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Showing posts from March, 2019

तीन टा मैथिली कविता - गुंजनश्री

1. रहना नहीं देश वीराना है

मीत !
कोना रहब पार लगैत अछि
ओहि नगर मे जाहि ठामक
सुरुज गछारल हो
मोन झमारल हो
किरण जे अबैत हो चानि पर
गिरहथ विर्त हो
लगेबा लेल ताहि पर
रंग-बिरंगक फिल्टर

झूर-झमान होइत लोक जतय
बाट तकैत हो दिन घुरि अयबाक,
झुझुआन होइत जाइ जतय
सरोकारक अनिवार्य मुदा हेराइत संस्कृति ,
लतखुर्दन कयल जाइत हो जतय
लोकतंत्रक सबटा गुण-धर्म
आ एहि सभ पर
मुस्की छिड़ियबैत हो सिंहासन
भाभाक हँसय ओकर चौदहो देबान,
कमला बलान मे संविधान केँ
दहा देबाक लेल रचल जाइत हो
नित-नव व्यूह,

एहि व्यूहरचनाक ओस्ताज सबहक नगर मे
कतेक दिन बाँचल रहि सकब हम-आहाँ मीत
चलू ने कोनो आन ठाम
जतय दिन
असगन्नी पर ओलरल नितुआन
मैल-कुचैल निरासि देल गेल अंगा सँ फराक
अपन अस्तित्व गढ़बाक व्योंत मे हो
आ राति
नढ़ियाक भूखब सुनबाक अभ्यस्त कानक रकबा सँ
अपना केँ एकात क'
चन्द्रमाक आभा मे नहयबाक सूर-सार करैत हो...


2. एना किएक करैत छलाह ओ ?
एहि शताब्दीक माथ पर अप्पन समस्त उर्जाक साक्षी राखि अपन आबय बला पीढ़ीक लेल करय चाहैत रहथि ओ एकटा दसखत जकरा देखि कहल जा सकैछ जे ई पुरखा छलाह हमर जे नहि अबडेरलाह कहियो कोनो राजनितिक क्षत-विक्षत नीति केँ
हुनका आजीवन…

समकालीन मैथिली कथा मे उपेक्षित वर्ग- डा.राजाराम प्रसाद

‘समकालीन कथा’, ‘कहानी’ आ ‘समांतर कथा’ एक मानल गेल अछि। समकालीन कथा मे कोनो नव आ स्पष्ट विभाजनक रेखा नहि खिंचल जा सकैछ। ‘समकालीन’ शब्द सँ ‘नव’ ‘समसामयिक’, ‘आधुनिक’ वा ‘वर्त्तमान’क क्रियात्मक बोध होइत अछि। दोसर शब्द मे इहो कहल जा सकैछ जे-‘‘समकालीन अर्थात् ‘अद्यतन’, ‘अधुनातन’, ‘अत्याधुनिक’ तथा ‘नवता’ आदि। कखनहुँ-कखनहुँ समकालीन कथा कहानीक स्थान पर ‘सचेतन’ कहानी ‘सहज’ कहानी तथा ‘अ-कहानी’ सेहो कहल गेल अछि। किन्तु एहिमे सँ कोनहु पर्याय द्वारा समकालीनताक सम्यक् स्पष्टकीरण नहि होइछ।’’ ‘समकालीन कथा साहित्यमे समष्टि चेतना’ आलेखमे डॉ- अणिमा सिंह लिखने छथि। ‘समकालीनताक समर्थक लोकनिक आग्रह छनि जे समकालीन कथा सँ एहन कथाक अर्थ-ग्रहण कएल जाय जकर रचना हाल मे भेल हो आओर जाहिमे तत्कालीन जीवनानुभूतिक तटस्थ चित्रण हो।’ एहि रूप मे एहि शब्दक चर्चा तथा स्थिति केँ वर्त्तमान विचारक लोकनि वर्त्तमान शतीक सप्तम दशकक उत्तरार्द्धहिक अवदान मानैत छथि किन्तु एतय शंका ई उठैत जे आइ जकरा ‘समकालीन कथा’ कहल जाइत छैक तकरा कालान्तर मे अतीत कथा वा पूर्वकालीन कथा’ कहल जेतैक आओर तकर स्थान पर तत्कालीन समकालीनता-सम्पन्न कथा आबि ज…

बनैत-बिगड़ैत देश आ सुकान्त सोमक कविता- डॉ. तारानंद वियोगी

सुकान्त सोम मैथिलीक एक विरल कवि छथि, आ हुनका कविता पर बात करब मैथिली काव्येतिहासक एक दुर्लभ अध्याय पर बात करब थिक। मुदा, एहि मे समस्या छैक जे अपन कवि-निर्मिति पर, अपना सोचक काव्य-परिदृश्य पर आ कि अपन कविता-प्रतिमान पर हुनकर अलग सं कोनो लेखन नहियेक बराबर हमरा लोकनि लग उपलब्ध अछि। दोसर, सुकान्त सन विद्रोही साधक-कवि पर जाहि व्यापकताक संग समीक्षा-विचार हेबाक चाही, से नहि भ' सकल अछि। तेसर, मुख्यधाराक हिन्दी पत्रकारिता मे पछिला तमाम बरस ओ ततेक मुखर-प्रखर रहला जे हुनकर यशस्वी पत्रकारक छवि तर मे हुनकर ई दुर्लभ कवि पिचाएल आ नुकाएल रहि गेल अछि।

सुकान्त कें पढ़बा काल हुनकर पहिल जाहि विशेषता पर सब सं पहिने ध्यान जाइत अछि, से ई जे अपन कविता सब मे ओ बेर बेर कविता कें परिभाषित करैत चलैत छथि। 'कविता लेल एकटा कविता' आदिक तं शीर्षके स्वयं सैह अछि, बांकी बहुतो ठाम अवसर एला पर अथवा अवसर ताकि क' ओ ई काज करैत छथि। अपन कविताक बारे मे हुनकर ख्याल छनि जे ई 'मनुक्खक कविता' थिक जे 'एकटा सार्थक आ सामरिक चुप्पीक संग शुरू होइत अछि।' अपन कवि-कर्मक चिन्हासय दैत कहैत छथि जे हम 'अहा…