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Showing posts from May, 2019

कुलानन्द मिश्रक तीनटा कविता

कुलानन्द मिश्रक कविताक बाट चलब जीवनक सोझ साक्षात्कार थिक। हिनक कविता मे जीवन अपन सम्पूर्ण जटिलता आ ओझरा, सरलता-सरसता-ममता आ राग-विराग ओ संगति-विसंगतिक संग अभिव्यक्त भेल अछि। मिथिलाक प्रति कविक संपृक्ति रोमांटिक वा तात्कालिक नहि, आत्मीय ओ सहज अछि। आ एहि अर्थमे कुलानन्द मिश्र अपन माटिक एकान्त कवि छथि-अपन कथ्य, भंगिमा ओ भाषा-सम्वेदनाक संग। यात्री ओ राजकमल चौधरीक बाद मैथिली कविताक एकटा इमानदार नाम। ई तीनू कविता हुनकर तीनू कविता संग्रह 'ताबत एतबे', 'आब आगाँ सुनू' आ 'ओना कहबाक लेल बहुत किछु छल हमरा लग' सँ लेल गेल अछि। कुला बाबू आ सुकान्त सोमक एकटा सहयोगी संग्रह 'भोरक प्रतीक्षा मे' सेहो आयल रहनि।
'स्मृतिक छाहरि मे गामक धाह' कविता 'ताबत एतबे' आ 'उत्तरक प्रतीक्षामे' कविता 'आब आगाँ सुनू' संग्रह मे संग्रहित अछि। 'ओना कहबाक लेल बहुत किछु छल हमरा लग' कविता बीस टुकड़ी( वा खण्ड) मे  लिखल गेल कविता अछि जकर पहिल पाँच टुकड़ी सितम्बर 1972 आ शेष बीस टुकड़ी अगस्त 1980 मे लिखल गेल छल, जे कालांतर मे एहिए नाम सँ संग्रहक रूप मे संग्रहित भेल…

ऑब्जेक्शन मी लार्ड नाटकक रचना सँ मंचन धरि - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

चेतना समिति, पटनाक विद्यापति स्मृतिपर्व समारोह-2015क अवसर पर एहि नाटक ‘ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड’क प्रथम मंचन भेल छल। हमरे लिखल एहि नाटकक निर्देशन सेहो हमरे करय पड़ल छल। से परिस्थितिवश करय पड़ल। एकर पृष्ठभूमि मे मारिते रास सामान्य-असामान्य कारणसभ सेहो छल। सर्वप्रथम तँ एहि नाटकक कथ्य ल’ क’ हमरा भय छल जे समिति आ ओकर नाट्य-परम्परा केँ ई जँचतैक कि नहि। कारण एकर मूल कथ्य छल फाँसीक विरोध अर्थात् फाँसीक सजाक विरोध। बीच-बीच मे एत्संदर्भित राजनीतिक स्थिति पर व्यंग्य सेहो छल। 2015 लगा क’ चारिम बेर हम समिति द्वारा नाटकक संयोजक बनाओल गेल रही जाहि क्रम मे मदति करू माता (विभारानी, 2011), अधिष्ठाता (रोहिणी रमण झा, 2013), मृत्युंजया (रोहिणी रमण झा, 2014) प्रभृति नाटकक निर्देशन क’ चुकल रही। 
                           ‘ऑब्जेक्शन भी लार्ड’क कथ्य मरखाह अछि से हम आइयो गछै छी। हमर पक्ष वस्तुतः ई अछि जे मानवक जीवन लेबाक अधिकार ककरहु नहि होयबाक चाही। ने कोनो व्यक्ति आ ने कोनो संस्था कोनो व्यक्तिक जीवन-हरण करय। कानून मे सेहो मृत्युदंडक प्रावधान केँ समाप्त क’ देल जाय। से केहनो अपराधी किएक…

एकटा अइपन अपन लिखि त' दितहुँ अहाँ (संस्मरण) - गुंजन श्री

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तहिया ग्रेजुएशन मे रही। प्रोजेक्ट वर्क चलैत रहय। साधारणतया लेट सँ घुरैत रही डेरा। आइ मुदा साँझहि सँ मोबाइल बेर-बेर बाजय। माँ करय फोन जे आइ जल्दी आबि जइहें। कियैक ? हम पुछलियैक। माँ कहलक हरेकृष्ण भैया आयल छथिन्ह। "अच्छा" कहि क' हम फोन काटि देल।

हम ताहि सँ पहिने हुनकर सिर्फ नाम सुनने आ कविता पढ़ने रही। पिताजी बेसी काल कविताक संदर्भ मे हुनकर नाम लैत छलखिन। हमरा घर मे हुनकर कविता संग्रह "एना त नहि जे" बीस टा सँ बेसीए प्रति छल। जे धीरे-धीरे पिताजी अपन प्रिय सबकेँ दैत रहथिन। हमरा त' घरे मे रहय सबटा। एक दिन उनटाओल ओहि पोथी केँ। कारण मोन मे भेल जे कियैक कहैत छथिन पिताजी जे एहि पोथी केँ बाइबिल जकाँ पढ़बाक चाही। आखिर बात की छैक एहि मे। से उनटाओल ओकरा। पहिल कविता जे उनटल से छल "गुलाबखास"। हम एहि आमक नाम सुनने रही। खयनो रही। बड्ड नीक लगैत छैक ई नाम खयबा मे। कविता पढ़ल मुदा ओहि कविताक मूलाधार मे आम नै छल आ ने ओ आम कविता रहय। आम सँ बेसी जे बात छल से घेरि लेलक। आम आ भाषा एक्के कविता मे तेना ने ठाढ़ रहय ने जे बिहुँसय लागल रहय मोन। दू-तीन बेर पढ़ल ओहि कविता केँ। प्रा…