तीन टा मैथिली कविता - गुंजनश्री

1. रहना नहीं देश वीराना है

मीत !
कोना रहब पार लगैत अछि
ओहि नगर मे जाहि ठामक
सुरुज गछारल हो
मोन झमारल हो
किरण जे अबैत हो चानि पर
गिरहथ विर्त हो
लगेबा लेल ताहि पर
रंग-बिरंगक फिल्टर

झूर-झमान होइत लोक जतय
बाट तकैत हो दिन घुरि अयबाक,
झुझुआन होइत जाइ जतय
सरोकारक अनिवार्य मुदा हेराइत संस्कृति ,
लतखुर्दन कयल जाइत हो जतय
लोकतंत्रक सबटा गुण-धर्म
आ एहि सभ पर
मुस्की छिड़ियबैत हो सिंहासन
भाभाक हँसय ओकर चौदहो देबान,
कमला बलान मे संविधान केँ
दहा देबाक लेल रचल जाइत हो
नित-नव व्यूह,

एहि व्यूहरचनाक ओस्ताज सबहक नगर मे
कतेक दिन बाँचल रहि सकब हम-आहाँ मीत
चलू ने कोनो आन ठाम
जतय दिन
असगन्नी पर ओलरल नितुआन
मैल-कुचैल निरासि देल गेल अंगा सँ फराक
अपन अस्तित्व गढ़बाक व्योंत मे हो
आ राति
नढ़ियाक भूखब सुनबाक अभ्यस्त कानक रकबा सँ
अपना केँ एकात क'
चन्द्रमाक आभा मे नहयबाक सूर-सार करैत हो...


2. एना किएक करैत छलाह ओ ?

एहि शताब्दीक माथ पर 
अप्पन समस्त उर्जाक साक्षी राखि
अपन आबय बला पीढ़ीक लेल
करय चाहैत रहथि ओ एकटा दसखत
जकरा देखि कहल जा सकैछ जे
ई पुरखा छलाह हमर
जे नहि अबडेरलाह कहियो
कोनो राजनितिक क्षत-विक्षत नीति केँ

हुनका आजीवन अपने घाह सन लगैत रहलनि
ओहि देशक चुबैत घाह
जकरा खोंचारैत रहल
एहि दुनियाँ एकटा बड़का मालिक,

ओ निसदिन गबैत रहलाह अपन पराती मे 
ओहि समस्त लोक केँ
जे जीबाक हिआओ नै हारलक कहियो,

हुनका मोन पड़थिन्ह उठैत-बैसैत
लड़ैत ओ दीप्त लोक जे
आजीवन लड़ैत रहलाह  
लोकक लेल

जखन आदतन बहरा जानि मुँह सँ-
'दुनियाँ केँ  किछु लोक आ राष्ट्र 
बलत्कृत क' रहलैक अछि बेर-बेर'
आ फेर अपना केँ सम्हारबाक
निष्फल प्रयास मे
झक-झक करैत ललाट
नितुआन भ' जाइन्ह,

फेर ओ चिचियाइत छलाह खूब जोर सँ
कांचे निन्न मे
कोनो कविक एकटा पाँति-
"एहि जीयब सँ नीक लड़ि
आ लड़िूते- लड़िूते शेष भ जाइ"

एना किएक करैत छलाह ओ ?

3. ऊँटी यात्राक क्रम मे..

ट्रेनक खिड़की बाटे
दौड़ैत-पड़ाइत ई खेत-पथार, बाध-बोन,
जाहि मे मिझ्झर अछि एकटा संसार
एहि संसार मे तकैत रहलहुँ अछि हम
कतेको बर्ख सँ अहाँ केँ

एहि ललौन माटि केँ देखि
चुप्पे-चाप सब सँ नुका क'
कनेक छुबि क' देखितियैक
जे हमरा गामक नवकी पोखरिक
चारूकात पसरल लालजमइ बाधक माटि
आ एहि माटि मे की छैक अंतर
छइहो आ की वएह उड़ि आएल अछि 
आ हमर अबैया सुनि
पसरि गेल अछि
आ छेकि लेने अछि
एहि ठामक समुच्चा धरती केँ गहे-गह,

ई हमर गाम नहि थिक
आ ने ई रस्ता हमरा गाम जाइत अछि
तखन किएक झीकि रहल अछि
ई ललौन माटि हमरा एतेक तीव्रता सँ एखन,

देखियौक ने
एहि ललौन माटि पर
ठाम-ठाम फुलायल-लजायल
ई चम्पई रंगक फूल
लगैत अछि हमरा अपना गामक
ओहि दुरगमनियाँ कनियाँ सन
जे लाजे कठौत भ' गेल रहथि ओहि दिन
जहिया ओ पहिले-पहिल पएर रखने रहथि हमरा गाम मे
आ देखने रहथि
अपना पर पड़ैत सहस्त्रो आँखि
आँखि मे मारितेरास प्रश्न
प्रश्न मे आशंका
आशंका मे गछारल भविष्य


आ भविष्य त' अछि एहि चम्पई रंगक फूल सन
जे एखन हमरा सोझाँ कठौत भेल अछि
हमर एकटा नान्हिटा स्पर्श भरि सँ,

एहि दौड़ैत-पड़ाइत सृष्टिक मध्य
जे किछु चीज ठमकल अछि
ताहि मे प्रमुख छी हम
जे ठामक-ठामहि ठमकल अछि
जहपटार होइत एकटा गीतक भास बनि
बेर-बेर उठैत अछि, छहलैत अछि
आ पसरि जाइत अछि
एहि संसारक ग'हे-ग'ह मे,
फेर एहि संसारक ग'हे-ग'ह सँ
उठैत अछि एकटा नाद
जे क्रमशः एकटा विकल आर्तनाद मे बदलि रहल अछि
आइ कतेको बर्ख सँ,
एहि कारुणिक आर्तनाद मे
भासि रहल अछि देश-दुनियाँ
बिला रहल अछि लोक अपना भीतर सँ
हेरा रहल अछि हम अपना च'र-चाँचड़ सँ

आउ ने मीत
एक बेर फेर एकरा बचएबाक अछि
हमरा-अहाँक संग मीलि
एकटा नव संसार बनएबाक अछि…

गुंजन श्री

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2 Comments

सुन्दर सन रचना के लेखनी सँ जन मानष के बिच उतारी कअ हर्षित होयबाक मौका अपने द्वारा भेटल।
लाजवाब रचना अछि।।।