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Showing posts from August, 2019

कृष्णमोहन झाक किछु कविता

मिथिलाक मधेपुरा जिलाक जीतपुर गाम मे 1968 ईस्वी मे जनमल कृष्णमोहन झा  दिल्ली विश्वविद्यालय सँ हिन्दी मे एम.ए आ जेएनयू सँ एम.फिल. आ पीएचडी छथि आ सम्प्रति असम विश्विद्यालय, सिलचर मे हिन्दीक प्रोफेसर छथि । हिन्दी मे एकटा कविताक पोथी 'समय को चीरकर' प्रकाशित-प्रसंशित छनि । 'कन्हैया स्मृति सम्मान' आ 'हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार' सँ सम्मानित कृष्णमोहन झा ई मानैत छथि जे हुनकर कोनो कविता कोनो विचारधाराक अनुगमन नै करैत अछि मुदा ओ संगे इहो मानैत छथि जे विचारधाराक भूमिका केँ खारिज करबाक ई तात्पर्य नै जे कविताक नाम पर मूल्यविहीन फोंक पद्याभ्यास केँ प्रस्तावित करी । कृष्णमोहन जीक अनुसार हुनक कविता मनुक्खक स्वाधीनता आ गरिमाक रक्षा लेल प्रयत्नशील अछि । ओ दिन-राति, चलैत-बुलैत, सुतैत-उठैत ओहि 'स्पेस' केँ तकबा आ रचबा लेल बेकल रहैत छथि जाहि ठाम जीवन असंख्य रूप मे क्रियाशील रहैत अछि । मैथिली मे हिनक एकटा कविता संग्रह 'एक टा हेरायल दुनिया' अन्तिका प्रकाशन सँ प्रकाशित छनि । प्रस्तुत पांचो कविता उक्त संग्रहे सँ लेल गेल अछि । इच्छा भेला उत्तर कृष्णमोहन जी सँ jha.krish@y…

अग्निपुष्पक किछु कविता

मैथिली कविता मे कतेको 'वाद' सब अबैत-जाइत रहल । यथा - सहजतावाद, अभियंजनावाद, अकवितावाद, नवकवितावाद, आ अग्निकवितावाद, आदि-आदि । समयक कोनो कालखण्ड मे कविताक मूल प्रवृति तत्कालीन समाजक व्यवस्था, कविताक स्वरूप आ यथास्थितिक प्रति विद्रोह होइत रहल अछि । 'अग्निपुष्प' अग्निजीवी पीढ़ीक महत्वपूर्ण नाम छथि । समाजक परिपेक्ष्य मे कोनो विचार कोनो कालखण्डक लेल प्रासंगिक भ' सकैत अछि मुदा कालांतर मे ओही विचार केँ एकटा रूढ़िवादी परम्परा मे परिवर्तित भ' जयबाक कतेको उदाहरण हमरा-अहाँक सोझाँ पसरल अछि । 'अग्निपुष्प'क कविता एहने ठाम आबि क' प्रासंगिक होइत अछि । ई परिवर्तनकामी होइत छथि । दियादक घर मे 'भगतसिंह' जनमबाक कबुला करय बला एहि समय मे 'अग्निपुष्प' परिवर्तन अपना घरहि सँ शुरू करैत छथि (ध्यानार्थ हिनकर 'पिता' कविता) । एकठाम अपने कहैत छथि जे आइ-काल्हि परिवर्तनकामी केँ 'उग्रवादी' कहि समाप्त क' देल जाइत अछि । ई तहियो सत्य छल जहिया लिखल गेल छल आ आइयो सत्य अछि । शासनक लेल सब दिन सँ 'परिवर्तनकामी' लोक अवांछित तत्व रहल अछि; रहबो करत; से…

कुछ हिन्दी कविताएँ

1. अलविदा

मुझे ये दुःख है कि
मैं वैसा नहीं हो सका था 
जैसा तुम चाहते थे,

तुम्हें भी होता होगा
मेरे वैसा न होने का दुःख
जैसा मैं तुम्हारी चाह में था,

और फिर 
सबकी बेहतरी के लिए
अपनी-अपनी चाह के साथ
हम दोनों 
समय के बीच से निकलकर
समय के साथ हो लिए,

फिर एक दिन तुमने कहा-
"समय के साथ सब कुछ खत्म हो गया ।"
मैंने पूछा-
"मैं भी ?"
तुम चुप हो गई थी और मैं हँस रहा था 

और उस दिन के बाद से 
मैं चुप हूँ पर तुम हँस नहीं पाती हो !

ऐसा क्यूँ ?


2. तुम

मैं पाना चाहता हूँ तुमको
तुम्हें पूर्णतया खोने के बाद भी,
जबकि जनता हूँ मैं कि 
तुम मेरे पाने या खोने की
सीमा-रेखा से बाहर हो अब,

मैं झूलना चाहता हूँ द्वन्द के झूले में
वैसे जैसे झूलते थे तुम्हारे झुमके
बस एक मेरे छू देने भर से,

और फिर मेरे देखते-देखते ही तुम
सिमटने लगती हो अचानक मुझमें,
सिमटकर बिन्दु जैसे गोल-मोल हो जाती हो
बिल्कुल अपनी माथे के काली बिन्दिया जैसी,

और मैं सोचता ही रहता हूँ कि
कहाँ से सीखा होगा तुमने ये जादू-टोना
कि जिसमें घिरा हुआ मैं
सहता ही रहता हूँ नित नए-नए प्रयोग 
तुम्हारे आँखों के प्रयोगशाला में।


3. बचाव

कई बार सब कुछ टूटकर भी
जो बचता है
वो सिर्फ उतना …