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समकालीन मैथिली कथा मे उपेक्षित वर्ग- डा.राजाराम प्रसाद

‘समकालीन कथा’, ‘कहानी’ आ ‘समांतर कथा’ एक मानल गेल अछि। समकालीन कथा मे कोनो नव आ स्पष्ट विभाजनक रेखा नहि खिंचल जा सकैछ। ‘समकालीन’ शब्द सँ ‘नव’ ‘समसामयिक’, ‘आधुनिक’ वा ‘वर्त्तमान’क क्रियात्मक बोध होइत अछि। दोसर शब्द मे इहो कहल जा सकैछ जे-‘‘समकालीन अर्थात् ‘अद्यतन’, ‘अधुनातन’, ‘अत्याधुनिक’ तथा ‘नवता’ आदि। कखनहुँ-कखनहुँ समकालीन कथा कहानीक स्थान पर ‘सचेतन’ कहानी ‘सहज’ कहानी तथा ‘अ-कहानी’ सेहो कहल गेल अछि। किन्तु एहिमे सँ कोनहु पर्याय द्वारा समकालीनताक सम्यक् स्पष्टकीरण नहि होइछ।’’ ‘समकालीन कथा साहित्यमे समष्टि चेतना’ आलेखमे डॉ- अणिमा सिंह लिखने छथि। ‘समकालीनताक समर्थक लोकनिक आग्रह छनि जे समकालीन कथा सँ एहन कथाक अर्थ-ग्रहण कएल जाय जकर रचना हाल मे भेल हो आओर जाहिमे तत्कालीन जीवनानुभूतिक तटस्थ चित्रण हो।’ एहि रूप मे एहि शब्दक चर्चा तथा स्थिति केँ वर्त्तमान विचारक लोकनि वर्त्तमान शतीक सप्तम दशकक उत्तरार्द्धहिक अवदान मानैत छथि किन्तु एतय शंका ई उठैत जे आइ जकरा ‘समकालीन कथा’ कहल जाइत छैक तकरा कालान्तर मे अतीत कथा वा पूर्वकालीन कथा’ कहल जेतैक आओर तकर स्थान पर तत्कालीन समकालीनता-सम्पन्न कथा आबि जेतैक। आओर ई चक्र-नेमिक्रम यदि एहि रूपेँ चलैत रहैक तखन तँ ई स्वतः प्रमाणित भ’ जाइछ जे समकालीन शब्द एक कालवाचक विशेषण मात्र थीक, एकरा द्वारा साहित्यक कोनहु आन वैशिष्ट्यक अथवा प्रकृतिक बोध नहि होइत अछि। एहि दृष्टियेँ विद्यापति आओर चन्दा झा सेहो कहियो समकालीन छलाह। एहि प्रकारेँ समकालीनता एक प्रक्रिया मात्र रहि जाइछ।’’ डा- रमाकान्त झा समकालीन कथा-साहित्यक कथ्य पर विचार करैत कहैत छथि।‘आजुक कथामे वातावरण एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्यक प्रधानता छैक। कथातत्व तथा घटनाक स्थान ल’ लेलकैक अछि मनःस्थितिक विवृति, कथ्य ओ प्रभाव। पात्रे आजुक कथामे साधन रूपमे ग्रहण कैल जाइछ। आजुक कथामे गतिक क्षिप्रता, शैलीक सांकेतिकता ओ प्रभावक स्पष्टता विशेष गुण अछि, बुझल जाइछ।’

समकालीन कथा आधुनिकताक वृत्त अछि। उक्त संदर्भ मे डा- शिवशंकर झा ‘कान्त’ अपन आलेख-‘मैथिली कथामे आधुनिक बोध’ मे व्यक्त केलनि अछि-आधुनिक मैथिली कथा, कविताक बाद सभ सँ समुन्नत विधा अछि। सिद्धान्त एवं व्यवहार, प्रयोग आ प्रचलन, चिन्तन आ अभिव्यक्ति एहि सभक एकत्र रूप कथा मे, नवीन रूप मे भेटैत अछि। कथाकार समाज सँ जर्जर, टूटल, आक्रान्त ओ भयपूर्ण, भावुक वर्ण्य-वस्तु लए ओही समाज केँ अपन कथा दैत छथि जाहि मे जोड़ैत छथि ओ समकालीन व्यक्तिवादी चिन्तन, जकर प्रभाव समष्टियुत् छैक तथा मनोविश्लेषण, जे समाज स्वयं नहि पबैत अछि।’’

श्री सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी समसामयिक वा समकालीन कथा विधाक परिवेश-प्रसंगात्मक कथ्य छनि-विशेष समयक परिधि सामाजिक वातावरणसँ सामग्री ल’ जे जीवन्त कथा लिखैत अछि से समसामयिक कथाकार थिक आ जकर कथा समयक जीवनकेँ आत्मसात् कयने रहैत अछि सैहटा समसामयिक कथा थिकैक। ‘समकालीन मैथिली कथा-साहित्य तँ समाजक सीमा युद्धरत गुरिल्ला लड़ाईक समान थिक जे एक भाग व्यक्ति केँ प्रधानता द’ रहल अछि तँ दोसर भाग समसामयिक परिस्थिति केँ एहि कसौटीक आधार पर जतय मैथिली मे ‘नोवेल्स ऑफ मैनर्स’क हेतु उपजाऊ भाव-भूमि कहल जा सकैछ ततए कहानी केँ प्रमुखता भेटलैक। एकरा अन्तर्गत सम्पूर्ण सामाजिक वस्तु सत्यक अन्तर्गत मानवक द्वन्दक, तनाव आशा-आकांक्षा केँ अपना मे समेटबाक प्रयास कएल गेलैक।’’ मैथिली समकालीन कथामे सामाजिक यथार्थ’ प्रसंग डा. प्रेमशंकर सिंह’क उक्त धारणा छनि। वर्त्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य मे समकालीन कथा केँ गहणता सँ चिन्तन करबाक आवश्यकता अछि। हिन्दी कथा-साहित्यक प्रख्यात साहित्यकार डा. विनय समकालीन कहानीक मूल प्रवृत्ति सभक प्रसंग लिखलनि अछि-‘थोड़ बहुत परिवर्त्तनक संग सभ कथाकार ‘अस्मिताक संकट’ (क्राइसिस ऑफ आइडेंटिटी)क मूल केँ पकडि़ एकांतिकता, समाजधर्मिता आओर सम्बन्धहीनता एवं अन्तर्द्वन्द्वक जटिलता आओर संघर्षमे जूझैत मानक नियति केँ व्यक्त क’ रहल अछि।’’

जहाँ धरि समकालीन मैथिली कथा-साहित्य मे उपेक्षित वर्गक चित्रक प्रश्न अछि ओ हमरा जनैत ओकर छवि, ओकर चित्रित रूप, ओकर सजीव आ विस्तृत वर्णन। जकरा कहैत छी उपेक्षितवर्ग, निम्नवर्ग, सर्वहारा। मोटा-मोटी एहि शब्द मे कहल जाए जे उच्चवर्ग एवं मध्यमवर्ग जकाँ आधुनिक जीवनक सुख-सुविधा सभ केँ जे सामाजिक वर्ग नहि भोगि पबैत अछि ओकरा उपेक्षित वा निम्नवर्ग कहल जाइत अछि। आर्थिक धरातल पर गाम तथा शहर दुहु मे जन्म लेनिहार नवीन वर्गीय समाजक अधिकांश उपेक्षित निम्नवर्ग मे अबैत अछि। एहि वर्ग मे विशेषतः छोट आ गरीब खेतिहर किसान, जन-बोनिहार मजदूर एवं आर्थिक दृष्टिएँ असहाय आओर सभ तरहेँ लचरल लोक अबैछ। एहि वर्गक लेल मार्क्सवादी चिंतन मे ‘सर्वहारा’ शब्दक प्रयोग भेल अछि। मार्क्सक एहन धारणा रहल अछि जे आधुनिक पूँजीवादी समाज जाहि विशाल सर्वहारा मजदूर वर्गक शोषण करैत अछि वैह पुरान दास आओर श्रमिक लोकनिक नव रूप अछि। व्यवहारतः एकरा सभक विभिन्न स्तर सभक चेतना मे भिन्नता होइछ। विशेष केँ भारतीय समाज मे निश्चित रूपेँ चालीस प्रतिशत अवश्ये निम्न उपेक्षित वर्गक सदस्य अछि, जे अपन रोटी, कपड़ा आर मकानक लेल संघर्षरत रहैत अछि। विशेषतः उपेक्षित निम्नवर्ग अशिक्षित आ अंधविश्वासी होइत अछि।

मैथिली कथाक मौलिक युग मे प्रवेश कएलाक उपरान्त अगणित कथाकार द्वारा एहि दिशा मे प्रयोग होइत रहल, जाहि मे समाजक विभिन्न समस्यामूलक चित्रक उद्घाटन ओ तकर समाधानक सत्प्रयास भेल। उन्नैसम शताब्दीक अन्तधरि मैथिली मे आधुनिकताक बसात बह’ लागल छल। समकालिक सामाजिक परिवेश सँ गृहीत पात्र, घटना, मनोवृत्ति आदि पर केन्द्रित रहि विकासोन्मुख चलि आबि रहल अछि। तहियो ओकर रचनात्मक कथाक स्वरूप समकालीन छलैक। आइयो ई रचनात्मक कथा-विधा समकालीन कथा मे प्रगणित होइत अछि। तहियोक कथाक भाव-भूमि, पात्र, परिवेश, घटनादिक चित्र विशेषतः उपेक्षिते वर्ग पर आधारित रहैत छल। आजुक कथा मे सेहो बहुतांश कथासभक भाव-भूमि, पात्र, परिवेश, घटना आदिक मुख्य पात्र-पात्रीक रूप मे प्रतिनिधित्व निम्न उपेक्षित वर्ग करैत अछि। समकालीन मैथिली कथा-साहित्यक क्षेत्र मे आजुक परिवेश मे बहुतो कथाकार अनेक विलक्षण आ अविस्मरणीय कथा सभक रचना क’ रहल अछि जकर मूल स्वर थिक युग ओ जीवनक यथार्थ चित्र आ चित्रण जे समकालीन मैथिली कथा विकास मे सर्वाधिक सहायक भेल अछि। ओना मैथिली कथा-साहित्य मे निबद्धि केँ देखबा मे अबैछ जे पूर्व सँ ल’ केँ आइ धरि कथाकार लोकनिक द्वारा विशेषतः उपेक्षित वर्ग केँ अपन कथाक पात्र बनबैत आबि रहल अछि। ई हमरा जनैत एकटा प्रश्न ठाढ़ क’ दैत अछि समस्त कथाकार लोकनिक समक्ष। ई ओहने सन बुझि पडि़ रहल अछि जेना कि एहि कोठीक धान दोसर कोठी मे हेरा-फेरी कएला सँ लोक केँ आत्मसंतुष्टि मात्र होइत छनि। अपना मोन केँ ओ नीक जकाँ पतिया लैत छथि। वास्तव मे कोनो साहित्य किएक ने हो, ओ समदर्शी होइत अछि। मुदा जँ ओकरा मे विभिन्न विधाक समिश्रण सँ मुक्त वृत्त बनाओल जाए त’ निश्चितरूपेण ओकर स्वाद-सुस्वादु भ’ जएतैक। ओही तरहेँ एकरा मे सामान्य रूपेँ सभ वर्गक भाव, भूमिक चित्र-चित्रण होइत रहय त’ कथा-साहित्य एकभग्गु नहि होयत। खाहे ओ पूर्ववर्ती कथा साहित्य हो वा समकालीन।

आजुक कथा साहित्य परिदृश्य मे एक तरहेँ एमहर त’ कहल जाए जे समकालीन कथा साहित्य मे निम्न उपेक्षित वर्गक पात्रक संख्या मे बाढि़ सदृश बढ़ोतरी भेल अछि। संगहि ओकर चित्र आ चरित्र केँ उपस्थापित करबा मे होड़ मचि गेल अछि। उदाहरणस्वरूप निम्न कथाकारक उक्त संग्रह मे व्याप्त उपेक्षित वर्गक चित्र देखल जा सकैछ- धीरेन्द्र नाथ मिश्रक कथासंग्रह-‘अग्निपरीक्षा’ मे संगृहीत कथा ‘विवशता’ मे दम्पति सुकना-सुकनी उपेक्षित वर्गक पात्र अछि। सुकना-सुकनीक कलह आ ओकर लाभ उठाक’ असामाजिक लोक जग्गू सिंह द्वारा सुकनीक यौन-शोषण होइछ।

‘काठ’ विभूति आनन्दक कथा संग्रहमे वर्णित निम्न उपेक्षित वर्गक चित्र ‘जानवर’ कथामे चित्रित कएल गेल अछि। बौका, बेटा, महिन्द्रा, स्त्री बसैठाबाली अर्थात ओकर सभक पारिवारिक रहन-सहन, बाजब-भूकब, खाएब-पीब, गाम-टोल आदिक चित्र-चित्रित अछि। बाप बौका द्वारा नुकाए केँ भुल्ला सुगरक बच्चा टुनमा केँ माल-जालक हुडि़ लेल बेचब परिस्थिजन्य ओहि ऊहापोहक स्थितिक चित्र नीक जकाँ एहि कथा मे देखबा मे अबैछ।

‘संकल्प’मे प्रकाशित कथाकार डा- राजाराम प्रसाद’क कथा ‘मेघ लागल आकाश’क पात्र छबिलाल उपेक्षित निम्नवर्गक पात्र चौकीदार अछि। ओ इमनदार आ कर्त्तव्यनिष्ठ अछि। ओकरा मे राष्ट्रक प्रति समर्पित भाव छैक, ओकर मे जनसेवा कूटि-कूटि केँ भरल छैक। छबिलालक उक्ति-‘ई जे पुल उड़ा देबहक तै सँ सरकार केँ की बिगड़तै? हानि तँ हमरे आरुक हैत? रेल चलब बन्न भ’ जेतै। ---तोरा थानामे सूचना नहि देबाक छह। जँ हमरा आरुक बात नहि मानबह तँ अपन बेटा गोनरा सँ हाथ धो लैह। भोरे ओकर लहास ओही टूटल पुल पर भेटतह। जा आब।’ ---छबिलाल एकाएक निर्णय लेलक जे देशक सोझाँ बेटा पैघ नहि हेतै। हम गोनराक दुआरे हजारो-हजार यात्रीक जान नै देबै-हम ओकरा आरु केँ पुल नहि उड़ब’ देबै। हम थाना मे कहिए अयबै--- थानामे कहिए अयबै।’ दोसर कथा ‘बद-लोक’ मे मुसहरी टोलाक बमभोलिया छतरू, बदरा सेहो उपेक्षित वर्गक पात्र अछि। उक्त कथा मे एकरा सभक द्वारा अपन टोल केँ पैघ लोकक खड़यंत्र सँ बचेबाक चित्र निष्ठाक संग चित्रित भेल अछि।

उपर्युक्त विवेचनाक आधार पर यैह कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली कथा साहित्य केँ विशेष रूपेँ आगाँ बढ़ेबा मे सम्मानित कथाकार लोकनि रामानन्द ‘रेणु’, साकेतानन्द, डा- महेन्द्र, शैलेन्द्र आनन्द, तारानन्द वियोगी, प्रदीप बिहारी, चन्द्रेश, शेफालिका वर्मा, डा- नीता झा, डा- (श्रीमती) लालपरी देवी, ज्योत्सना चन्द्रम्, डा- रामनरेश सिंह, डा- राजाराम प्रसाद, डा- ललितेश मिश्र, विभूति आनन्द, डा- शिवशंकर ‘श्रीनिवास’, डा- धीरेन्द्रनाथ मिश्र आदिक कथा मे कमोवेश रूप मे पात्रगत, विषयगत, भाव-भूमिगत रूप मे निश्चिते उपेक्षित वर्गक चित्र-चित्रण भेल अछि। ई संतोष विषय अवश्ये थिक। मुदा आजुक परिवेश मे समकालीन आ समसामयिकताक प्रति सतत् जागरूक होयबाक प्रयोजन अछि।

-डा.राजाराम प्रसाद
                                                                                                      
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साभार :- 'घर-बाहर' पत्रिका

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तीन टा मैथिली कविता - गुंजनश्री

1. रहना नहीं देश वीराना है

मीत !
कोना रहब पार लगैत अछि
ओहि नगर मे जाहि ठामक
सुरुज गछारल हो
मोन झमारल हो
किरण जे अबैत हो चानि पर
गिरहथ विर्त हो
लगेबा लेल ताहि पर
रंग-बिरंगक फिल्टर

झूर-झमान होइत लोक जतय
बाट तकैत हो दिन घुरि अयबाक,
झुझुआन होइत जाइ जतय
सरोकारक अनिवार्य मुदा हेराइत संस्कृति ,
लतखुर्दन कयल जाइत हो जतय
लोकतंत्रक सबटा गुण-धर्म
आ एहि सभ पर
मुस्की छिड़ियबैत हो सिंहासन
भाभाक हँसय ओकर चौदहो देबान,
कमला बलान मे संविधान केँ
दहा देबाक लेल रचल जाइत हो
नित-नव व्यूह,

एहि व्यूहरचनाक ओस्ताज सबहक नगर मे
कतेक दिन बाँचल रहि सकब हम-आहाँ मीत
चलू ने कोनो आन ठाम
जतय दिन
असगन्नी पर ओलरल नितुआन
मैल-कुचैल निरासि देल गेल अंगा सँ फराक
अपन अस्तित्व गढ़बाक व्योंत मे हो
आ राति
नढ़ियाक भूखब सुनबाक अभ्यस्त कानक रकबा सँ
अपना केँ एकात क'
चन्द्रमाक आभा मे नहयबाक सूर-सार करैत हो...


2. एना किएक करैत छलाह ओ ?
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मिशन भाइसाहेब : दू पड़ाव (संस्मरण) - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

पहिल पड़ाव : छाड़इत निकट नयन बह नीरे
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तीनटा सम्बन्धपरक कविता

1. नानी

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मामा लोकनि
भरित-पोषित भेलाक बाद
भ' गेलथिन एकात

मुदा
ताहि सँ कोनो खास फर्क नै पड़लैक
परिवर्तन बस यैह भेलैक जे
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चुप्पे, मामा सँ नुका कए
हम्मर ममियौत सब के,

मुदा
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बुढ़िया पेलसिम मे
पाइये कतेक दैत छैक सरकार ?

2. दादी

अहाँक पक्का भुलकत रोइयाँ
जखन स्पर्श करत दादी
अहाँक हाथक कंगुरिया आँगुर के,
कियैक त' ई स्पर्श
सिर्फ ओकरे स्पर्श टा नहि छैक
ई दू शताब्दीक स्पर्श थिकैक
जकरा अंगेजने अछि दादी
अप्पन झूर-झमान भेल लटकल
मुदा दपदप करैत चमड़ी मे

दू शताब्दीक दू टा पीढ़ीक मिलान पर
ठाढ़ हेबा सँ पहिने
ओ रहैक एन-मेन हमरे-आहाँ सन,
ओकरो रहैक मनोरथ
जे बाबा आजीवन रखथिन्ह संग
आ ओहो हेतैक ताहि प्रवाह मे प्रवाहित
जाहि मे होइत छथि कोनो सामान्य स्त्रीगण
मुदा बाबा
से नै पुरौलथिन आस,
संग के कहय
अन्तिमों क्षण मे
नहि सामीप्य भेलैक प्राप्त,

आ ताहि दिन सँ दादी
भ' गेल अछि एसगर
मुदा ई बात कहैत नहि छैक ककरो
बेटा सब छथिन पढ़ल-लिखल
मुदा नहिए सन पढ़ि पबैत छथि दादी के

मुदा
दादी पढ़ैत छैक सबटा
दाद…