सुशान्त झा अवलोकितक दस गोट कविता

1 . मोन छौक ?

आबि रहल छैक
तथाकथित प्रेम दिवस सभ
जे विवश करत
अप्पन लैपटॉप मे
हाईड क' राखल ओ फोटो सभ देखय लेल
जाहि मे तोहर गुहायल दुजुट्टिया
मोन पाड़त हमरा तोहर स्नेह
दुजुट्टिया जे कहियो नै सोहाइत छलौक तोरा
मुदा मात्र हम्मर प्रसन्नताक लेल
सभ दिन ओहि मे ललका फित्ता लगा
अबैत छलही इस्कूल
आ ककरो नै छुबय दैत छलही हमरा सिवाय

मोन पड़ि जायत आम'क गाछीक
सिंगी-पतासी बला खेल
जाहि मे तोरा माथ पर सवार
तथाकथित भूतो नै बाध्य क' पबैत छल तोरा
हमरा पर झटहा चलबय लेल

आकि तहने मोन पड़ि जाइत अछि
गाम बाबीक बिना लहरा बला छ'त
ओ जरलाहा लताम लेल हम्मर हठ
छ'त परहुक कदई
बाट परहक ईटा
शोणित सँ नहायल तोहर दुजुट्टिया
टूक-टूक तकैत आँखि
कन्नरोहटि करैत टोल
फख़्सियारी कटैत ह'म
आ फेर
बहय लागल हमरा आँखि सँ
गंगा-जमुनाक धार
फोड़य लागब हम अप्पन कपाड़।

2 . जननी सँ जगजननी

खूब रास धूपबत्ती जरा ले
भरि गामक कुमारि खुआ ले
ललका धोती पहिर क' बौआ
बड़का टा तिरपुण्ड लगा ले

तन-मन-धन लगा क' बौआ
क' ले कतबो पूजा-पाठ
जँ घ'र मे मायक मन दुःखित
निश्चित निष्फल सभ खटरास।

न' मास जे कोखि रखलकौ
एहि धरती पर आश्रय देलकौ
अप्पन शोणित पिया पोसलकौ
भूख'ल रहि क' तोरा खुऔलकौ
तै माँ केँ तू कना क' बौआ
जगदम्बा केर नाम जपय छै
अपना केँ त' ठकिए रहलें
जगजननी केँ सेहो ठकइ छैं ।

जगजननी केर कृपा बरसतौ
जहन अप्पन माय खुश रहतौ
कियाक त' बौआ
जाय केँ एहि अस्थायी दुनियाँ सँ
बाट त' छैक कतेको रास
मुदा एबाक हो जँ एहि जग मे
मायक कोखि मात्र एक आस।

3 . हे विधाता

बौद्धिकजनक एहि सभा मे
हम हेरि रहलहुँ अछि
ओहि ज्ञानी मनुष्य केँ
जे हमरा सँ
बिना जाति-गोत्र पूछने
भठ्ठा धरा
सीखा दितथि
हमर "मातृभाषा"।

4 . कबुला

माय करैत रहैत छल कबुला
जल्दिये भेटय हमरा नेन्ना केँ नोकरी
मायक सुनियो नेने रहथिन देवता-पितर सभ
आबि गेल रहय चिठ्ठी
घर सँ बाहर धरि सौंसे
छल दीयाबाती सन रौनक
लड्डू बाँटल गेल छल
हमरा मोन मे सेहो फुटल छल एकटा लड्डू
जे आब जल्दीये नथा जायब हमहुँ

आइ हम्मर १० वर्षक बेटीक प्रश्न
दोमि देलक अछि हमरा
"पप्पा नोकरी करब त'
चाकरे होयबाक निशानी छैक ने ?"
की हमहूँ पढ़ि-लिख क' चाकरे बनबैक ?

आँखिक सोझा सिनेमा जकाँ
चलय लागल छल ई नोकरिया जीवन
भोरे जखन गरदनि मे पट्टा लगा
निकलैत छी घर सँ
लगा दैत छियैक स्वयं केँ बन्हक
पेटक ओरियाओन लेल
फैशन बला सामान लेल
धिया-पुताक शिक्षादान लेल
माय-बाबूक तकतान लेल
त' मात्र एतबे अंतर रहि जाइत छैक
हमरा आ पोसिया कुक्कुर मे
जे ओ चटैत अछि आ हम नहि
तैं ओकरा दुलारल जाइत छैक
आ हमरा पोलहाओल जाइत अछि

कहियो-काल ऑफिस ऑवर्सक पछातिओ
बजैत रहैया झुनझुना
सम्बन्धी सभ सँ संपर्क मे त' छी
मुदा मात्र सोशले मीडिया टा पर

गाम पर नुनुओं आब नहिएं रहैत छैक
कनियाँ सभ केँ शहरक बसात लागि गेल छनि
बाबू केँ गाम छोड़ि आओर किछु सोहाइत नै छनि
माय एखनहुँ अपने हाथ झरकाबैत अछि
नहि ई दिन देखबा लेल त'
किन्नहुँ नहि केने छल माय हमरा लेल कबुला

बेटीक प्रश्नक उतारा मे एतेबे कहलियै
"दाइ अहाँ मलिकाइन बनब,
मुदा अहाँ केँ मलिकाइन कहय
लेल ककरो त' फेर बनहे पड़तैक ने नोकर "

बेटा,
नोकर नहि होइत छैक मालिकक विलोम
जेना स्त्री किन्नहु नहि छियैक पुरुषक विलोम
जेना धरती सेहो नहि छैक आकाशक विलोम
ई सभ त' एक दोसरक पूरक छैक
मालिक वा नोकर होयब तत्तेक मह्त्व नहि रखैत छैक
जतेक आवश्यक छैक एकटा नीक मनुष्य होयब।

5 . हम मैथिल छी

हम मैथिल छी चला टेंगारी
अपनहि अप्पन जांघ पंगैत छी
गानय लागब त' गानि सकब नै
संस्था कतेक रास चलै छैक
मुदा संस्थाक नामक अढ़ सँ
हुलकी द' मुँह चमकबैत छी ।

हम मैथिल छी चला टेंगारी
अपनहि अप्पन जांघ पंगैत छी

नेना-भुटकाक मौलिक अधिकार
मायक भाषा केँ पढ़ब-लिखब
कतेक महान छैक अप्पन मिथिला
एहि गप्प सँ अवगत होयब
ताहि बिन्दु केँ कात लगा क'
फूसि-फटक लेल मारि करय छी

हम मैथिल छी चला टेंगारी
अपनहि अप्पन जांघ पंगैत छी

एतेक रास बुधियार हम सभ
अपनहि विकास मे आड़ि हम सभ
हिम्मत क' जँ कियो आगाँ बढ़ि जाय
अप्पन मेहनति सँ सीढ़ी चढ़ि जाय
लगा क' लग्गी एहन लोक केँ
ताकि-ताकि हम टाँग घिचय छी

हम मैथिल छी चला टेंगारी
अपनहि अप्पन जांघ पंगैत छी

लगा विभूतिक नामक बैनर
हम बढ़ाबी पार्टी लेल वोटर
किरण-मधुप-यात्रीक छल स्वप्न
अलख जगाबक छल यत्न
ताहि स्वप्न केँ चूल्हि मे ध क'
हम पगला-पगली बजबै छी

हम मैथिल छी चला टेंगारी
अपनहि अप्पन जांघ पंगैत छी

हम त' छी भाषा अभियानी
मँच चढ़ि पहिरै छी पाग
माइक पकड़ि आ चिकरि-चिकरि क'
गाबी निज भाषा केर राग
मुदा घर मे पहुँचैत देरी
हेलो, हाई, व्हाट्सअप कहैत छी

हम मैथिल छी चला टेंगारी
अपनहि अप्पन जांघ पंगैत छी

चमचई-बेलचई बढ़ल जाइयै
एहि तरहे किछु मंच चलैयै
जे सी अक्षर नै जानय से
फेसबुक पर ज्ञान बटैयै
पुरस्कार आ सम्मान त'
हम सभ मुंगबा जकाँ बँटै छी

हम मैथिल छी चला टेंगारी
अपनहि अप्पन जांघ पंगैत छी

तोरो प्रयास छह बौआ उत्तम
मुदा हम्मर त' अछि सर्वोत्तम
अपनहि सन्तति केँ धकलि क' पाछु
मात्र एक हमही पुरूषोत्तम
द्वेषक आगि मे जरैत रहै छी
सूपक भट्टा बनल रहै छी

हम मैथिल छी चला टेंगारी
अपनहि अप्पन जांघ पंगैत छी

मानल अन्हार छैक सौँसे पसरल
प्रेमक भीत लगै छैक भखरल
मुदा लेस क' स्नेहक डिबिया
बजेबैक मिथिला नामक डिगडीगिया
एक-दोसरक संग दियौक सभ
क'र जोड़ि आह्वान करय छी
हम मैथिल छी जागि गेल छी
कर्तव्य करब हम प्रण लैत छी।

6 . महत्व

अरिकंच पर नहि थम्हैत छैक बरखाक बुन्न
मैना पात पर सेहो नै
बड्ड सुन्नर होइत छैक अरिकंचक गढ़नि
तँ ओकरा सँ कि उनैस होइत छैक
मैना पातक सजावट?
अरिकंचक चक्का सुखाओल जाइत छैक चंगेरा मे
मैनाक पात सुसज्जित करैत छैक अहिबातक डाला
बहस जुनि करू
दुनुक अप्पन-अप्पन महत्व छैक
मानि लेब अहाँक बात
मुदा पहिने एकरा फरिछाउ जे
अरिकंच तँ कबकब रहितो मिझा सकैत अछि भूख
की मैनाक पात मे छैक एहि तरहक कोनो तत्व ?

तर्क सँ श्रृंगार त' कयल जा' सकैत छैक
मुदा भूखक लेल भोज्य चाही
काटि सकब ई तर्क तँ
स्वागत अछि मीत !

7 . बाबाक छाँह

कहाँ देखाइत अछि?
कोनो साहित्यकार मे
ककरो लेखनी मे
ककरो शब्द संचयन मे
ककरो कविता मे
ककरो कथा मे
बाबाक छाँह !

हे महाकवि !
नवतुरिया आगाँ आबि रहल अछि
मुदा ओ नवतुरिया
एखनो ताकि रहल अछि
अहीँ दिस,
कियैक त' बाबा
ओकरा लेल
ओहिना छोड़ि देल गेल छैक
फुटलाहा एहिबातक पातिल
कतेको वर्ष सँ अपैत
भगवती घ'र
जंगल भेल आँगन
भुरभुरी भेल तुलसी चौड़ा
आ आन्हर भेल समाज।

मुदा बाबा
निकट छैक ओ समय
जहन सीमेंटेड हेतै आँगन-घर
लाइज़ोल सँ पोछल जेतैक
भगवती-घ'र
गाय'क गोबर सँ
नीपल जेतैक भगवतीक पीड़ी
तुलसी-चौड़ा मे लगाओल जेतैक टाइल्स
पुनः रोपल जेतीह तुलसी
बदलल जेतैक पातिल
आबय लगता लोक
लागय लगतैक जमघट
आ हँसय लगतैक आँगन।

8 . चानक प्रेम

पूर्णिमा रातिक
ठहाठहि इजोरिया मे
जखन एकटक
निहारैत रहैत अछि हमरा चकोर
त' ओकरा आँखि मे तकिते
भ' जाइत छी हमहुँ प्रेमविभोर।

मुदा कतेको योजन'क दूरी
क' दैत अछि हमर मोन झूस
आ खपय लगैत छी हम
खपैत-खपैत भ' जाइत छी अस्तित्त्वविहीन
अमावस्याक राति धरि
आ टुटि जाइत अछि मिलनक आसक ताग।

मुदा किछुये क्षणक बाद
अबैत अछि मोन मे
"कहाँ होइत छैक मिलन ?
कतो' भेटलैक अछि धरती केँ गगन ?
"किनसाइत प्रेमक माने
मात्र मिलने टा नहि होइत छैक !

आ आशान्वित भ'
बढ़बय लगैत छी अप्पन आकार
एहि उम्मीद मे
जे पन्द्रहम दिन
फेर प्राप्त करब हम
अप्पन मूल स्वरूप
आ कम सँ कम
निहारि त' सकब एक दोसरा केँ भरि पोख
एक मास'क बाद।

9 . उठू आब..!

गाम'क सभसँ विशाल गाछी
जियौने छल जे सगरो गाम केँ
अप्पन बिभिन्न उत्पाद आ छाहरि सँ
नजरि लागि गेल छैक जकरा
बाँझ भ' गेल छैक किछ गाछ
सूखा गेल छैक पूरना बर-पीपड़
नवगछली लगेबाक नञि छैक कोनो सूरसार
निसबद्ध सुतल छैक गौंआ
ताहि मे देख रहल छियैक
किछु चिन्हार गाछक पेंपी
जकर उत्पति त प्रकृतिक छैक
मुदा आवश्यक छैक ओकर ताक-हेर
आवश्यक छैक गौंआक कुम्भकर्णीय निन्नक टुटब
गाछीक पटौनी,
किछु गाछ'क पंगहैत
जाहि सँ
जी उठतै गाछी
आ भ' जेतैक फेर सँ हरियर।

10 . सत्य

निकलि जे गेल कट्टा सँ
ओ गोली कोना घुरत ?
निकलि गेल एक बेर मुँह सँ
ओ बोली कोना घुरत ?
कनैत छैक आइ जे बच्चा
ओहो बच्चा खेलेतैक काल्हि
आइ जे आगि मूतय छैक
ओहि मे जड़ि जेतैक काल्हि
छियैक सभ समयक खेला
फेर करोट लेतैक काल्हि
जे छैक निपट मूरुख कलिया
ओ कालीदास हेतैक काल्हि
निशाना ठीक सँ लागय
तखने गोली चलाबी
पहिने सोचि ली सभ बात
तखने मुँह बाबी ।

सुशान्त झा अवलोकित

सुशान्त झा 'अवलोकित'  मधुबनी  जिलाक हरड़ी गामक निवासी छथि । मैथिली आ हिन्दी मे समान रूप सँ लिखय बला सुशान्त इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन मे ग्रेजुएट भेलाक बाद सम्प्रति मानव संसाधन विकास मंत्रालयक छात्रवृत्ति पाबि  राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (भोपाल) सँ डिजिटल कम्युनिकेशन मे मास्टर्स क' रहलाह अछि। इंजीनियर सुशान्तक विशिष्टता आ पूँजी हुनक मधुरगर बोली आ स्वभाव छनि । कविता प्रस्तुत करबाक विशिष्ट कौशल राखय बला सुशान्त दिल्ली रहैत छथि, सम्प्रति गाम मे छथि । गामक सौंदर्य आ सुगमता सँ विशेष लगाव राखय बला एहि कवि सँ हुनका कविताक मादे नीक-बेजाए हुनक फेसबुक यूआरएल https://www.facebook.com/sushant.jha3 वा jhasushant786@gmail.com पर सम्पर्क  देल जा सकैछ ।

Post a comment

1 Comments

Ripunjay said…
नीक कविता सभक संकलन।