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आधुनिक मैथिली कविताक वैचारिक अन्तर्यात्रा - डॉ. नारायण जी

आधुनिक मैथिली कविताक आरम्भ मुख्य रूपसँ परम्परा आ रूढ़ि पर प्रहार करैत भेल अछि । तैं एहि कविताक विरोध अथवा विद्रोह स्वर-प्रधान हैब स्वाभाविक थिक । 

मैथिलीक विरोधक कविता अनेक-अनेक स्थापनाक विरोध करैत अछि । जनताक दुःख-दैन्यसँ द्रवित विरोधक कविताक मानब छैक जे सामाजिक, राजनीतिक आ धार्मिक स्थापनाक विरोधसँ जनताक पीड़ा मेटा सकैत अछि । एहि लेल समाज, वृहत्तर समाज, जे व्यक्तिक निर्माणमे सहायक होइत अछि, केर विषमताकेँ देखार करैत अछि आ विरोध अथवा विद्रोह लेल अपना स्वरकेँ मुखर करैत अछि । 

लाख शंखनादक अछैतो मैथिलीक विरोधक कवितामे जेँ कि निर्माणक कोनो योजनाक झलक देखबामे नहि अबैत अछि, तैँ  मैथिलीक विरोधक कविता स्वंयमे कोनो सोद्देश्य मूल्य नहि थिक।  आ तैँ विरोधक कविता शून्यवादकेँ जन्म दैत अछि । प्रसिद्ध रूसी उपन्यासकार तुर्गनेवक प्रसिद्ध उपन्यास 'फादर एण्ड सन्स'क नायक वेजारोव जकाँ जे कोनो वस्तुक एहि ल' केँ समूल नष्ट करैत अछि जे किछु निर्माण लेल जगह बनायब आवश्यक अछि, मैथिलीक विरोधक कविताक भविष्य लेल अवश्य जगह निर्माण कयलक, से पृथक आ स्वतंत्र विवेचनाक विषय थिक, किन्तु, निर्माणक योजनाविहीन विरोधक कारणेँ मैथिलीक विरोधक कविता अपन सार्वकालिक प्रवाह आ प्रभावकेँ अक्षुण्ण नहि राखि सकल । 

स्वतंत्रता प्राप्तिक अछैतो, जनता स्वतन्त्र नहि भेल । ओकरा परम्परित भय आ पीड़ासँ मुक्ति नहि भेटलैक । स्वतंत्रता मानस-बोधक रूपमे पनपि नहि सकल आ ने कोनो निजी आ फुट आकारे ग्रहण क' सकल । सामाजिक उत्थान आ उत्कर्षक बात झूठ लाग' लागल । स्वतंत्रता आन्दोलन अंग्रेज भगाओक संग भारतक अपना भूमिक विभिन्न क्षेत्र बँटल ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विकास लेल सामाजिक आर्थिक योजनाक स्वीकार सेहो छल । किन्तु, लाग' लागल जे सामाजिक चिन्ता आ निर्वैयक्तिकता सुनियोजित प्रपंच आ षडयंत्र थिक । एहि नाराकेँ ललिचगर भाषामे वएह  गबैत देखबामे आयल जिनकर विरोध होयबाक छनि । तैँ  अनास्था जन्म लैत अछि, आ तैँ  मैथिली कविता सामाजिक संकटक स्थानपर वैयक्तिक यातनाकेँ अभिव्यक्ति देम' लगैत अछि । व्यक्तिक आत्मपीड़ा आ भोग कविताक विषय बनैत अछि । मैथिली कविता पारंपरिक अनेक-अनेक सीमासँ मुक्तिपर बल दैत अछि । तैँ  विरोधक कविताक बाद मैथिली कविता सीमासँ अलग होयबा लेल मुक्तिक प्रयासमे लागि जाइत अछि । मैथिलीक मुक्तिक कविता किछुओ चाहैत अछि, अथवा किछुओ नहि चाहैत अछि, सिवा एकर जे जाहि परम्परित सीमाक भीतर व्यक्ति जीवित अछि आ जीवनकेँ अपना तरहें भोगि रहल अछि, ओहि सीमाकेँ नहि चाहैत अछि, ओहि सीमामे रह' नहि चाहैत अछि, ओकरा स्वीकार' नहि चाहैत अछि । तैँ  मैथिलीक मुक्तिक कविता एक अर्थमे अस्वीकारक कविता थिक । अस्वीकारक ई निर्णय यातना आ पीड़ामे लेल गेल निर्णय छल । पीड़ा आ यातनामे लेल गेल मुक्तिक निर्णय व्यक्तिकेँ पीड़ा आ यातनासँ मुक्त नहि करैत अछि, ओकरा आन अनेक तरहक पीड़ा आ यातनामे फूटसँ गछाड़ैत अछि । यएह कारण थिक जे मुक्तिक प्रयासमे लागल मैथिली कविताक समक्ष एकटा समस्या त' खूबे स्पष्ट देखबामे अबैत अछि जे ओकरा कथी आ ककरासँ मुक्ति पयबाक छैक ? किन्तु प्राप्ति लेल मैथिलीक मुक्तिक कविताक इच्छामे कोन सपना आकार ल' रहल अछि, स्पष्ट देखबामे नहि अबैत अछि । तैँ  कखनो काल अपनामे कछमछाइत मैथिलीक मुक्तिक कविता उन्मादक शब्दजाल बुझाइत अछि । उन्मादीक प्रलाप बुझाइत अछि । जे आधुनिक मैथिली कविता नितांत लोकतांत्रिक शैलीकेँ आत्मसात क' अपन यात्रा आरम्भ कयने छल, अपना लेल शुद्ध राजतांत्रिक त' नहि, किन्तु अवश्य एकटा अ-लोकतांत्रिक संस्कार गढ़ि लैत अछि, आ अकवितावाद सन अस्वीकार वादक जन्म दैत अछि । किन्तु, मुक्तिक कविता, मैथिली कविताकेँ अवश्य एकटा चौबट्टीपर आनि ठाढ़ करैत अछि । एकटा सम्पूर्ण लोक जकाँ अपना आँखिसँ सभ किछु देखैत-परखैत अछि आ अपन रस्ता स्वंय चुनबा लेल अवकाश सृजित करैत अछि । 

एहि वैचारिक अन्तर्यात्रामे मैथिली कविताक समक्ष जखन ई स्पष्ट भ' जाइत अछि जे विरोध ककर करबाक अछि आ मुक्ति कथीसँ पयबाक अछि, तखन मैथिली कविता पर्याप्त धैर्यसँ अपना स्थितिपर विचार करैत अछि । परिवेश, समाज आ सामाजिक मनोभाव, संस्कार आ ओकर साँचपनसँ  पूर्ण अवगत भ' अपना लेल देशज स्वरूपक स्वर चुनैत अछि । 

मैथिली कविताकेँ विश्वास भ' जाइत अछि जे मानवीय संकटक कारण राजनीतिक, सामाजिक आ धार्मिक व्यवस्था थिक जे मानव-निर्मित अछि, जे ओकर शोषण करैत अछि, सकपंज करैत अछि, सापेक्ष आ स्वतंत्र विकासमे दुर्दम आ आ दुर्निवार बाधा उत्पन्न करैत अछि । तैँ  मैथिली कविता अपना स्वरकेँ अनावश्यक हल्लासँ बचबैत संयमसँ काज लैत अछि, आ प्रत्येक जड़ मान्यतापर चोट करैत अछि, यथास्थितिकेँ तोड़बाक संकल्प लैत अछि । एहि कविता सभमे राजसत्ता, धर्म आ सामाजिक विसंगति पर बड़ कड़गर प्रहार अछि । किन्तु, मैथिली कविता नाज़िम हिकमत जकाँ 'कविकेँ एक हाथमे कलम आ दोसरमे बन्दूक रहक चाही' सन उग्र विचारकेँ परिवेशसँ  परिचित कहबाक देखौँसेमे नादानी नहि करैत अछि । मैथिली कविता स्वंयमे स्वंयकेँ युद्ध त' नहि, किन्तु, स्वयंकेँ युद्ध लेल एकटा सही उत्प्रेरक रसायन बुझैत अछि । एहि लेल अपन जातीय संस्कारक स्वर -- असहमतिक स्वरकेँ स्थिरसँ अभिव्यक्ति दैत अछि । 

मैथिली कवितामे असहमतिक स्वर एकटा एहन स्वर थिक जे समसामयिक स्थिति आ ओहिमे जीवित व्यक्तिक नपुंसकताकेँ प्रकट करैत अछि, बिहाड़िक पूर्वक शून्य उत्पन्न करैत अछि, व्यक्तिक मर्मकेँ छुबैत जगबा लेल परोक्ष रूपसँ कुबियबैत अछि । तैँ , मैथिलीक असहमतिक कविता व्यक्ति अथवा समुदाय लेल ऊपरसँ कोनो अतिरिक्त विचार थोपैत नहि अछि, पूर्व मान्यताक खण्डन करैत अछि, आ व्यक्ति अथवा समुदायमे स्वंय विवेक जगयबा लेल, नहि त' कोनो आग्रह करैत अछि अथवा नहि ओकरा प्रति उदासीन भ' बैसि जाइत अछि । अपितु, घृणाक बर्छी अवश्य भेंसैत अछि । तैँ   मानल जा सकैत अछि जे मैथिलीक असहमतिक कविता परोक्ष रुपसँ 'अप्पदीपो भवः' क मूलमंत्र फुँकैत अछि, कोनो तात्कालिक लोभसँ भिन्न कविता लेल अपन स्तर सुरक्षित रखैत अछि । 

मैथिलीक असहमतिक स्वरक कविताकेँ सही अर्थमे नहि बूझि किछु कवि द्वारा रोदनक कविता जन्म लैत अछि । मेटाइत अपना अस्तित्वसँ निश्चिन्त मैथिलीक रोदनक कवितामे असीम धैर्य आ अज्ञात प्रतीक्षा देखबामे अबैत अछि । जेना ओकर सामुदायिक आर्त्तनादसँ प्रभावित भ' लगैत अछि ओकर लड़ाइ क्यो आन लड़ि देत आ ओकरा लेल अपना तरहक एकटा भोर गढ़ि देत । एकर मतलब ई कखनहु नहि थिक जे असहमतिक कविताक बाद मैथिली कविताक स्वर धर्म-भीरू भ' जाइत अछि अथवा पूर्वक कविता जकाँ धर्मक विरोधमे अपन ऊर्जा दूरि कर' लगैत अछि । असलमे मैथिलीक कविता अनास्थाक आवरण तर तोपा जाइत अछि । 

मैथिलीक अनास्थाक कविता अतीतक गुणगान करैत अछि आ निश्चेष्ट बनल दुर्गतिसँ खिन्न निराशाकेँ अभिव्यक्ति दैत अछि । कारण, रुदनक कविता एक अर्थमे निराशाक कविता थिक, हताशा एकर मुख्य स्वर थिक । पराजयक दलदलमे स्वंयकेँ स्वीकारि वातावरणकेँ सही आ व्यक्तिकेँ दोषी मानि हीनभावनासँ ग्रसित मैथिलीक रोदनक कविता अथवा निराशाक कवितामे कोनो तरहक दिशाधाराक विचार तकबे आ करबे बेकार थिक।  

निराशाक कवितामे राज्यसत्ताक प्रति मुख्य रूपसँ निराशा मुखरित होइत अछि । जनतांत्रिक एहि देशमे जनतांत्रिक पद्धति द्वारा निर्मित सत्ता जनताकेँ ठकैत अछि, ओकर शोषण करैत अछि । तैँ  बेर-बेर ठकल जाइत सत्ताक प्रति अविश्वासक जन्म लेब स्वाभाविक थिक । अविश्वासक एहि उत्स लेल दोषी सत्ता अछि, ओकर व्यापक तंत्र अछि । तैँ  निराशाक संग मैथिली कवितामे एकटा आर स्वर जन्म लैत अछि, से दोषारोपणक स्वर थिक । मैथिलीमे दोषारोपणक कविता सत्ता आ मान्यताक प्रायः पिजुआयल ओहि प्रत्येक बिन्दुकेँ देखार करैत अछि जे जनताकेँ बल आ अश्वासनसँ ओकरा मुट्ठीमे रखैत अछि आ आरामसँ ओकरापर शासन करैत अछि । किन्तु, दोषारोपणक कविता सेहो विकल्पहीन कविता थिक । मैथिलीक ई कविता स्थापित सत्ताक भर्त्सना त' करैत अछि, जनताकेँ निष्कलुष तँ मानैत अछि, किन्तु अपना अधिकार लेल अथवा प्रदत्त नागरिकी-सुविधा लेल कोनो तरहक नहि त' आवाज उठबैत अछि आ नहि संगोरक आवश्यकतापर बल दैत अछि । 

मैथिली कविता, अपन वैचारिक अन्तर्यात्राक क्रममे अपना लेल एहन एकटा संस्कार वरण क' लैत अछि, जत' ओकरा क्यो पलायनवादीक कविता कहि सकैत अछि । कारण, मैथिली कविता जाहि खतरासँ घेरा जाइत अछि से नव नहि छल । नव छल पराजय बोधसँ मैथिली कविता लेल मुक्तिक चेष्टा । मैथिलीक विरोधक कविता, मुक्ति आ असहमतिक स्वरप्रधान कविताक बाद जे स्वर आकार लैत अछि ओ जीवनोन्मुख स्वर नहि थिक।  मैथिली कविता अपन एहि दुरवस्थाकेँ बूझि अन्य आधुनिक भारतीय भाषा साहित्यक समक्ष अपना माटिपानिक सत्य आ संकट लेल सुविचारित आ सुनियोजित रूपसँ संघर्षक अनिवार्यताक अनुभव करैत अछि,  आ अपनामे संघर्षक स्वरकेँ मुखरित करैत अछि । 

मैथिली कविता जे सामाजिक संकट आ सामूहिक दुरवस्थाकेँ रेखांकित करैत अपन यात्रा आरम्भ कयने छल, आ विरोध अथवा विद्रोह अपन स्वभाव बना लेने छल, कालान्तरमे व्यक्ति केन्द्रित भ' गेल छल, आ व्यक्ति-मुक्ति आ वैयक्तिक निराशा आ कछमछाहटिक अंकनेकेँ अपन काव्य-धर्म बूझ' लागल छल, संघर्षक स्वरकेँ स्वंय आत्मसात आ क्रमिक विकसित करितहि पुनः सामाजिक सोच आ संरचनापर अपन दृष्टि केन्द्रित करैत अछि । मुख्य-रूपसँ सामाजिक उपेक्षा, आर्थिक असमानता आ राजनीतिक शोषणकेँ मैथिली संघर्षक कविता अपन विषय बनबैत अछि आ वर्ग-संघर्षक अनिवार्यता जनबैत अछि । मैथिलीक संघर्षक कवितामे तैँ  दलितक जीवन आ ओकरा जीवनक कविता भेटैत अछि । मैथिलीक संघर्षक कविता उपेक्षित जीवनक लोप होइत अपन मूल्य आ संस्कृतिकेँ बचयबासँ अधिक विकासमे बाधक बनल व्यक्ति आ मान्यताक प्रति युद्ध आ युद्धक आमंत्रणक कविता थिक । अपना अधिकार आ अस्तित्वक लेल व्यक्ति तंद्रा-भंग करैत अछि, ओकरामे जागरूकता उत्पन्न करैत अछि आ जड़ बनल व्यक्तिकेँ अपना स्थितिसँ लड़बा लेल इच्छाशक्ति उत्पन्न करैत अछि । 

सामाजिक उत्पीड़न आ चिन्ताकेँ ध्यानमे राखि मैथिलीक संघर्षक कविता बिम्बमुक्त बनि जाइत अछि । आ मैथिलीक विरोधक कविता जकाँ अभिधाधर्मा अभिव्यक्तिक शैलीकेँ स्वीकारि परम्परामुक्त, अपना परिवेशक उपेक्षित, अस्पर्शित नव सौंदर्यबोध विकसित करैत अछि । तैँ  मैथिलीक संघर्ष कविता देशज स्वरूपक अत्यन्त विश्वसनीय कविता थिक । 

मैथिलीमे संघर्षक कविताक उपरान्त संघर्षकेँ नव आयाम दैत जन-विद्रोही विचारक कविता विस्फोट संग जन्म लैत अछि । एहि कविताक पृष्ठभूमिमे अछि बंगालक नक्सलबाड़ी आन्दोलन । जन-विद्रोह साम्राज्यवाद, सामंतवाद आ स्थापित सत्ता आ ओकर चरित्रक विरुद्ध उग्र विद्रोह थिक । मैथिलीक जन-विद्रोहक कविता बंगालक नक्सल-आन्दोलनसँ रस-ग्रहण करैत देखाइत अछि । किन्तु, मिथिलाक भूमिपर जनता आ जनमानसमे कोनो तरहक विद्रोहक लहरि नहि रहैत, मैथिलीक जन-विद्रोह अथवा जन-युद्धक कविता, ओकर स्वर आ विचार उधार लेल गेल लगैत अछि । जेँ कि ई स्वर मिथिलाक अपन माटिपानिक स्वर नहि छल, तैँ  जन-विद्रोह अथवा जन-युद्ध स्वर-प्रधान मैथिली कविता अपना लेल कोनो स्थायी छवि गढ़बामे असमर्थ देखाइत अछि । 

मैथिलीक संघर्षक कविता जन-विद्रोहक अथवा जन-युद्धक कविता राज्यसत्ता आ सामाजिक मान्यतापर आक्रमण त' करैत अछि; किन्तु मैथिलीक पूर्ववर्ति कविता जकाँ इहो कविता दिशाबोधक नहि थिक । विकल्पहीन आ अस्वीकारक कविताक कोखिसँ जन्म लैत अछि समकालीन मैथिली कविता । 

समकालीन मैथिली कविता आइ ढंगसँ आकर ल' रहल अछि, से नव नहि थिक । नव थिक अपन यातना-भोग, पराजय बोध, रुदन आ अस्वीकारसँ मुक्ति पाबि स्वीकार आ उपलब्धिक गप करब, जे समकालीन मैथिली कविताक नियति आ ओकर आत्माक रंग बनि गेल अछि । 

मनुक्ख जीवित अछि । अन्याय शोषण आ अनेको परवशताक पीड़ाकेँ भोगैत छल आ हताशाक वातावरणमे पलैत, जीवनक प्रति अव्यक्त आस्था आ मोह ओकरा जीवित रखने अछि । संकटक घड़ीमे एकटा जे विश्वास आ भरोस बाँचल छैक व्यक्तिक भीतर, तकरे सशक्त अभिव्यक्ति थिक समकालीन मैथिली कविता । निराश आ यातनामय जीवनमे उत्साहक जे क्षण अछि तकरा ग्रहण करैत अछि आ अभिव्यक्ति दैत अछि समकालीन मैथिली कविता । उल्लास, उत्कर्ष आ मुग्धत्वक क्षणकेँ एतेक दीर्घ करैत अछि, ओकरा अल्पविस्तारकेँ एना आत्मसात करैत अछि, जकरा तर हताश जे मात्र  तोपा जाइत अछि, अपितु, निर्मलीकृत भ' जाइत अछि । तैँ  समकालीन मैथिली कविता तृप्तिक कविता थिक । एहिमे दण्डक यातना आ पीड़ा नहि, पुरस्कारक मधुर स्वाद अछि । समकालीन मैथिली कविता अपना माटि-पानि आ समाजक उपज थिक । कथ्यक स्तरपर पूर्ववर्ती कविता जकाँ दुर्बोध नहि, एतेक फड़िछायल अछि जे प्रायः शीर्षकविहीन अथवा कवितामे रचल-पचल पंक्तिटाक शीर्षक हैब समकालीन मैथिली कविताक अपन परिचय भ' गेलैक अछि । 

समकालीन मैथिली कविता दिशाधारक कविता थिक । अपना परिवेशमे आकंठ डूबल एकर स्वर अंतरराष्ट्रीय स्वर बनि गेलैक अछि, जे मिथिलाक सामुदायिक समस्या आ स्थानीय परिचय लेल कविता लेल खतरा उत्पन्न क' सकैत छैक । किन्तु, अंतरराष्ट्रीय समकालीन कविता जकाँ समकालीन मैथिली कवितामे त्यागक पीड़ा नहि, ग्रहणक उल्लास अछि । आ अपना लेल निजी लय निर्मित कयने अछि, आइयो । कोनो सार्वजनिक सत्यक स्थापनाक स्थानपर मैथिली कविता अनुभूतिक कविता थिक, मेटाइत अपन शब्द आ लोकबिम्बकेँ बचयबाक कविताक थिक । 

प्रकृति समकालीन मैथिली कवितामे जनोन्मुख सपना ल' अबैत अछि, आ व्यापक मानव समुदायक संग तादात्म्य स्थापित क' ओकर जीवनासक्तिकेँ पुष्ट करैत अछि । 

समकालीन मैथिली कविता तीब्रगतिसँ अपना धरतीपर पसरि गेल अछि, ओकर जड़ि अनिवार्य आ अपेक्षित धरतीक भीतर प्रवेश क' रहल अछि जे आधुनिक मैथिली कविताक उपलब्धि थिक । 

डॉ. नारायण जी 

ध्यानार्थ : ई आलेख आदरणीय स्वर्गीय श्री मोहन भारद्वाज जीक संपादनमे 1992 मे बहरायल 'मैथिली आलोचना' पत्रिकाक एकमात्र अंकसँ लेल गेल अछि  आ आदरणीय कवि श्री नारायण जीक फोटो राहुल जीक सौजन्यसँ प्राप्त भेल अछि । नारायण जीसँ हुनकर मोबाइल नम्बर +919431836445 पर सम्पर्क क' आलेखसँ सहमति वा असहमति व्यक्त कयल जा सकैछ । आ ई त' ज्ञात होयबे करत जे आलेखसँ संपादकीय (पढ़ू : ब्लॉग संचालक) सहमति आवश्यक नहि होइत छैक ।


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तीन टा मैथिली कविता - गुंजनश्री

1. रहना नहीं देश वीराना है

मीत !
कोना रहब पार लगैत अछि
ओहि नगर मे जाहि ठामक
सुरुज गछारल हो
मोन झमारल हो
किरण जे अबैत हो चानि पर
गिरहथ विर्त हो
लगेबा लेल ताहि पर
रंग-बिरंगक फिल्टर

झूर-झमान होइत लोक जतय
बाट तकैत हो दिन घुरि अयबाक,
झुझुआन होइत जाइ जतय
सरोकारक अनिवार्य मुदा हेराइत संस्कृति ,
लतखुर्दन कयल जाइत हो जतय
लोकतंत्रक सबटा गुण-धर्म
आ एहि सभ पर
मुस्की छिड़ियबैत हो सिंहासन
भाभाक हँसय ओकर चौदहो देबान,
कमला बलान मे संविधान केँ
दहा देबाक लेल रचल जाइत हो
नित-नव व्यूह,

एहि व्यूहरचनाक ओस्ताज सबहक नगर मे
कतेक दिन बाँचल रहि सकब हम-आहाँ मीत
चलू ने कोनो आन ठाम
जतय दिन
असगन्नी पर ओलरल नितुआन
मैल-कुचैल निरासि देल गेल अंगा सँ फराक
अपन अस्तित्व गढ़बाक व्योंत मे हो
आ राति
नढ़ियाक भूखब सुनबाक अभ्यस्त कानक रकबा सँ
अपना केँ एकात क'
चन्द्रमाक आभा मे नहयबाक सूर-सार करैत हो...


2. एना किएक करैत छलाह ओ ?
एहि शताब्दीक माथ पर अप्पन समस्त उर्जाक साक्षी राखि अपन आबय बला पीढ़ीक लेल करय चाहैत रहथि ओ एकटा दसखत जकरा देखि कहल जा सकैछ जे ई पुरखा छलाह हमर जे नहि अबडेरलाह कहियो कोनो राजनितिक क्षत-विक्षत नीति केँ
हुनका आजीवन…

मिशन भाइसाहेब : दू पड़ाव (संस्मरण) - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

पहिल पड़ाव : छाड़इत निकट नयन बह नीरे
साहित्यमे हमर प्रवेश भेल नाटक बाटे। प्रारम्भ हम नाटकेसँ कयल। पटनाक मैथिली रंगमंचसँ। प्रायः 1990-91 सँ। अभिनयक रुचि अवश्य छल मुदा से प्रधान नहि। नाटकक अन्य पार्श्व-सहयोगी तत्वसभ आकर्षित करैत छल। ताहूमे एकर संगीतपक्ष सर्वाधिक। नाटकक साहित्य आ संगीत दुनूक अपन-अपन भाषा छैक। एहि दुनूक अपन-अपन सौन्दर्य-प्रभावादि आ संगहि एहि दुनूक अंतर्सम्बन्ध हमरा बेर-बेर आकर्षित करैत छल। ग’र लगने किछु काजो करैत जाइ। गोटपगरा लोक प्रशंसो करथि। तहिया पटनाक मैथिलीओ रंगमंच बेस सक्रिय छल। एकर प्रदर्शन-क्रममे निरन्तरता छलैक। मैथिली रंगमंच आ एकर गतिविधिक प्रमुख केन्द्र विद्यापति भवन होइत छल। एतय रंगकर्मीलोकनिक जुटान नियमित भेल करय। हमहूँ पहुँचय लगलहुँ। मंचनमे प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग करय लगलहुँ। आ एहिये मंचनसभक दर्शक-दीर्घामे मैथिलीक समस्त साहित्यकारलोकनिकेँ देखय लगलहुँ।
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कियैक त' ई स्पर्श
सिर्फ ओकरे स्पर्श टा नहि छैक
ई दू शताब्दीक स्पर्श थिकैक
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मुदा दपदप करैत चमड़ी मे

दू शताब्दीक दू टा पीढ़ीक मिलान पर
ठाढ़ हेबा सँ पहिने
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जे बाबा आजीवन रखथिन्ह संग
आ ओहो हेतैक ताहि प्रवाह मे प्रवाहित
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मुदा बाबा
से नै पुरौलथिन आस,
संग के कहय
अन्तिमों क्षण मे
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आ ताहि दिन सँ दादी
भ' गेल अछि एसगर
मुदा ई बात कहैत नहि छैक ककरो
बेटा सब छथिन पढ़ल-लिखल
मुदा नहिए सन पढ़ि पबैत छथि दादी के

मुदा
दादी पढ़ैत छैक सबटा
दाद…