रभाग भ’ सकैए जकरा सांस्कृतिक, साहित्यिक, धार्मिक, शैक्षिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि रूपमे सेहो पुनर्विभाजित कयल जा सकैए। फगुआ सेहो एकटा एहने उत्सव अछि जे अपन सांस्कृतिक- ऐतिहासिकादि महत्व लए एकटा प्रसिद्ध पर्व अछि। सब पाबनिक संग कोनो विशेष घटना अवश्ये रहैत अछि। फगुओक संग कएक रंगक घटना जुड़ल अछि। श्रीमद्भागवत महापुराणक सातम स्कन्धक जय-विजय, हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यपु, प्रह्लादिक कथासँ प्रारंभ होइत अछि जाहिमे हिरण्यकश्यपु अपन भगवद्भक्त पुत्र प्रह्लाद भगवद्विमुख नहि क’ सकला सन्ताँ ओकरा मृत्युदंड सुना, मारबाक कतेको यत्न करैत अछि मुदा ओ नहि…