कुछ हिन्दी कविताएँ

1. अलविदा

मुझे ये दुःख है कि
मैं वैसा नहीं हो सका था 
जैसा तुम चाहते थे,

तुम्हें भी होता होगा
मेरे वैसा न होने का दुःख
जैसा मैं तुम्हारी चाह में था,

और फिर 
सबकी बेहतरी के लिए
अपनी-अपनी चाह के साथ
हम दोनों 
समय के बीच से निकलकर
समय के साथ हो लिए,

फिर एक दिन तुमने कहा-
"समय के साथ सब कुछ खत्म हो गया ।"
मैंने पूछा-
"मैं भी ?"
तुम चुप हो गई थी और मैं हँस रहा था 

और उस दिन के बाद से 
मैं चुप हूँ पर तुम हँस नहीं पाती हो !

ऐसा क्यूँ ?


2. तुम

मैं पाना चाहता हूँ तुमको
तुम्हें पूर्णतया खोने के बाद भी,
जबकि जनता हूँ मैं कि 
तुम मेरे पाने या खोने की
सीमा-रेखा से बाहर हो अब,

मैं झूलना चाहता हूँ द्वन्द के झूले में
वैसे जैसे झूलते थे तुम्हारे झुमके
बस एक मेरे छू देने भर से,

और फिर मेरे देखते-देखते ही तुम
सिमटने लगती हो अचानक मुझमें,
सिमटकर बिन्दु जैसे गोल-मोल हो जाती हो
बिल्कुल अपनी माथे के काली बिन्दिया जैसी,

और मैं सोचता ही रहता हूँ कि
कहाँ से सीखा होगा तुमने ये जादू-टोना
कि जिसमें घिरा हुआ मैं
सहता ही रहता हूँ नित नए-नए प्रयोग 
तुम्हारे आँखों के प्रयोगशाला में।


3. बचाव

कई बार सब कुछ टूटकर भी
जो बचता है
वो सिर्फ उतना ही होता है
जितना नथ उतारे जाने के बाद
बचती है कोई वेश्यानुमा स्त्री
अपने अंदर के स्त्री को ढूंढ़ती
एकदम अकेली
सतपुरुषों के भीड़ में,

मैँ खुद भी ढूँढ़ रहा हूँ
अपने अंदर के 'तथागत' को,
ताकि कोई 'आम्रपाली'
अपने टूटते यौवन के झलक में
देखे मुझे, और मैं
प्राप्त कर सकूं 'बोधिसत्व'
और क्रमशः अनावरण होता रहे
वेश्यानुमा स्त्री-पुराण के 
आम्रपाली स्कंध का...


4. अपनी प्रेमिकाओं के नाम

मेरे कई ख़त मिलते होंगे
मेरे कई आत्मीयों को यदा-कदा,
हालाँकि ये अलग बात है कि
मैंने कभी लिखना न चाहा 
वो बातें जो लिखता रहा हूँ साधारणतया,

और जो बाँकी है लिखना वो लिखने से पहले 
लिपट जाना चाहता हूँ
उन सभी अनाम स्मृतियों से
जो मेरे मानस-पटल पर अक्सर देर रात 
चहलकदमी सी करती हैं अपनी आवारगी लिए,

जब हल्की पीली रोशनी में नहाया ये शहर
लड़ने की कोशिश में होता है रात की स्याही से,
और फिर अपने जिस्म में एक थकान लिए
ओढ़ लिया करता है अक़्सर नींद की गहरी चादर,
और छा जाती है ख़ामोशी इस मशक्कत के बाद,
तब कुछ पतली-दुबली स्मृति रेखाओं से लबरेज़
मेरा जेहन बदल जाता है सरल सी वक्र रेखाओं में
लेकिन वक्र रेखाओं की सीधी चाल 
मजबूर करती है आदमी की शक़्ल लिए आदमी को
और वो बदलता है उन तिर्यक रेखाओं में
जो कभी नहीं चल सकती सरल रेखाओं जैसे
किसी के भी साथ समानांतर,

पता है मीत !
ये सब बातें मैं लिखना चाहता हूँ
अपनी सभी प्रेमिकाओं को एक ख़त में
कि जो मेरी ख़ुश्बूओं से सराबोर हो,
कि जिसके खुलते ही वो नहा जाएँ,
कि जिसमें दिन भीग जाये 
और रात; रातरानी के फुलों से सज जाये,
कि जिसको पढ़के उसे सुकून आये,

और अंत मे 
उस ख़त के पते के स्थान पर लिख सकूँ-
 'अपनी प्रेमिकाओं के नाम'......

कवि : गुंजन श्री

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