अयलै शुभ के लगनमा, शुभे हे शुभे... (कथा) — विभूति आनंद

          से पूरा-पूरी बेचैन-स्थिति रहै ।

          स्नेहिका दुष्यन्तक ह्वाट्सऐप, कि फोन, किछुओ 'इंटरटेन' नहिक' रहल छलै । कतहु ओकर मोन-तोन, आकि मोबाइले तँ ने हेरा गेलै ! नहि तँ पारिवारिक स्तरपर कोनो असुविधा भेल हेतै ! आखिर किछु तँ भ' सकैत छै ! एहि युग मे फोन सँ क्यो निरपेक्ष रहि सकैए की ! ओना भ' सकैत छै, लगनक हूलि-मालि छै, कतहु भासि ने गेल होइ ! 

          दुष्यंत फेर सोचलक, न:, जँ तेहन सन किछु रहितै, तँ कहैत ! आत्मीय अछि ओ । ओना नखरो कम नहि करैए । आ से बुझू अधिकारे सँ करैए ! हमरा पर आँखि मूनि क' विश्वास छै...

          तथापि, एकटा बड़का दुर्गुण छै !ओ कोनो गप खुलिक' आकि साफ-साफ नहि कहत ! बजैत काल ओकर अन्दर मे 'किन्तु-परन्तु' चलैत रहैत छै...

          वस्तुतः इएह ओकरा मे पैघ दुर्गुण छै । बड्ड गहींर अछि । तहिना चंचल सेहो । आ निचोरक गप कही तँ इएह साम्यता हमरा-दूनूक मित्रताक न्यो सेहो अछि ।

          मुदा एकटा बात तँ लिखबे बिसरि गेलहुँ ! कोनो गपक बेसी खोधबेद करियौ तँ 'ईरीटेट' होइत बिगड़ितो देरी नहि होइत छै । से कैक बेर विवाहे-प्रसंग पर उखड़ि सेहो चुकलि अछि !

          से एही सितम्बर मे तँ ! बेमतलब उखड़ि गेलि ! से हमरो तँ भावना अछि ने, एहि व्यवहार पर गप्पे केनाइ छोड़ि देलिऐ । फेर जखन पीड़ा बसियायल, प्रकारान्तर सँ टोकनाइ शुरुओ क' देलिऐ ! फेर ओहो संयत भेलि । मुदा पुछला पर फेर वएह पुरने टेप चला देलक– 'देखियौ !...'

          असल मे ई कुटमैती-प्रकरण बहुत मुश्किल भरल होइत छै । पहिने दुनू पक्ष मे खूबे कूटनीति चलैत छै । तखन जा क' अंत मे मैत्री होइत छै । माने, कूट+मैत्री= कूटमैत्री ! सएह ठेठ मे आबि भ' गेल हेतै 'कुटमैती' ! तें ओ अपन गप-सप सँ किछु स्पष्ट एहन सन संकेत नहि द' पाबि रहल छलि, आ से हम बुझैत रहिऐ...

          तथापि ओ अंतरंगता एखन जेना तामसक चपेट मे अछि । तें मोनहि-मोन दुष्यन्त ओकरा सँ कट्टिस क' लैत अछि । फेर पश्चातापो करैत देरी नहि होइत छै– धत्, ई की करा गेल ! मुदा की करितिऐ ! ओ व्यवहारे तेहन कयलक ! खैर, आब एहि कट्टिस कें कट्टिस... कट्टिस... आ कट्टिस...

          कि तखने मोबाइल बाजि उठलै । दुष्यन्तक तामस मिनट मे फुर ! लगिते ने छलै जे ई मनुख तामसो क' सकैत अछि ! मधुरायल चउल बहरयलै– 'चारि दिन स' कतय सूतल रहिऐ !'

          – 'नै, सुतबे कहाँ केलिऐ !'

          – 'तखन ! फोन किएक ने उठबैत रही ?'

          स्नेहिका चुप । चकित दुष्यन्त फेर 'चेक' कयलक– 'हँ, हलो !'

          – 'हँ, बाजू न !'

          – 'अहाँ चुप किएक छी ! बियाह ठीक भ' गेल की ? कत' भेल ! अरे किछु त'...'

          – 'आर अपन कहू, ठीक छी न !' ओ दुष्यन्तक सभटा आतुरता घोंटि, बाते बदलि देलक । आ से ई टेकनीक ओकर पुरान छै...

          मुदा एही बीच दुष्यन्त अख्यास क' बैसल जे स्नेहिकाक स्वर मे उल्लास नहि छलै ! मुदा से किएक ? यदि विवाह ठीक भ' गेलैए, तँ स्वभाविके, गदगद रहबाक चाहैत छलै ! हम तँ कहबो करिऐ जे स्नेहू, आब अहाँक विवाह भ' जयबाक चाही ! 'परफेक्ट' समय मे विवाह भेने जीवन सेहो 'परफेक्ट' बीतैत छै । आ एखनुक हिसाबे इएह 'परफेक्ट' समय होइ छै...

          दुष्यंत पल मे एतेक सोचैत-सोचैत फेर एकटा तुक्का छोड़लक– 'हमरा त' से बूझल रहय, दसे तारीख के ने !'

          ओ फेर चुप्प भ' गेलि । एकरा भेलै किछु चोरबैत अछि । फेर सोचलक, आब एहि मे कोनो शंका नहि । ओना, 'छ...' सनक कोनो आखर कान कें जरूर स्पर्श कएने रहय !

          मुदा दुष्यन्त एहि स्थिति सँ अपना कें तुरंत उबारि लेलक । कतबो निकट हो, लाज भ' आयल हेतै । एहन सन स्थिति मे एना संभव छै । ओना ओ तँ कएक बेर प्रायः बाजल सेहो अछि जे लाज तँ हमर सभक गहना अछि !

         तें कुमारि-वारिक अन्दर एहन सन पियरगर डरक भाव अस्वाभाविको नहि छलै । हमरा एहन-ओहन बात पर ठीके 'रियेक्ट' नहि करबाक चाहैत छल  ।

          सरिपहुँ, एखन तँ ओ सोचैत होयत जे केहन हेथिन हमर देवता, बात-विचार केहन-की हेतनि ! हम पगलिया, हुनका संग 'ऐडजस्ट' क' पयबै कि नहि ! आ ताइ पर सँ गाम-घर, संबंध-सरोकार, सभ टा तँ अनभुआरे !...

          कि दुष्यन्तक चिन्तन-क्रम भंग भ' गेलै । स्नेहिका नहुँये बाजि उठलै– 'सुनू न, एक बजेक बाद गप करै छी !' आ ई जा किछु उत्तर दितय ओ स्विच ऑफ क' लेलक । 

          संयत-मन दुष्यन्त, तकरो तुरन्त मे अनुकूले भ' सोचि लेलक, जरूर नुका क' फोन करैत छलि होयत !

          दुष्यन्त कें मुदा फेर अचरज भेलै ! एहन अबल तँ नहि छलि स्नेहिका, जे एक पारम्परिक लड़की सन व्यवहार करय ! एकर मोन पाछू चल अबैत छै । बेसी नहि, इएह वर्षक शुरुआत मे ! हँ, लॉकडाउन सँ कने पहिने...

          गपसप मे चर्चा केने रहय । एकटा कथा कहाँदन लगभग ठीको भ' गेल रहै । मुदा कोरोनाक चलते रुकि गेलै । बाद मे तँ टुटि सेहो गेलै कहाँदन । नहि, दुष्यन्त कें मोन पड़लै, कहाँदन नहि, ठीके मे टुटि गेलै ।

          ओ खुश भ' गेल रहय । आ तकर कारणो रहै । ओ समान पेशाक लड़का सँ विवाह नहि कर' चाहैत छलि । एहि ल'क' अपन मम्मी लग प्रत्यक्ष विरोध सेहो कएने रहय । 

          मुदा बेटीक मनोरथ, ताहू मे एहि बैकवर्ड क्षेत्रक बेटीक मनोरथक एखनो कतेक मोजर देल जाइत छै ! आ स्नेहिका तँ बैकवर्डो मे बैकवर्ड इलाका सँ अबैत अछि । तखन, पढ़ि-लिखि गेने थोड़े सन आँखि-पाँखि भ' गेल छै । आ तें ओकर मानसिक उड़ान सेहो कने-मने सेयान भ' गेलैए । 

          से दुष्यन्त कें ओ कहने रहै, हम तँ जे हेतै, धरि नहि करबै ! मम्मी ने डपटि देलकै, आब पापा जी कें सोझा-सोझी भ' क' कहबनि ! जँ से साहस नहियों भेल, तँ पापा जीकें सुना क' मम्मी कें जोर-जोर सँ कहबै । एखन जँ चुप रहि गेलौं, तँ जीवन भरि चुप्पे रहि जाय पड़त...

          ओ तहिया ई सभ कहितो-कहैत मुदा बड़ उदास भ' गेलि रहय । आ फेर तँ कोनो सपना जकाँ किछु देख' लागलि रहय– हम एहिना रहब । एहिना ठीक छी हम । विवाह ततेक जरूरियो तँ नहि छै ! ई तँ शरीरक मजबूरी मात्र छै । मुदा हमर मोन तँ मजबूर नहि अछि ! ओहुना, एहि 'चेन' कें तोड़बा लेल ककरो 'बोल्ड' डेग तँ उठाबहे पड़तै। आ संसार मे तँ एहन-एहन डेग उठौनिहारक कोनो अभावो नहि छै । ओना, ई अलग बात छै जे एखनो एकर सभक आम स्वीकार्यता नहि भ' सकलैए । तैयो मोन कहाँ मुइलैए, ओ तँ सतत प्रयास मे लागले रहै छै...

          ओहि दिन स्नेहिका काफी मुखर लागल छलि । कहने रहय जे ओहुना हमरा कोनो दिक्कत नहि अछि ! नोकरी करिते छी ! तें किनको भारो नहि छियनि ! तखन कहू जे एक परम्परागत संस्कारक चलते...

          से दुष्यन्त कें मोन पड़लै, थोपल विवाहक विरुद्ध मुखर स्नेहिका अंत मे बाजलि रहय– 'आ नै त'...' 

          आ कहैत-कहैत हमरा दिस देखि बिहुँसि उठलि रहय !...

          से तखने दुष्यन्त कें एकटा आर घटना स्मरण मे आबि गेलै । ओहि दिन ई 'जॉली मूड' मे रहय । आ तें पुरना कोनो फिल्मी गीत गुनगुनाइत रहय । से खुशीक क्षण मे ई एहिना गुनगुनाइत रहैए । कि तखने रिंग भेलै । बामा हाथे रिसीव कयलक । फेर कान मे सटौलक । मुदा ठोर तँ गुनगुनाइते रहलै । कनी देर बाद बोध भेलै, तँ बाजि उठल– 'हँ, हलो ! के ?'

          मुदा ओमहर सँ 'चू' शब्द नहि । साँस चलबाक मद्धिम आभास धरि बुझाइ । फेर ई फोन कें सामने अनलक आ नाम पढ़िते फक् ! से जा-जा किछु बाजय, स्वर अयलै– 'यो हमर हल्लो जी !'

          – 'अँ !' एकर कंठे जेना फँसि गेल रहै ।

          – 'एकबेर फेर स' गुनगुनबियौ ने ! प्लीज !'

          आब की करय ! जेना बकारे बंद ! सोचलक, 'बंदा गयो काम से !' ई तँ सदाय सँ 'बाथरूम सिंगर' रहल अछि ! मुदा आब ? ओना फोन सँ 'प्लीज प्लीज'क टेप चालूये छलै । 

         अंततः सोचलक, स्नेहिका सँ कोन लाज ! ई एकर जीवनक पहिल फिल्मक प्रिय गीत रहै, शुरू भ' गेल– 'हम तुम एक कमरे में बन्द हों, और चाबी खो जाय ! सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो...'

          – 'वाव, क्या हो ?' जेना फोने पर स्नेहिका उछलैत सन प्रश्न क' देने होइ !

          दुष्यन्त 'जॉली मूड' मे रहबे करय, 

कनी भरिया देलक– 'ठीके, क्या हो ?'

          स्नेहिका सेकेंडो देर नहि कयलक, आ लजाइतो-लजाइत बाजि गेलि– 'क्या हो, किछु नै हो...'

          – 'तैयो जँ किछु भ' जइतै, त' की होइतै !'

          – 'की होइतै, भ' जैतै त' भ' जैतै !'

          एकरा तँ 'काटो तो खून नहीं !' धरि रक्ष रहलै जे स्नेहिके अपने स्विच ऑफक' देलकै !...

          आ तकर बादे दुष्यंतक आकुलता तेसरे मोड़ पर आबि ठाढ़ भ' गेलै । एकरा आब लाग' लगलै, हमर निज अपनकें क्यो जेना साधिकार छीनि लेलक ! जे काल्हि धरि हमर छलि, ओ...

          ई उदास भ' गेल । खाली भ' गेल ई । ई असहज भ' गेल । हँ हँ, स्नेहिका हमर छलि । हमरे टा छलि । मुदा आब ओ...

          से मोन पड़लै, दुनूकें फोन पर घंटो विमर्श होइ । से दुनू कें नीको लगै । दुनू रूढ़ समाजमे बदलावक आकांक्षी । आ तें दुनू कोनो-ने-कोनो अवसर ताकि, विमर्श करबाक लेल समयो निकालि लिअय ।

          जेना ओही दिन ! 'वीकेण्ड' आ प्रात भ' क' 'सण्डे' रहै । ड्यूटी पर ककरो जयबाक चिंता नहि । से साँझे चाय-पानी के बाद दुष्यंत कॉल कयलकै । आ थोड़ेक सनक आहे-माहे बतियलाक बाद दुष्यन्ते ओकरा टोनब शुरू कयलक– 'बुझलहुँ ने स्नेहू, हमरा कखनो-कखनो बुझाइत रहैए कि ओ पुरने समय ठीक रहय ! परिवार, परिवार सनक लगै । मुदा आब त' किदन भेल जाइत छै ! बस, सभक 'एडजस्टीय' जिनगी ! आ से अपन भारतीय परिवेश मे नीको नै लगै छै !...'

          – 'ऑब्जेक्ट मीलॉर्ड ! हम एना नै सोचै छी ! आब लड़की पढ़ि-लिखि रहलै अछि, ओकरा सेहो आँखि-पाँखि भेलैए, आत्मविश्वास बढ़लैए, अनेक क्षेत्र मे तँ ओ सभ लड़का पर बीस पड़ि रहल छै ! हमरा नीक लगैत रहैए ई सभ । एहि सँ ओकरा सभ मे अधिक तिव्रता सँ आत्मविश्वास आ आत्मनिर्भरता बढ़ि रहलैए । आब ओ सभ ओंगठल आ बन्द-बन्द सन जीवन सँ मुक्ति चाह' लागल अछि...'

          – 'तखन त' अहूँ जहिया बियाह करब, जरूरे ओ नोकरी-पेशावला...'

          – 'स्योर, ह्वाई नॉट ! आ ओकरो बुझल रहतै हमर होब'वाली लाईफपार्टनर नोकरी-पेशा स' अछि । ई सभ टा 'क्लेयर'  भेले पर त' सम्बंधक मोहर लगतै !'

          – 'किन्तु...'

          – 'किन्तु नै, तय ! संगे ईहो तय जे विवाह-बाद श्रीमती स्नेहिका देवी त्यागक प्रतिमूर्ति बनि सर्विस स' ने रिजाइन करती आ ने अपन देवताक सेवा-सुसुरखा करैत बंद-बंद जीवन संग कुंद होइत जयतीह ! हमर जीवनक 'क्लेयर फण्डा' अछि– पहिल नोकरी, देन आहे-माहे ! मतलब दाम्पत्य !' 

          आ धुन मे बजैत ओकरा किछु कूट फुड़ा गेलै– 'ओहुना त' सुनै छिऐ, जे बेसी दिन पर भेंट भेला स'...'

          – 'त' माने जे निरंतर संग-सुख सँ दाम्पत्य अरुआ जाइ छै !' दुष्यन्त गंभीर रहय ।

          – 'प्रभो, हम एतेक घुरछी नै जनै छी ! विवाह एक टा आपसी सामंजस्य छै, आ जाहिमे पति-पत्नी, दूनूक स्वतंत्र सत्ता छै । हमरे त' एक सहेली मुम्बै मे अछि आ ओकर लाईफपार्टनर सुदूर चेन्नई मे । एक वीकेंड मे ई जाइत अछि, एक मे ओ अबै छै ! आ से दूनू प्राणीक ई मोबाइल-जीवन खूबे तंदुरुस्त चलि रहल छै । विदेश मे त' कहाँदन ई सभ 'कॉमन' छै !'

          ताहि दुष्यन्त कें आइ ओ सभ टा सपना लगैत छै ! जे स्नेहिका एहन-एहन ओपन डिस्कशन करय, से आइ हमरे सँ गोपनीय भ' परिणय-डोर मे बन्हा गेलि !

          से ओहि दिन तँ आर शोकाकुल भ' गेल रहय, जहिया अमर जी एकरा फोन क' क' पुछने रहथिन– 'आबि गेलौं दुष्यंत बाबू बियाहक हकार पुड़ि क' ?'

          – 'किनकर बियाह ! मोन खराब रहने हम त' तीन दिन सँ जेना कोरेंटीन भेल छी !'

          – 'अच्छा, त' अहाँ के किछुओ पता नहि !'

          – 'झूठ किएक कहब !'

          – 'अरे इएह एक्के दिसंबर क' ! स्नेहिका जी हमर ऑफिस आयल छली !'

         – 'अच्छे, की !'

         – 'आशीर्वाद लेब' ! कहलनि, हमर बियाह भ' रहल अछि !...'

          – 'अरे वाह ! कहिया, कत्त' !'

          से जेना हुनका पूरा बूझल रहनि । आ हम तँ जेना संज्ञाशून्य भेल जा रहल रही ! आ ओ हमरा विवाहक संगे नाम, ओकर स्टेटस, पदस्थापन आदिक मादे सूचना देने रहथि । संगे मुदा दुखो, जे एक बेर कटसीयो मे अयबा लेल नै बजली...

           आब तँ दुष्यंत कें साफ बुझा गेल रहै जे एखन धरि झूठ मे बौआइत रहलहुँ । हमर विश्वास झूठ रहय । संगहि एकरो कचोट, जे हमरा ककर श्राप पड़ल अछि जे ई तमाम घटना-क्रम एकटा तेसर सँ सुन' पड़ल । असल मे इएह मूल पीड़ा ! हमरा अपन विश्वास पर खखार फेकबाक इच्छा भेल । ओह...

          मुदा नहि जानि, एतेक होइतो, आ अपना पर तामस करितो, दुष्यन्त मोन कें मनबैत फेर सँ घमि गेल । 

         से स्वयं सँ पुछलक, एते अबडेरल जयबाक बादो एहि स्नेहिका प्रति निर्मोह किएक ने भ' पबैत छी ! हम किएक ने सदाक लेल कट्टिस क' लैत छी ! हे ईश्वर, ई केहन अंतर्धारा अछि ! 

          आ से तुक पर मोन पड़ि अयलै, कोनो अंतरंग पल मे स्नेहिका कहने रहै– 'सुनू न, ई अनेरो मोन के नै बौआउ ! जे जीवन एखन अहाँ जी रहल छी, तकर त' क्यो कल्पनो नै क' सकैए !...'

          आ लिअ, दुष्यन्त फेर घमि गेल !एकरा तँ आर खुश होयबाक चाहैत छलै । किछु अपरिहार्य कारणे सँ ने बात नहि क' सकल होयतै ! आकि एकान्तक खोज मे रहि गेल हेतै, आ समय ससरि गेल हेतै ! ईहो तँ भ' सकैत छै, भेंट भेला पर सभ टा घटना-क्रम सुनाबै ! आ ई ओकर धाह सँ पुनः बर्फ जकाँ पघीलि जाय !

          से विवाह लेल तँ इएह बेसी बेचैनो रहैत रहै, आ जाहि कारणे ओ कहियो क' 'इरीटेट' भ' की-कहाँ कहियो देल करै... 

          ताहि पर ई बाते बदलि लिअय– 'अरे हम ताइ लेल नै ने कहलौं जे तमसा क' मुँहक नक्शे बदलि ली ! असल बात ई छै जे ऐ मे हमर स्वार्थ छुपल अछि...

          – 'की !' 

          – 'अहाँक बादे त', अहाँक पसिन्न सँ हमहूँ बियाह करब !'

          – 'किए से !' स्नेहिका कें सहसा पुछा गेलै ।

          – 'स्पष्ट छै, तखन हमरा कोनो कचोट नै ने रहत ! अपन पत्नी मे अहींक सुंदर प्रतिछबि देखैत अहीं संग जीबि लेब !...' आ तखन मोने छै, स्नेहिका अपन घाड़ कें झुका लेने रहै ।

          दुष्यन्त एक टा आर अहम बात कहने रहै कि हम आजीवन प्रेम-संबंध मे जीब' चाहैत छी । आ से अहाँ संग ! अहीं टाक संग ! कारण हमरा बुझाइत अछि जे प्रेमी-प्रेमिका जँ बर-कनियाँ बनि जाइत छै, तँ ओकर दुनूक प्रेमक खून भ' जाइत छै !...

           मुदा दुष्यन्त कें तँ एखन तकर उन्टे अनुभव भ' रहल छलै । जेना क्यो एकर अंदर सँ 'किछु' छीनि लेने होइ । से, के छीन लेलकै ओ 'किछु' ! की छलै ओ 'किछु' ! आ दुष्यन्त अपने सँ अपने प्रश्न कर' लगैत अछि ।

          फेर क्षणहिमे– स्नेहिका कतौ हमरे जकाँ तँ ने दुखी अछि ! आ तें अपन पीड़ा अपने मुँहें नहि कहि सकलि हो ! 

          तैयो दुष्यन्तक तामस कम नहि भेलै, सोचय– स्नेहिका तँ निज एकर रहै । ओकरा कोनो आन पुरुष स्पर्श करतै, दुलार करतै, बर्दाश्त नहि भ' रहल छै ! से ई एखन एना चाहि रहल अछि, जे उड़ि क' चलि जाय, आ ओकरा अपन पाँज मे समेटि आनय...

          ई एखन बहुत तेजी सँ अपन अंदर सँ लड़ि रहल छल । एकरा बुझा रहल रहै जे स्नेहिका कतहु अपहृत तँ ने क' लेल गेलय !

          दुष्यन्त आब पूरा-पूरी अस्थिर भ' चुकल अछि । तें उन्टे स्नेहिके पर बरसि पड़ैत अछि– नहि नहि, ई सभ टा किछु नहि छै ! ओ बदलि गेलय । ओकर सभ टा दुलार-मलार खेल छलै । एते दिन सँ झुट्ठो 'प्रेम-प्रेम' खेलाइत रहलि । प्रेम कें अपना अन्दर ओ पचा नहि सकल रहय । झुट्ठी नहितन ! ठीके, माया अछि...

          की-कहाँ सोचैत दुष्यन्त अन्दरक पीड़ा सँ उबरि नहि रहल रहै । बेर-बेर मोबाइलकें देखि लेल करय । एकरा लगै जेना सम्पूर्ण रूप सँ शून्यताक स्थितिमे आबि गेल अछि ! 


          ...से बड़ी समय बीति गेल रहै । ओकरा द्वारा कॉलबैकक उम्मीद सेरा गेल रहै । मुदा एकर बेचैनी बेर-बेर उपकि अबै । नहि थम्हयलै तँ ई आवेग मे उपकरि क' कॉल कयलक । किन्तु 'रिसीव' तैयो नहि भेलै । से एक बेर, दू बेर, तीन बेर, अनेक बेर...

          आब ई ठीके शिथिल भेल जाइत रहय । एकर आवेग लगै जेना क्रमशः मरि रहल छै । ई जेना अंदर सँ मोम भ' रहल छल । आब ई अपन मोन कें ओकरा दिस सँ हटयबा मे लागि गेल छल । मुदा एहन मोन कें की कहय जे सभदीना सँ बेकहल रहलै !... 

          दुष्यन्त उठि छत पर चल आयल । मोन बहटार' चाहलक । द्वंद्व मे अछि । किन्तु आब ई द्वन्द्व किएक ! आब एकर कोन दाबी ! जे दाबी रहै, ओ तँ भ्रम रहै !

          दुष्यन्त बहुत कठिनता सँ मोन कें मनौलक। आ बलात् क्रमशः एहि पीड़ सँ उबरैत गेल । ओ देखलक, एकटा चिड़ै बहुत देर सँ एहि गाछ सँ ओहि गाछ, एहि डारि सँ ओहि डारि क' रहल छलै । आब ओ बड़ी देर सँ एके डारि पर बैसल छै । लगलै, आब ओ थाकि गेल अछि । 

          से की फुड़लै, ईहो कोठरी मे आबि गेल । मुदा, जो रे मोह, ओह ! एखनो 'मिस्ट' देखब नहि छुटि सकलै । फेर ठोर सेहो जेना हिललै- न:, कत्तहु-किछु नहि, बिल्कुल डार्क... 

          तथापि ई मोबाइल ऑन कयलक । मोन कें मनौलक । आ संयत मोने स्क्रीन पर टीपब शुरू कयलक–

          जँ जरूरी बुझी तँ एहि समय कें इंज्वॉय करू । आब अहाँक गोत्र बदलि रहल अछि । आब अहाँ कें ओही गोत्रक संग रहबाक अछि । फेर ई समय दोबारा नहि आओत । दाम्पत्यक कल्पना कें मूर्त रूप दिअ...

          बहुत समय धरि संग रहलहुँ । ओ समय सेहो फेर नहि आओत । ओकरा आब अपन मोनक आर्काइव मे राखि लेब । ई कहियो, कोनो भावुक क्षणक एकान्त मे, कदाच् कुमारि कल्पना संग जीबाक पल पुनि दोहरा-तेहरा दिअय !

          ई हमर-अहाँक पूर्व रागक प्रायः अंतिम दृश्य अछि । आब आगूक कोनो दृश्य एहन नहि हो, से अधिक संभव । जीवनक बाट मे कतेको मोड़ अबैत छै,  ईहो एक टा मोड़ रहय । ओना तँ अहाँक जीवन मे मोड़े-मोड़ अछि । आ प्रत्यक्षतः ताहि लेल कोनो कचोटो नहि देखलहुँ । बस ओहि एक दिन कें छोड़ि क' ! अहाँ दुखी-मन बुदबुदायल रही– 'एकबेर जे मिस्टेक...'-मुदा ताहि मिस्टेकक उल्लेख धरि नहि क' सकलहुँ ! हमर लाख हठक बादो । आब तँ सहजे, हम के रहलहुँ !

          किन्तु तीत-मीठ अतीतक कारणें एहि निज-संबंध मे कटुता नहि आबय, एहन सन कोशिशकें प्राथमिकता देब । ई एक एहन  बदलावक मौसम अछि, जे ककरो जीवन मे बस एक्के बेर अबैत छै, आ जे स्थायी भ' क' जीवन भरिक लेल रसि-बसि जाइत छै...


          पुनश्च :

          बीतल अवधि मे जँ कोनो तरहक चूक भ' गेल होअय, तँ तकरा ठामे कोनो गन्दा जगह देखि थूकि देब, आ तखनहि बेदी पर डेग देब ! आब यदि कहियो भेंट भेल, ओ भेंट हमरा दुनूक लेल एक न'ब रूप-रंग-गंधक संग भेंट होयत । तखन अहाँ सुश्री नहि, श्रीमती रहब, आ जइ पर हमर कोनो टा अधिकार विलोपित रहत । 

          अहा स्नेहिके ! ओ क्षण-विशेष, केहन मनोहर दृश्य उपस्थित करतैक ! कवि विद्यापतिक कोनो सलज्ज नायिका सन अहाँकें अपन समक्ष पाबि हम सहसा चीन्हि पायब कि नहि, ई एखने सँ यक्षप्रश्न बनि घुमरि रहल अछि !...

          – बस, एक मधुर-स्मृतिक संग...

          ××

          ...कि सहसा सूतल सँ चेहा उठलहुँ । अगल-बगल मे कतहु-किछु नहि । टीवी टा चलि रहल छलै । ओत' वैक्सीन-प्रसंग एक पैनल बैसल रहै । 

          हम उठि टीवी बन्द कयलहुँ । आ रेडियो खोलि देलिऐ । आब टीवी सभक न्यूज देख' वला नहि रहलै । 

          रेडियो मे एखन लोकगीत बाजि रहल छलै– अयलै शुभ के लगनमा, शुभे हे शुभे...   

          संदर्भित गीत हृदयस्पर्शी, संगहि कर्णप्रिय सेहो लागल ।

विभूति आनंद
विभूति आनंदक जन्म शिवनगर (मधुबनी, मिथिला, बिहार) मे 4 अक्टूबर, 1955 केँ भेलनि । पटना विश्वविद्यालय सँ पीएचडी कयलाक उपरान्त ल.ना.मि. विश्वविद्यालय, दरभंगा मे मैथिलीक प्रोफ़ेसर भेलाह आ हालहि मे आर. एन. कॉलेज, पंडौल सँ प्रिंसिपल पद सँ अवकाश-प्राप्त भेलाह अछि । लगभग चालीस गोट पुस्तक (मौलिक-सम्पादित) प्रकाशित-प्रशंसित छनि । बर्ष 2006 मे कथा-संग्रह 'काठ' पर साहित्य-अकादेमी पुरस्कारक प्राप्त श्री आनंद सम्प्रति सुविधानुसार पटना-दरभंगा मे रहि निरन्तर लेखन क' रहलाह अछि । सोशल मिडिया पर सक्रिय श्री आनंद सँ हुनक फेसबुक आईडी (Bibhuti Anand) पर सम्पर्क कयल जा सकैछ ।

*श्री बिभूति आनंदक प्रयुक्त फोटोक हेतु 'बेपरवाह क्लिक्स'क निदेशक श्री अविनाश कुमारक प्रति आभार 

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