रिपुञ्जय कुमार ठाकुरक पन्द्रह गोट कविता

1.
इतिहास

अपन बौद्धिक तृप्ति लेल
डूबैत छी भूतक सागर मे
एहि शास्त्र सँ परिचय होइतो
तर्क-प्रतिपादनक साक्ष्य तकैत छी
प्राप्त होइत अछि पुरातन चित्रलिपि
आ पुनः निस्तब्ध भ'
पोथी संग आँखि चारि करैत
शोध मंथन आरम्भ करैत छी
कि अद्भुत अछि ई बात
सब प्रसंग होइत अछि उजागर
बजाय अतीतक ओ समय।

पोथी सँ सजल अध्ययन कक्ष मे
टकराइत विचारधाराक मध्य
एकटा तूफान ओ सन्नाटा आबैत अछि
आ प्रकशित हमर इतिहासक समझ
करैत अछि निसंदेह प्रति-प्रश्न
अहाँक कोन सूत्र/मेथड अछि प्रबल?
कि ओ पसरल साक्ष्य सँ ऊपर अछि
आ राजनीतिक लुटियन तक सीमित !

अतीत स्वयं चुप छैक 
तैँ
 कि शब्द-ब्रह्म चुप रहतै !! 
विकृत विचारधारा सँ प्रेरित इतिहास लेखन
करैत अछि एंटीक्विटिज पर नियंत्रण
आ भ' जाइत अछि राजसत्ताक औजार
विचारधाराक सुन्दर स्याही मे चमकैत
भ' जाइत अछि कलम पाषाण स्तम्भ
मुदा हमर अध्ययन कक्षक 
नै अछि अतीत सँ कोनो
प्रेम आ द्वेष।

2.
पाथर

जखन कखनो अहाँ अनुभव करबैक 
हम पाथर केवल पाथरे नै छी
हम प्रकृतिक कार्य-कारण छी
जे अहाँ सब दुर्भाग्यत 
सँ बिसरि गेलियैक 
हमरा सँ एना व्यवहार क’ रहल छी
जेना हमरा मे कोनो फीलिंग्स वा जीवन नै अछि
हमरा लग कोनो अतीत नै अछि बतबैक लेल
कि हम इतिहासक शक्तिशाली साक्ष्य नै छी?

हम पाथर अतीतक गौरव धरोहर छी
सबटा बुझितो अहाँ अनजान बनल छी
हमरा लेल नै अछि अहाँक कोनो अनुराग
नै अछि हमर अस्तित्वक कोनो आदर
तखन कोना कहैत छी धरती केँ अप्पन घर ?

आब समय कम अछि
तैँ बाजि रहल छी हम
स्मरण करू हमर ऐतिहासिक शक्ति केँ 
कि पाथर सेहो जीवनक महान अंग अछि।

समयक धाह पर हम शोषित बनल छी
जखन-तखन काटल जाइत छी हम
तइयो अनंतकाल सँ नतमस्तक छी हम
मुदा बहुत भेल आब
ई अन्यायी-निर्दयी अनुष्ठान
आबहु जागृत भ’ जाऊ
आ बंद करू हमर दुरुपयोग
नहि त’ पुनः हम विध्वंशकारी शक्ति पर तांडव करैत
भष्म कए देब अहाँक जीवनक विचार आ अस्तित्व।

3.
भोरक बात

ब्रह्म मुहूर्त मे लालिमा संग नेत्र खोलैत
नित्य धर्म, स्नान, वाच-ध्यानक उपरांत
दीप्ति साँचा मे निखरि,चमकैत, झलकैत
भिंगल बांधल माथाशोभी शिखाक संग
गौरवर्ण देह पर केशरिया वस्त्र पहिरि 
ललाट पर शाक्त चन्दन गंगाजल सँ लगा
गला मे उपहारी सुगंधमयी पुष्पहार पहिरि 
मुख पर ऋषिपुत्रक उन्नत छवि उतारि
अपन नयन-अयन केँ नियंत्रण मे रखैत
निद्रा सँ मौन बहुतेक गाम, नगर होइत
हिमालयी कमला बलान नदी केँ पार करैत
पुष्पवाटिका होइत आश्रण पहुँच  शिघ्रहि 
तपोवनक तरु-शिखर सब केँ प्राणम करैत
अनेक पक्षी केँ काकली गान
भ्रमर सभ केँ गुंजन-गीति आ
सौन्दर्यी जलक कल-कल नाद सुनि 
पुरातन वट-वृक्षक छाया मे बैसल गुरु सँ
शांत, मधुर, गंभीर मुद्राक संग
विनयपूर्ण विद्यानुरागी ब्राह्मण कुमार केँ रूप मे
बृहस्पति पुत्र कर्मसत्ययोगी भ' प्रार्थना केलियनि 
सृष्टिक सर्जक ब्रह्मा गुरु पिता !
अहाँ हमर प्रणाम स्वीकार करु
हम विद्यार्जनक याचक छी
हमरा अपन शिष्यक रूप मे स्वीकारू
स्नेहता आ पुत्र प्रेम पर आसक्त गुरुदेव
हमर माथ पर अपन सरस्वती हाथ फेरैत
अपन करुणापूर्ण छाती सँ लगा
भविष्य सूँघि कल्याणक कामना केलाह
शांत चित्त मे प्रसन्न भ’ आसन्न पर बैसि
कहला पृथ्वी पर किछओ अदेय नहि अछि
गुरु-वाक् सुनि विद्यार्थीगण मधुर स्वर मे
भुनभुनेनाइ सत्यहि आरंभ केलाह
भोरे-भोर पुनः वाक् स्मृति भ’ गेल
ओह कतेक समय बीत गेल
अहि अंतरग सुखमय बात केँ 
मुदा स्मृतिक प्रकृति-प्रवृति अछि की
ई अझुका भोरक बात बुझाइत अछि।

4.
लॉकडाउन

लॉकडाउन मे जीवन भेल बेहाल
घर मे बैसि केँ पढ़ाइ आ लिखाइ 
ओहेन मोनलग्गु नै होयत अछि
आब भानस-भात, बर्तनक सफाइ 
सेहो विवश भ’ करय पड़ैत अछि
पेटक मजबूरी आब कलम सँ झाड़ू पर
ट्रांसफर क' एकटा नबका शोध-काज द’ देलक
मुदा तहनो व्यस्तो रहैत स्वंय केँ निहारैत छी
अनायासे एकटा फोटो खींचा जाइत अछि
आ ओ दृश्य बनि जाइत अछि ऑफिसियल
लोकक मोन मे कतेको उठैत अछि अफवाह।
हम आइ-काल्हि पुरना कुर्सी पर बैसतहि 
सोचैत छी प्री-कोरोनाक जीवन- चरित्र
आ उड़य लगैत अछि मन मे कतेको प्रसंग
टेबल पर राखल पृष्ठ सब मँगैत अछि नब-अक्षर
बेड पर राखल लैपटॉप आब थाकल लगैत अछि
माइक्रोसॉफ्ट-वर्ड बाट जोहि रहल अछि लाइब्रेरीक 
जतय लगैत छैक ओकरा इलीट बुद्धिक हवा ओ धूल।
आब पोथी सब इरिटेट भ’ पड़ल अछि आलमीरा मे
एखन कियो नै कहैत छैक फलाँ पोथी केँ क्लासिकल
कलम-पेंसिल हमरा दिस करुणापूर्ण देखि रहल अछि
आ खिसिया रहल अछि हमर हाथक आँगुर सब आब
मुदा हम अपन टेबल पर बैसि बुद्धक प्रतिमा देखैत
सोचि क' भयभीत भ’ जाइत छी अर्बन डीकेयक बात
आ पढ़य लगैत छी इतिहासक पुस्तक सांत्वना लेल
मुदा भ्रम मे रहितो शांत भ’ लैपटॉप खोलि केँ 
हम लिखैत छी उपर्युक्त बातक इतिहास-पुराण।

5.
हे भारती

सिखा दिय’ हे भारती
हमरो लोकगीतक मीठ गान
ज्ञानक किछु पाँति सँ
करा दिय’ ने किछु मधुपान।
खेतक हरियरि देखि
फूलक किसलय देखि
अर्धनारीश्वरक आकृति देखि
पंछी सभक स्वर सुनि 
समाज ओ संस्कृति केँ परखैत
जग मे भटकैत सिखय छी अहाँ
मुदित भाट कवि सन अप्पन पाठ
आ कहय छी अप्पन बात।
हे वाग् पुत्री सखि ! हमरो सुनाउ
अभिनवगुप्त कृत किछु स्वप्न गान
परिचित छी अहाँ सँ हम हे भारती
करै छी अहाँ सुन्दर कविता गान।

6.
अहाँक शैली

अहाँक शैली हमरा शैली सँ भिन्न अछि
मुदा लक्ष्य मे नै अछि कोनो भिन्नता
अहाँ कमला केँ पूजै छी आ हम जीवछ
एतेक अछि भौतिक-सांस्कृतिक घनिष्ठता
तइयो स्वभाव सँ चंचल मारीच जेना भटकैत 
अहाँ दूरस्थ मठ स्थपित कए भेलहुँ अध्यक्ष
आ उदासीन अखाड़ा मे पालैत छी विच्छेद !
नै पूछत अछि ‘हम’ परंपराक सज्जन लोक
आबो त' पागक वास्ते करू किन्चित शंखनाद।

हम जुग देखि केलहुँ देह पर फलाँ पर्वक मंचीय श्रृंगार
आ निर्लज भट्ट बनि निपुणका संग वात्सयायन बनलहुँ 
तइयो नै लिखल भेल प्रथम अंग-प्रणय पर सूत्र महान
केहेन पुण्य डकार सँ चमचै जनमिते भेलहुँ कवि महान।

हम गाम-नगर आ ब्रह्म-अक्षर पर सेहो भटकलहुँ 
कतहुँ नै भेटल मीमांसा, आ न्यायक एहन दलान
सभटा मिथिले मे चिर विराजमान, यौ हौलमान !
कतेक सौन्दर्यपूर्ण अछि मिथिला-मैथिली अप्पन
प्राचीन काल सँ निज लिपि आ साहित्य विधमान
ज्योतिरिश्वर, विद्यापति, हरिमोहन जगतक मान।

7.
हमर काव्य

हम केवल अपन विचार लिखैत छी
अक्षर सँ शब्दक निर्माण करैत छी
सदिखन वाक्य-दर्शन मे रमैत छी
मुदा हमर काव्य त' अहाँक प्रेम छी।

8.
हमर शुभ क्षण

पुरा गामक दुलरुआ बौआ आइ
सुन्नर वस्त्र सँ सजल देह पर
अंगपोछा लहरबैत
मुख मे पान चिबबैत
खिलैत, ठहकैत, मुदैत आ रमकैत
अपन मित्र मण्डली संगे पुनः आइ 
बड़का दलान होइत जेताह
हमरा प्रसन्न आ दुखी करताह
बरख बीत गेल एकटा दर्शनक लेल
हुनक मुखचंद्र निहारबाक लेल
किछु इम्हर-आम्हरक गपक लेल
भिंसुरका चौका-चूल्हा बाद
हे सखी, हम केना बेसुध रही
कहु ने कने जल्दी सँ !
कहैत छी अहाँ केँ कष्टो मे बड़ धैर्य सँ
किछु सलाह दिय' ! केहन व्यवहार करी
हम अपन निर्दय विष्णु सँ आइ।

सखी बताऊ ने !
कोना हम सजी-धजी
केहन श्रृंगार पर झलकी
कोन रंगक वस्त्र पहिरी
कोन आँचर मे साड़ी बान्ही
हमरा सोचिक जल्दी बताउ 
जाहि मे हम रमणीय बुझाइ 
आ शोषणके रंग मुख पर बुझाइ 
नहि जानि हमरा की भ' गेल
नहि जानि देह कियैक सुखि गेल
हमरा अहाँ कियैक निहारि रहल छी
की हम शकुंतला सन लागि रहल छी ?

आइ साँझ धरि हुनक
अयबाक समाचार अछि
हम योजना बना लेलहुँ
पछिला दरबज्जा सँ हुनका देखबनि
हमरा दिस ओ नजरो नहि दौड़ेताह 
हम पहिने सँ खूब बुझैत छी
हमरा एकर अनुभव अछि
कनी कालक बाद पलक खसतैक
ठाकुरबाड़ीक रंग मंच होयत भंग
एक बेर फेर हमर अपमान होयत
पुनः ओ हमरा सँ बहुत दूर-सुदूर
जिबिताह महानगरक मायाजाल मे
अपन नगर विषकामिनी प्रेयसीक संगे
पुनः होयत हमरा लेल विरह दुःख
आ ओ अपन कुलक कामदेव बनि
नाचैत रंगीली कुल भंगिमाक संग
खूब श्रृंगार आ रसक आनंद लेताह
लोक सब देखताह नीक सँ मुसकैत ई सभटा।

सखी अहाँ तँ देखने छी
हुनक मृदु सहज स्वभाव
ठाट-बाट आ मर्यादित अभिमान
व्यक्तित्व सँ ओ सद्गुण प्रस्तुत हेताह
पर पूर्ण दिखावटी लागत आब
तइयो हमर लाज राखु हे
हे सखी, हमर विष्णु आइ
अपन मृदु मुस्कानक संग
आइ बड़का दलान होइत जेताह
सिर्फ ओहि एक क्षणक लेल
बिनु सजल धजल कोना रहू ?

सखि हमर बभना आइ
अपन संसारिक सम्मान मे डूमल
ठाकुरबाड़ी होइत निकलि गेलाह
चानक अन्हार सन प्रकाश मे
निसोख बनि गाड़ी पर चढ़ि गेलाह
हम अंगनाक पुबरिया गेट पर आबि
घुँघुट उठाकय चमकैत हुनका देखलहुँ
एक क्षणक लेल हुनकर दर्शन भेल
विधाते बुझताह ओ केहन निष्ठुर भेल
हम किछु काल धरि मौन भ' गेलहुँ
किछु नहि दृष्ट भेल प्रकाशवान
हम अपन रूप सजावट पर हँसैत
क्रोधक ज्वाला मे स्वयं केँ जरबैत
वैदिक मन्त्र सँ दीक्षित मंगलसूत्र
आभूषण अपन वक्ष स्थल सँ उतारि
गाड़ीक पहियाक नीचा फेकि देलहुँ
हुनक प्रस्त मार्ग पर निर्भीक
ओ हमर बिखरल मोती केँ देखि
किन्चित लज्जित नहि भेलाह
पहियाक नीचा सभटा रंग-भंग भेल
हमर श्रृंगार श्राप मे भष्म भ' गेल
संपूर्ण जीवनक आहूति भ’ गेल
शेष शरीर आ दुःख रहि गेल
आब अपन तर्पण अपने करब
एतबे अनुष्ठानिक काज रहि गेल
हे सखी, देखु न आब खाली
पहियाक गर्दा रहि गेल
सखी अहाँ केँ की भ' गेल ?

9.
देवी

पोखरिक महार पर बहुतेक मंदिर छैक
अनेको देवी देवताक मूर्ति सँ सुसज्जित
रंग-बिरंगक फूल,पीपरक गाछ पसरल छैक
स्थान राजा महाराजा सँ सम्बंधित अछि
तंत्र-मंत्र विद्याक सेहो प्रख्यात केंद्र रहल
श्यामा मंदिरक सिद्धि अछि खूब प्रसिद्ध

काली मूर्ति एतय बड़ अछि विशाल प्रचंड
ततबे सुनैत छी हुनक महिमाक महामंडन
परम्परा आ आधुनिकताक मध्यस्थ भ’
आनंदक स्रोत्र अछि ई शक्तिपूजा स्थल
हम चप्पल उताड़ि
देह पर जल छीटैत
अड़हुल फूलक माला कीनि
मंदिर प्रांगणक अभिलेख पढ़ैत
सजल माथ पर शाक्त चन्दन करैत
भगवती प्रतिमाक दर्शन केलहुँ
आ हुनका सँ आशीर्वाद लेलहुँ
आँखि ठहरि गेल मूर्ति पर किछु काल धरि हमर
नीक जकाँ भेल हमर विश्वास केँ तृप्ति।

मंदिर सँ घुरैत काल
आनंद मे अंगड़ाईत छलहुँ
मार्ग मे आँखि दौराबैत छलहुँ
तखने एकटा स्त्री अपन माथ पर

भीष्म ग्रीष्म ज्वाला मे
लकड़ीक गठ्ठर उठेने जाइत छलीह
बड़ तीव्र सँ मुर्झायल ख़ुशीक संग
नंगा पैर करिया-तापैत धूल मे सनल
पर माथ उठल उन्नत छवि ओकर
सुनर रूप पर छल हँसी स्फंद
मजूर बनि अजीविका कमाइ सँ
ओ निर्भीक छल भोजन लेल ।

ओ देवी छलथि निर्वासित
अपन घर आ समाज सँ
ओकर लहराइत केश
आ सुन्दर हँसैत मुख पर
नुकायल दर्शित भेल कठोर जीवन
ओकर सौन्दर्य सँ जरैत किछु लोक
निर्दय भ’ कलंक थोपि बुझा देलक
ओकर समाज मे पसरल सम्मान
पिया बिनू भासि गेल ओकर रंग
पर नहि सरापलक ओ समाज केँ
हम चप्पल नै उताड़लहुँ
देह पर जल नै छीट
लहुँ
अड़हुलक फूल नै ले
लहुँ
देवसेना केँ प्रणाम नै के
लहुँ
कोनो इच्छा केँ प्रार्थना नै के
लहुँ
कोनो आत्मिय सम्बन्ध नै बने
लहुँ
तइयो देवीक दर्शन प्रत्यक्ष के
लहुँ

10.
लुत्ती

गंभीर मुद्रा मे बैसल
सोचैत, लिखैत, पाठ करैत
हमर टेबल पर टकराईत छैक 
कवि हृदय केँ मानल बात
इतिहास,दर्शनक समझ-सूत्र
शब्द सँ शब्द
विचार सँ विचार
अंत सँ अनंत
कलम संग एकटा लुत्ती उठैत छैक 
आ हमर कविता मे प्रक्रियात्मक
अक्षर सँ शब्द आ वाक्य निर्माण करैत छैक 
लुत्ती नहि त' रचना नहि।

11.
हँसमुख कवि

मनुक्ख मुँह सृजनक वाक्य होइत अछि
कविता समाजक प्रबुद्ध आवाज होइत अछि
किछु कविक चेहरा हँसमुख होइत अछि
हँसी मे सत्य,असत्यक दर्शन होइत अछि
दुक्खो मे कवि-बउवा सब कूल रहैत छथि।

हँसला सँ थकैत नै अछि बुद्धिक देह
बर्फ जेना पसरल अछि मिथिलाक दुर्दशा
मैथिलीक हाल नै कहब! सब भेल वाचस्पति
राजनीति अंतःपुर मे मनोरथक शिकार भ' क'
जड़बैत अछि कविशेखरक दालान-मचान
भ्रष्ट व्यवस्था पर, 
धूर ! वज्रपात कियैक हेतैक ?

कविता नै होयत त' साहस आ धैर्य नै होयत
तहिना हँसी नै होयत त' चर्चा-बंधुत्व नै होयत
आ मैथिल वाङ्गमयक प्रचार प्रखर नै होयत
मुँहक सौंदर्य ओकर संस्कृतिक चित्रण थिक।

मुँहक हाव-भाव ओकर विद्रोहक द्रष्टव्य थिक
ओहि ललाट केँ देख पागी-धूर्त सब फदकैत छैक
कवि सब भुतही मुस्कान पर कियैक नचैत छैक?
ओहि चेहराक शब्दरहित भय आगि छैक
मुदा हमरा विचार मे ओ केवल नजरि छैक।

12.
उपहार मे की दी...!

तरंग चुम्बित बागमती तट पर
खिलल बड़का वन वाटिका केँ
पल्लवित सुगंधी किसलय डोलि
गुंजित वातावरण मे गाछ सब देखैत
ठंड मकरंदक आलोक मे चुपचाप
अविरल बहैत नदी केँ महार पर बैसि
स्वच्छन्द सोचैत छी मधुकरी केँ बात
हुनक त्याग केँ सवाभावी अभिमान
हम मधुकरी केँ उपहार मे की दी !
भाष्कर केँ वृहद् कविता गान
मुदा प्रकृतिक नियमक अनुसार
दिन बितैत साँझ होइत छैक आ
इजोत केँ दिशा दोसर भ’ जाइत छैक
त' पूर्ण नहि होयत ई दान
स्वयं केँ दान करय छी हुनक समक्ष
तइयो नै कटत हमर किन्चित पाप।

शकुन्तला हमर
घोर निर्दयी अछि अभिनवगुप्त
अहि मे प्रकृति केँ नै कोनो दोष
स्वीकार करैत छी अपन घोर दोष
वर्षक बाद स्मरण आयल ओ प्रसंग
अपन यौवन वासनाक मदहोशी मे
चोरा-नुका अहाँक मुख दर्शन लेल
गामक चौराहा पर भ्रमण करै छलहुँ
अहाँ केँ सुन्दर आभरण चोराबय लेल
फलाँ बाबूक दलान पर बैसैत छलहुँ
मुदा नहि जानि ककर नजरि लागल
की हम भ गेलहुँ अहाँ सँ भौतिक दूर।

शकुन्तला अहाँ केँ उपहार मे की दी!
पुष्पगंध आ श्रृंगारिक गीतक गान
अनंत मलिन प्रेम आ प्रेम प्रसंग
अहाँ मलिन आ दुखी भ’ सकैत छी
त' हमरा संग आब समय नै बिताऊ
प्रिये आब अभिनव सँ मुक्त भ’ जाऊ
एहि मे अहाँक कल्याण अछि
की अहाँकेँ दी संध्याक प्रज्ज्वलित प्रदीप?

मधुकरी, आँखिक नोर नहि मिटायत
अहाँक संग हमर दुर्व्यवहार
विधाते बुझैत छथि कतेक दुःख देलहुँ
अहाँ केलहुँ असीम विश्वास हमरा पर
किंतु उपहारित भेलहुँ सूर्यास्तक प्रलय लेख सँ
दुखक स्मृति बर्दास्त सँ फिजूल भ रहल अछि
आइ हमर निर्दय घमंड धोखरि गेल
द' देलक हमर अंतरात्मा आब उत्तर
की हम धर्मराज बनि स्वयं केँ दंड दी
आ मधुकरी सँ अविलंबित न्याय करी
हे सखी एकटा विनती मानू हमर
क्षणिक देरी केँ खड्ग धरु अहाँ
आ न्याय करू अविलंब स्वयं
हे रुद्री आब हमर अंत करू
बड़ भेल मुग्ध मे कामी खेल
सखी अपन उपहार स्वीकार करू!!

13.
बरखाक राति

मोर नर्तन सुनि अहाँ खिलि रहल छी
बरखाक समय लगचियायल अछि
काम-रति लीला रचि रहल छथि
अहाँ कामिनी मे श्रेष्ठ छी
आइ बरखाक राति अछि
नीक भेल कुदिवस चलि गेल
चान,कुमुद दुनूक संगहि दर्शन
अपन अलौकिक नेत्र सँ भेल
कतय
 अहाँ बंग आ हम मैथिल 
अकस्माते दुनूक आँखि मिलि गेल।

भगवती दहिन भ' गेल छथि
उद्वेलित भ' रहल अछि हृदय
जागि रहल अछि मिलनक कामना
कमल जेना देह कोमल अछि हमर
इच्छो सबल होइ मे असमर्थ अछि
विरह दुक्ख सहन नै भ' रहल अछि
शीतल चांदनी देह जरा रहल अछि
आबो त' अहाँ प्रिय केँ स्मरण करु?

एकटा चान आकाश मे अछि
दोसर चान अहाँ केँ माथ पर
चौदिश हम अहीं केँ देखैत छी
मुदा अहाँ केँ परिजन परमिल जेना
हमरा संग कटु व्यवहार करैत छथि
अहाँ संग पुष्पवाटिका जाइत हमरा
सिद्ध-लोकलाजक भय होइत अछि
मृगी अहि साओनक राति मे
चान कोमल आकृति मे श्रृंगारित छैक 
दक्षिण पवन सँ पराभव पाबैत छी
एतेक कष्ट केवल अहींक लेल सहैत छी।

कामिनी अहाँक चालि अलसायल अछि
देहक विभा-विंची अनियंत्रित अछि
कामुक बात लाजहीन भ' बाजि रहल छी
कामदेबक मोह मे हेरायल छी
कतेक बेर देह ऐंठी रहल छी
अहाँ केँ मुँह सँ सुगंध आबि रहल अछि
कि अहाँ एलिट सोम रस पान कयने छी?

चंदनक लेप मुँह मे पोतने छी
जाहि सँ पूर्णिमाक चान अर्धखिलित
नजरि आबि रहल अछि।
अहाँ त' प्रकृतः सुनर विदुषी छी
तइयो अपन आँखिक काजर सँ
कारी कियैक क' लैत छियैक ?
गोर पुष्ट स्तन स्वर्णक कटोरा थिक
कुमकुम सँ सजल ओ सुंदर लगैत अछि
मुदा आँचर सँ सुमेरु ओझल भ' जाइत अछि।
अहाँक केश-पाश अस्त व्यस्त अछि
लाजे ठहक्की मृदु हँसी गुप्त अछि
हे कमलनयनी शीतल सखी
अहाँ कियैक नै नै करैत छी?

14.
पहाड़क बात

सौन्दर्यमय पहाड़ सँ नीचा उतरि
मेघके निहारलहुँ त' बुझायल
हम ठीके प्रकृतिक कोरा मे छलहुँ !
पहाड़ तोँ भावनात्मक नै छेँ
तोरा मोन नै होइत छौक पोसय केँ 
बजबैत छेँ दूर-सुदूर सँ आ मोहैत छेँ
तहन उतरय लेल किएक कहैत छेँ
किया स्मृति आबि जाइत अछि अपन काजक 
आश्रयक, जिम्मेदारी नै उठबैत छेँ
त' बनैत छेँ तोँ कियैक सुन्दर, पहाड़
हम उतरि अबैत छी,
की हम उतरि पबैत छी?
पछताइत, सोचैत तोहर गुण बखानैत छी !
आह ! हम उतरलहुँ कियैक !!

15.
सृजन

हम की कहूँ
हमर सृजन केवल
जे हमर सृष्टि छी
हमरे नहि थिक
हमर आलोक-विचार
हमर दैवीय-दैत्ययी सुगन्ध
यथास्थिति आ शुभ्र-शाभ्र
थिक समस्त समाजशास्त्र
समस्त वेद-पुराणक समझ
संस्कृति आ प्रकृतिक प्रवृत्ति
सृष्टिक आदिकाल सँ आइ धरि
हमर शंख अतित सँ वर्तमानक संवाद थिक
हम सरस्वतीक आशीर्वाद सँ बान्हल छी
वर्तमान केँ विवश चिंतक राजन दिलीप छी
भविष्य बुद्धिजीवी केँ भ्रम मे भोगैत रहब
हे हमर ओझरायल-परिसुद्ध लोक सब
हमर सृजन केवल
हमरे नहि थिक।

रिपुञ्जय कुमार ठाकुर
श्री रिपुञ्जय कुमार ठाकुरक मैथिली साहित्य ओ कविता मे रुचि ओहि महिनाम हाई स्कूल, दरभंगा मे पढ़ैत काल भेलनि जतय मैथिलीक विशिष्ठ विद्वान लोकनि पढ़बैत छलाह। श्री ठाकुर उच्च शिक्षाक हेतु दिल्ली अयलाह आ दिल्ली विश्वविद्यालय सँ इतिहास मे स्नातक, परास्नातकक बाद एखन पूर्व-मध्यकालीन मिथिलाक इतिहास पर रिसर्च क' रहलाह अछि। इतिहासक अलावे मैथिली, संस्कृत आ हिंदी मे हिनक विशेष रुचि छनि। हिनक 7 टा सँ अधिक शोध-पत्र विभिन्न प्रतिष्ठित शोध -पत्रिका ओ पुस्तक मे प्रकाशित छनि। मैथिली कविता सेहो प्रकाशित-प्रशंसित होइत रहलनि अछि। मिथिलाक संस्कृति ओ इतिहास पर आधारित शोध पुस्तक 'मड़बा'क एकटा संपादक आ लेखक श्री ठाकुर कतेको कॉन्फ्रेंस ओ सेमिनार मे अपन शोध पत्र प्रस्तुत कयने छथि । पुरातत्विक खुदाई मे भाग लेनिहार श्री ठाकुर संस्कृत भाषा मे सेहो संस्कृत विभाग ,दिल्ली विश्वविद्यालय सँ डिप्लोमा कयने छथि। पाँच टा सँ बेसी प्राचीन लिपिक जानकार श्री रिपुञ्जय सम्प्रति दिल्ली मे रहैत छथि । हिनका सँ हिनक मोबाइल +91-9555399751 पर संपर्क कयल जा सकैछ ।

Post a comment

0 Comments