बुढ़भस (कथा) — श्रीधरम

मनोरमा केँ एखनो विश्वास कहाँ भ’ रहल छलैक...

                 जखन ओकर बियाह ठीक भेल रहै त' ओ भीतर सँ दुखी छलि। ओना बियाहक बाद पति सँ पहिल भेंट मे ओकर शंका कम भेल रहय। पिता बम्बई मे ड्राइवरी करैत छलाह आ जहिया एक्सीडेंट मे हुनकर मृत्यु भेलनि तहिया मनोरमा मात्र सात वर्षक रहय। ओकर माय दोसर विवाह करय सँ मना क’ देलक त' मामा जोखन यादव अपने संग रखैक निर्णय लेलक। एहि निर्णय मे जोखन केँ अपन पत्नीक पूरा समर्थन भेटल रहैक। मनोरमा ममहरे मे रहिक’ सेकेण्ड डिविजन सँ इंटर पास कयने रहय। तकरा बाद बड़ इच्छाक बादो ओ आगू पढ़ि नहि सकलि। मामा पर बेसी भार देबाक हिम्मत नहि भेलैक । ओही बीच मनोरमा डाक्टर सुभद्रा जीक संपर्क मे आबि झंझारपुर मे चलैत हुनक एनजीओ सँ जुडिक’ महिलाक मासिक-धर्म, गर्भावस्था मे देखभाल आ अन्य समस्याक लेल काउंसलिंग करय लागल रहय।...

 मनोरमा केँ आश्चर्य लगै जे कोना एकटा सेनेटरीपेडक अभाव मे गामक महिला सभ भीषण संक्रमणक शिकार भ’ रोगाहि बनि जाइत छथि। मासिक-धर्म, जे स्त्री-जीवनक एक टा स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रिया छैक आ जकरा बिना संततिक विकास संभव नहि, ओकरा अपन समाज कतेक खराब नजरि सँ देखैत छैक। ई एनजीओ एक टा वृद्धा, सुभद्रा, चलबैत छलीह जे अपन डॉक्टरी पेशा सँ रिटायर भेलाक बाद गाम आबि समाज सेवा क’ रहल छलीह। मनोरमा केँ एहि संस्था सँ जुड़ल रहलाक कारणे कम उम्र मे एतेक ज्ञान भ’ गेल रहैक, जतय गामक बहुत रास स्त्री केँ उम्र बीत गेलाक बादो नहि भ’ पबैत छैक। ओ संस्थाक लाइब्रेरी सँ स्त्रीक समस्या आ सरोकार संबंधी किछु पोथी घर आनय आ खाली समय मे ओकरा बहुत ध्यान सँ पढ़य। ओ सजग रहय आ अपना ठामक स्त्रीक दुर्दशा सँ चिंतित। तकर बादो ओ अपन विवाह मे मामाक निर्णय केँ नकारि नहि सकलि रहय। मामाक मुँहें ओ माय केँ कहैत सुनने रहय, “लड़का दिल्ली मे रहै छैक, एक टा एक्सपोर्ट कंपनी मे सुपरवाईजर छैक। ओकर बियाह डेढ़ वर्ष पहिने भेल रहैक, मुदा छबे मासक भीतर कनिया जे नहिरा गेलैक से घुरय लेल तैयार नहि भेलै।” ई सुनि मनोरमाक मन मे हजारो प्रश्न तरंगित हुअ’ लागल रहैक, मुदा ओ चुप रहलि। चिंता त' माइयो केँ कम नहि भेल रहैक मुदा भाइक उपकारक बोझ बकार फूट’ नहि देलकै। भाइ तैयो सफाइ देने रहय, “सरजू यादव केँ परोपट्टा मे के नहि चिन्हैत छैक ? सात-आठ बिगहा खेत छैक, आ कोनो कन्यादान नहि, मात्र दू टा बेटा। आ ई लड़का मनोज बढ़िया कमाइ छैक । मनोरमा गाम मे थोड़े रहत, दिल्ली मे आनंद करत।” 

                से सत्ते, सरजू यादव केँ परोपट्टा मे के नहि चिन्हैत अछि ? वैह सरजू यादव, जिकरा आदर सँ सभ केओ दलाल कहैत अछि। माल-मवेशीक अद्भुत जानकार। एहि मामिला मे कोन भेटनरी डॉक्टर ओकर बराबरी करत ? ककरो महींस बियाइ, दलाल केँ बजाऊ। ककरो माल केँ भजहा पकड़ि लेलकै, दलाल सँ सलाह लिय'। ककरो बच्छा जूआ नहि धरै छैक, दलाल सँ ट्रेनिंग दियाबू। एक बेर आनंद झाक महींस बियाइ छलैक । पेटे मे बच्चा उनटि गेल रहैक। भेटनरी डॉक्टरो हाथ उठा देलकैक। लागय जेना महींस के आब जान जेतैक, तब जान जेतैक। पहिलोठे रहैक, अकसक करैत रहैक। तखन बजाओल गेल सरजू यादव। लोक ओकर हाथक कमाल ओइ दिन देखने रहय। आधा घंटाक भीतर महींस-पारी दुनू तंदरुस्त।... इलाका मे ककरो माल-जाल कीनबाक होइ, बिना दलालक सलाह आ कमीशनक कीनब संभव कहाँ रहैक ? एक बेर लूटन बाबू अपन गाय खरीद’ मे दलालक कमीशन मारि गेल रहथि, त' हुनकर ओ गाय फेर पिपरोलिया बला कसाइएक हाथे बिकायल। सरजू यादवक ‘दलाल’ उपाधि मे जतेक आदर रहैक ततेक पवन मंडल केँ ‘मुखियाजी’ कहय मे कहाँ बुझाइत रहैत छैक ? दलालक निंदक गाँव-परोपट्टा मे खोजलो सँ नहि भेटत आ मुखिया केँ जे देखू दू-चारि टा आशीर्वाद दैत भेटि जायत। हँ, हुनकर चर्चा मे लोक ईहो बात जोड़ै छैक, “दलालो मुदा अद्भुत त्यागी अछि। आठ साल पहिने पत्नी मरि गेलि, कतेको लोक बुझेलक, मुदा दोबारा बियाह करय सँ सीधा मना क’ देलक मर्दे। एक्के बात जे आब बेटाक बियाह करायब कि अपने बुढ़ारी मे घिढारी करब।” जवानी मे हरवाही करयवला दलाल केँ आइ अपन अरजल सात बीघा धनहर खेत छैक। गाछी-बिरछी, बाड़ी-झाड़ी की नहि ? लहना अलग चलैत छैक । पूरा जोलहटोली, चुल्हिआरटोली आ खतबेटोलीक बियाह-दान, मरनी-हरनी ओकरे लहना पर। अपन खेती अगता क’क चारि सौ रुपइए हर बेचैत अछि। मुदा सरजू दलाल एक दिन एतेक नीचाँ खसि पड़ताह से के विश्वास क’ सकैत अछि ? मनोरमाक कान मे एखनो ओहि रातिक ठकठकी गूंजैत रहैत छैक... 

                 पहिनेक जे-से, बियाहक बाद मनोरमाक मन कने आश्वस्त भेल रहै। रसेरस मनोज पर विश्वास जमय लागल रहैक । बियाहक बिध-बाधक बाद दोसर राति अनचिन्हार लोक आ समाजक बीच जखन एक टा अनजान आवाज ओकरा कान मे पैसल रहैक, “हम अहाँ केँ कोनो शिकाइतक मौका नहि देबै !” हृदय जुड़ायल छलैक। 

  मनोरमा चुप्पे रहलि। मनोरमा जाहि संस्था मे काज करैत रहय ओतय स्त्री सभक किसिम-किसिमक अनुभव सँ ओ परिचित रहय, जे कोना मरद भुखायल बाघ जकाँ पहिले राति सँ नोचैत-खसोचैट छैक !... तकरा स्त्री सभ अधलाहो कहाँ बुझैत रहैक ? “आखिर पत्नीक धर्मों त' सैह छियैक।” एकटा एहने स्त्रीक अनुभव सुनलाक बाद डॉक्टर दीदी मनोरमा केँ बुझबैत बाजलि छलि, “अपना समाजक स्त्री, जीवन भरि बलात्कृत भ’ बच्चा जनमबैत मरि जाइत अछि आ एको बेर ‘ऑर्गेज्म’ धरि नहि पहुँचि पबैत अछि ! एहि कारणें ओ अनेक बीमारीक शिकार भ’ समय सँ पहिने रोगाहि भ’ जाइत अछि। अपना समाज मे स्त्रीक संगे ‘सम-भोग’ नहि, ओकर ‘उप-भोग’ होइत छै। जाहि स्त्रीक संगे पुरुष जीवन बितबैत अछि ओहि स्त्रीक मन आ ह्रदय सँ ओ अपरिचिते रहि जाइत अछि।” ताहि काल मे मनोरमा एकर किछु अर्थ नहि बुझि सकल छलि। बाद मे गूगल पर सर्च क’ एक टा आर्टिकल पढ़ला पर ओकरा पता चलल रहै जे ‘ऑर्गेज्म माने कामोत्तेजनाक चरमावस्था होइत छैक जे स्त्रियो मे ओतबे होइत छैक जतेक पुरुख मे’। ई पढ़ैत ओ लाज आ डरे पसीना-पसीना भ’ गेल रहय आ जल्दी सँ ओहि लेख केँ बंद क’ देने रहय। 

                सत्ते कहने रहय हमर दोस्त, अहाँक सामने त’ हिरोइनो फीका छै।” मनोरमाक ध्यान भंग भेल रहैक। ओ मुस्किया देने रहय, हरसिंगारक फूल झहरि क’ महमहा गेल रहै। ओकरा चौल सूझल रहैक, “अहूँ त’ फिल्मिये डायलोग मारैत छी, बुझाइए फिल्म किछु बेसिए देखैत छी।”               

         अरे कहाँ, एतेक फुरसत भेटैत छैक ?” 

         हमारा ले फुर्सत भेटत की नहि ?” 

       अहाँ ले त’ हजारो मालिकक चाकरी कुर्बान क’ देबै।” 

       से देखब, शुरू मे एहिना सब पुरुख चान तोड़बाक बात करैत छैक।” मनोरमा अपन एक पैरक बिछिया केंँ सँ दबाबैत कहने रहैक। 

      ठीक छैक, नोट क’ लिय।” 

                टीप लेलउँ।” 

मनोज मेहँदी लागल ओकर हाथ केँ अपन दुनू हाथ मे लैत कहलकै, “माँगू की मँगैत छी?” 

                किछु नै, बस हम आगाँ, पढ़य चाहैत छी।” 

मनोरमा केँ मन पड़लै, संस्था मे एक बेर सुभद्रा दीदी, डॉक्टर अम्बेडकर केँ कोट करैत कहने रहथिन, “शिक्षा शेरनीक दूध छियै, जे पीतै से गरजतै।’ तेँ स्त्री केँ सब सँ पहिने शिक्षित भ’ क’ अपना पैर पर ठाढ़ हेबाक चाही मनोरमा।” 

                हम त' इंटर से आगाँ नहि जा सकलियैक, अहाँ दिल्ली आऊ त’ ओपन सँ बीए क' लेब।” मनोजक टीस निकलि पड़ल रहैक।   

  मनोरमाक आनंदक ठेकान नहि रहलैक। ओकर मन भेलैक जे मनोजक छाती सँ चिपैक जाय, मुदा लाज ताहि पर ब्रेक लगा देने रहैक। मनोरमाक एक मन भेलैक जे पहिलुक कनियाक मादे सेहो मनोज सँ पूछैक जे साँचे ओ अपन प्रेमी संगे भागि गेल रहैक ? मुदा, से ओकरा एखन ई उचित अवसर नहि बुझा पड़लैक।... दू राति तक दुनू बतियाइते रहि गेल। एक दोसरक मन केँ थाहैत, एक-दोसरक देह केँ अकानैत आ एक दोसरक आत्माक केवाड़ केँ ठक-ठकबैत... आ फेर दुनूक देह सारंगी बनि गेल रहैक... सारंगीक ‘छाती’ पर सारंगीक ‘गज’ पिछड़’ लागल रहै... तेसर रातुक तेसर पहर, जेना संगीतक सातो स्वर राग मालकौंस मे फूटि पड़ल होइक... ‘इतहु बाजे बाजन लागे दुन्दुभिः धौंसा गाजे’। नव अनुभूतिक एहि पहाड़क फुनगी पर दुनू बेर-बेर चढ़य चाहैत रहय आ ओतय सँ एकहि संग पिछड़य चाहैत रहय। मनोरमा केँ बुझाइ जेना ओकर पूरा देह केँ केओ भाँगक शर्बत मे घोरि क’ गोइठाक मद्धिम आँच पर औंट देने होइक। अगबे निशां... तन-मन जेना निशां मे माति गेल होइक। 

बियाहक अगिले दिन गौना भेल रहैक आ एक सप्ताहक भीतर पाहुन-पड़क आ लियौनिहारि सब अपन-अपन घर चलि गेल रहैक। मनोरमा भोरे-भोर उठि क’ चाह बनाबय आ पहिने दीयर सनोजक हाथे ससुर केँ दालान पर पठा दैक, फेर कलौक तैयारी मे लागि जाय। बहुत जल्दीए ओकरा घरक संग-संग टोल-पड़ोसक तारीफ सेहो भेटय लगलैक। मनोजक रहिते टोल-पड़ोसक किछु छौंड़ी सभ केँ मनोरमा साँझ केँ पढ़बय लागल छलि। 

एक महीनाक छुट्टी ल’क’ मनोज अपन बियाह लेल गाम आयल रहय आ कोना डेढ़ महीना बीत गेलैक से ओकरा होश कहाँ रहलैक ? ओ तँ मनोरमो केँ संगहि ल’ जेबाक नियार केने रहय मुदा बाबूक कहब मानय पड़लै, “लोक की कहतौक ? कने दिन सासुर डेब’ दही, रीति-नीति सीखि जेतैक त’ अगिला बेर लेने जइहें।” मनोज किछु बाजि नहि सकल रहय। जखन मालिकक तेसर फोन अयलै, ‘नहि अयबें त’ नोकरी ख़तम’ तखन जाक' ओ बेमन सँ ट्रेन पकड़’ दरभंगा विदा भेल रहय। तैयो दू दिन ट्रेन छूटि गेल रहैक। तेसर दिन भोर मे दही-चूड़ाक थारी हाथ मे दैत मनोरमा कान मे फुसफुसा क’ कहने रहै, “आइ नहि ट्रेन छोड़ि देबै, लोक सभ खेड़हा पसारत आ नोकरियो दाव पर लागि जायत।” ताहि पर मनोज मनोरमाक गाल पर थपकी दैत कहने रहैक, पसारय दियौ खेड़हा, छूटय दियौक नोकरी, फेर भेटि जेतैक। साल भरि सँ पहिने डकूबा मालिक थोड़बे छुट्टी देतैक।” आ तेसर बेर चाहियो क’ मनोजक ट्रेन नहि छूटि सकलैक। 

जरलाहा के ई कोन ट्रेन छियैक, दिल्ली जाइ मे तीन दिन लगा दैत छैक। एखने फोन आयल रहैक मनोजक । साढ़े आठ बजे दिल्ली उतरल रहैक। मार बाढ़नि ! सरकार एकटा ढंगक ट्रेन त’ चला नहि पबैत छैक आ लोक केँ बुल्लेट ट्रेनक सपना देखा क’ भरमाबै छैक। मनोरमा केँ बहुत तामस उठल रहैक। ओ बड़ी काल धरि मनोज संगें फोन पर हास-परिहास करैत रहलि आ ओकरा भेल फिरिशानीक लेल पटना सँ दिल्ली धरिक सरकार केँ सरापैत रहलि। 

                 ससुर बड़ ध्यान राखैक मनोरमाक। मनोजक गेलाक लगभग तीन महीना बीत रहल छलैक। सप्ताह मे दू दिन लौफा हाट आ दू दिन बड़ैल हाट करब सरजू दलालक रूटीन रहैक । मालक खरीद-बिक्री मे कोनो दिन हजार त’ कोनो दिन दू हजार ओकर कमीशन बन्हौटा रहैक । हाट सँ घुरैत काल ओ कहियो तरकारी त’ कहियो माछ लेने आबय। दीयर सनोज सेहो दासो-दास रहैत छलैक। ओ गामक स्कूल मे दसमा मे पढ़ैत छल मुदा बाप अधिक काल ओकरा खेते मे नुरियेने रहैत छलैक। 

                शुरू मे सब ठीक-ठाक बितलैक। महीना भरि मनोज रूटीन सँ हर राति फोन करय, जे धीरे-धीरे साप्ताहिक भ’ गेलैक । एमहर मनोरमा केँ किछु दिन सँ अपन ससुरक स्वभाव मे बहुत परिवर्तन बुझाइत रहैक। दलालक चेहरा लोलुप आ आँखि बहुत बाचाल भ’ गेल रहैक। हरदम जेना चिड़चिड़ाइते रहय छल। मनोरमा जखन चाह आकि खेनाइ दैक त’ कोनो ने कोनो बहन्ने ओ ओकरा छूबय चाहय। हटिया जेनाइ आब चारि दिन सँ दू दिन भ’ गेल रहैक। कैक राति त’ भोरहरबा धरि निपत्ता रहैत छल दलाल अपन दूरा सँ। जाहि छौड़ी सभ केँ मनोरमा पढ़बैत रहय ओहि मे सँ रुबिया ओकरा कहने रहैक, “बाबा आइ-काल्हि एको टा घसबहिनी केँ खेत मे घूस’ कहाँ दैत छैक, परमानपुरवाली केँ छोड़ि क’। बाँहि मचोरि क’ खुरपी-पथिया छीन लैत छैक, घोघ उघारि क’ जबरदस्ती मुँह देखैत छैक आ फेर चीन्हि क’ बिखिन-बिखिन क’ गारि दैत छैक।” मनोरमा केँ ईहो पता लगलैक जे दलाल आइ-काल्हि स्वर्गीय फूदन मिसरक दलान पर किछु बेसिए समय दैत अछि। फूदन मिसरक मसोमात बहीन इंदुकला केँ किछु ने किछु काज लगले रहैत छलैक। टोलक एकटा ननदि एक दिन ओकरा सँ चौल करैत कहने रहै, “भड़ामवाली भौजी, जल्दिए तोरा घर नबकी सासू आबय बला छौक। इन्दुकलिया आइ-काल्हि खूब कका केँ खटिया सेबे छैक। जरलाही के एक जलम केलक से मसोमात भेल, तैयो वैह रंगताल छैक।” 

मनोरमा एहि बात केँ मजाके मे लेने रहय। मुदा एक दिन ओ देखलक जे दलाल दूरा पर बरद केँ सानी लगा रहल छल कि तखने एकटा छौड़ा आबि क’ पाछू सँ जोर सँ बजलैक, “बाबा हौ, खटिया मचमचाइ छह किने?” आ निच्छोहे भागि गेल रहै। दलाल ओतय राखल एकटा पजेबा उठा जोर सँ छौड़ा दिस फेकैत चालू भ’ गेल छल, “आ ने तोरा माय के खटिया मचमचा दैत छियौक, तोरा बहीन के खटिया मचमचा दैत छियौक, बहान चो...” ताबत सुधीर आबि गेल रहैक। ओ हँसैत कहने रहय, “ई छौड़ा सभ कका केँ बताह बना देतै भौजी, अनेरे ले खौंझाइत छैक।” सुधीर दलालक पितियौतक बेटा जे झंझारपुर कालेज मे बी. कॅाम. फ़ास्ट ईयर मे पढ़ैत छैक। ओ मनोरमाक विशेष ध्यान रखैत रहैक। कालेज सँ घूरती काल कादम्बिनी, सरिता आदि पत्रिका मनोरमा लेल लेने अबैक। मनोरमो केँ ओकरा संग पढ़ाइ-लिखाइ आ देश-दुनियाक बारे मे गप्प करब नीक लगय।                   

आब मनोरमो केँ अपन ससुर पर किछु-किछु शंका हुअ’ लागल रहैक। एक राति मनोरमा खेनाइ खा क’ पलंग पर लेटल यूट्यूब पर एक टा वीडियो देखि रहल छलि कि ओकरा दूरा दिस सँ कराहबाक आवाज सुना पड़लैक। दूरा कि रहै, घरे सँ सटा क’ पछबारी भरि एक टा एकचारी खसा देल गेल रहैक। मनोरमा खिड़की खोलि क’ आवाज अकानलक। ई त’ बाबू छथिन !.. ओकरा किछु फुरा नहि रहल छलैक जे की करय। बगले मे चौकी पर पड़ल सनोज निसभेर भ’ फोंफ काटि रहल छलैक । ओ सनोज केँ खिड़की सँ आवाज देलकै, “बौआ, उठियौ ने, देखियौक त’ बाबू के की भेलनि।” 

                दलालक कँपकँपी बढ़ले जाइत रहय, ओ कहरैत बजलैक, “डांड़ फाटल जाइत छैक, पूरा देह कनकनाइ छैक। हड्डी फारने जाइत छैक रो बाप, आब नै बचबौक...” 

मनोरमाक कतेको हाक देलाक बादो सनोज नहि उठल रहय । दलाल कहरैत बजलैक, "कने कड़ुआ तेल, लहसुन पका के डाँड़ हसोइथ द’ हे कनियाँ, हुक पैस गेल छैक !” 

                मनोरमा केँ दया आबि गेल रहैक । अपन पिता ओकरा ढेरबी होइ सँ पहिनहि चलि बसल रहैक। ओकरा एखनो कने-कने मन छैक, बच्चा मे पिता कहथिन जाँत’ लेल त’ ओ हुनकर पीठ पर खूब कुदैत रहैत छलि आ बदला मे भेटैक टॉफी। ओकरा अपन सासुक अभाव सेहो आइ बड़ खटकलै। आखिर बाप-ससुर मे अंतरे की छैक ? ओ झट सँ एक जाबा लहसुन छीलि माली मे कडू तेल मिला क’ गरमेलक आ जाक’ ससुरक डांड़-पीठ मे हँसोथ’ लागलि। ओकरा ससुरक देह धनुष जकाँ अकड़ल बुझा पड़लै। भोरे झंझारपुर ल’ जा क’ डॉक्टर सँ देखेबाक निर्णय लेलक। मुदा, भोर होइते दलालक डाँड़क हुक निपत्ता भ’ गेल रहैक। ओ डॉक्टर लग जेबा लेल किन्नहुँ तैयार नहि भेल। मनोज केँ फोन क’ क' मनोरमा सभ टा बात कहलकैक। मनोज कहने रहैक, “दुर्गापूजा सँ पहिने छुट्टी किन्नहूँ नै मालिक देतैक । एहि बेर गाम अयबैक त’ दरभंगा ल’ जा क’ बाबू केँ नीक जकाँ देखा देबैक।” 

                दलाल केँ आब गाम सँ बाहरो ‘खटिया मचमचाइत छैक यौ दलाल?’ कहि क’ लोक सभ खौंझाब’ लागल रहैक । ओहि दिन त’ गजबे भ’ गेलैक । अपन खेतक आरि पर ओ बैसल रहय, कने हटिक’ दोसर खेत मे किछु स्त्रीगण सभ घास काटैत अपन सुख-दुख बाँटि रहल छलि। ओही मे सँ केओ बाजलि, “गै, देखही ने बुढ्बा केँ कोना कान पाथि क’ सभ टा बात सुनै छैक, मौगियाहा। एकरा खटिया मचमचाब’ दही तखन घास काट’ देतौ !” एतेक सुनिते सरजू दलाल तमासे जेना बताह भ’ गेल। ओ दुनू हाथे धोती उठा क’ गरदनि सँ इशारा करैत बाजल, “आ ने एखने मचमचा दैत छियौक।” बाकी घसबहिनी चुप्पे रहलि, मुदा जे व्यंग्य-वाण छोड़ने रहय ओ चुप नहि रहलि, “जो ने अपना घरक बेटी-पुतहुक खटिया मचमचा ग' ने, ईह बुढ़ौरा नहितन।” ओहि स्त्रीक रूप देखि दलाल चुप्पे रहबा मे अपन भलाइ बुझलक। आब ओ भीड़भाड़ सँ बचबाक प्रयास करैत छल। गामक चौको पर जाइ सँ बचैत छल। कोनो सामान मँगेबाक होइक त’ सनोज केँ पठा दैत छल। 

                मनोरमाक मन मे ‘खटखुट’ चलि रहल छलैक। ओकर मन अनसोहाँत सन रहैक। दलालक डाँड़ मे आब सप्ताह मे दू-तीन दिन हुक पैसय लागल रहैक । आ बेर-बेर वैह खिस्सा, “कने कड़ुआ तेल लहसुन पका क' डाँड़ हसोइथ द’ हे कनियाँ।” ओकरा ससुरक मन मे फसल काँट साफ बुझाइ रहैक, तैयो ओ कोनो निर्णय धरि नहि पहुँचि पाबि रहल छलि। ओकरा मन मे की ने की फुरेलैक, नेट पर ‘बुढ़ापाक बीमारी’ सर्च केलक। ढेर रास लिंक खुजि गेल रहैक। एकटा लिंक पर गेल जाहि मे पुरुष मे ‘प्रोस्टेड’ ग्रंथिक मादे जानकारी रहैक । ओ पढ़य लागलि... साठि सँ सत्तरि उम्रक पुरुष एहि बीमारीक शिकार होइत अछि। ई ‘प्रोस्टेड ग्रंथि’ ‘एंड्रोजन’ आ ‘एस्ट्रोजन’ नामक हारमोनक गतिविधि केँ सेहो संचालित करैत छैक। उम्र बढ़ैक संग-संग एहि दुनू हार्मोनक घटय-बढ़ैक अनुपात मे असमानताक कारणे प्रोस्टेड ग्रंथि अचानक बढ़य लगैत छैक । एहि क्रमक शुरुआत मे अचानक पुरुषक भीतर ‘कामोत्तेजना’ बहुत बढ़ि जाइत छैक आ कतेक लोकक लेल बेसम्हार । ओकरा भीतर छिनरपन बढ़ैत जाइत छैक । ई एकटा घातक रोग छैक जकरा प्रति लोक अनजान अछि । एहन पुरुष बेर-बेर संभोग करैक लालसा मे बताह जकाँ भ’ जाइत अछि। जाहि कारणे एहि उम्र मे आबि कतेको लोक ‘बुढ़ारी मे घीढारी’ अर्थात बियाह करैत अछि, सेहो जवान लड़की सँ। एहि बीमारीक अंत पुरुषक नपुंसकता मे होइत छैक। संगहि कतेको दैहिक परेशानी उत्पन्न भ’ जाइत छैक। जेना जल्दी-जल्दी पेशाब लागब, पेशाब मे जलन होयब, हरदम पेशाब लागले रहब। आ धीरे-धीरे ई इन्फेक्शन किडनी धरि पहुँचि क’ ओकरो संक्रमित क’ दैत छै आ पेशाब बंद भ’ जैत छैक...आ फेर खून खसय लगैत छैक।… ई सभ पढ़ैत-पढ़ैत मनोरमाक मन खराब भ’ गेल रहैक । ‘सठियायब’ आ ‘साठा पर पाठा’ सनक कहावतक अर्थ मनोरमा केँ बुझय मे आबय लगलैक । मनोरमा केँ मन पड़लैक, एक बेर ओकर माय ककरो कहैत रहय जे ‘एक जमाना मे बाभन सभ अछिया पर जाइत-जाइत बियाह करैत रहय आ ओकरा मुइला पर जुआन-जुआन बभिनियाँ सभ हकारोस करैत रहि जाइक । किछु त’ अपन जन-बनिहार केँ रतुको बहिया बना लैत छलि। मनोरमा आगाँ पढ़य लागल।... ओहि लेखक अंत मे ईहो लिखल रहैक जे जँ समय पर इलाज आ सर्जरी भ’ जाइक त’ ई असाध्य बीमारी ठीक भ’ सकैत छैक। एहन लोक सँ घृणा करब आ सजा दैक बदला रोगी बूझि ओकरा प्रति दया आ सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करबाक चाही। एहन आदमी केँ शारीरिक आ मानसिक परिश्रम सँ बचबाक चाही।’ मुदा, एहन बरियारि सभ सँ त्रस्त समाज मे ककरा धैर्य रहतैक ? मनोरमा सोचैत रहल। 

            लेख पढ़लाक बाद मनोरमाक नीन जेना कतौ बिला गेल रहैक। ओकरा आगाँ समाजक कतेको भद्र पुरुषक चेहरा नाचय लागल रहैक। बाप रे कतेक जहालत भरल रहल छैक एहि देस-कोसक स्त्रीक जिनगी मे। ओकरा बुझेलैक जेना मनोजो एहि मर्दक दुनिया सँ अलग नहि छैक। बियाहक बाद ओ कतेक प्रेम देखेने रहैक ? जेना सत्रह जनम तक संबंध मे वैह टटकापन आ गर्माहैट बाँचल रहतैक। आ दिल्ली गेलाक महीना बितैत-बितैत सब शिथिल हुअ’ लागल रहैक। आब त’ हालत ई रहय जे मनोरमा आगाँ बढिक’ फोन नहि करय त’ मनोजक फोन आबय मे पंद्रह-पंद्रह दिन लागि जाइक... कखनो ओकरा मनोजक चरित्र पर शंका होइक आ कखनो दया सेहो अबैक, “परबस चाकर केँ अपन जिनगी अपन कहाँ होइत छैक ? गाम मे ठीक सँ खेती-पथारी, स्कूल-कालेज, रोजी-रोजगार रहितैक त’ लोक परदेस मे किएक फकसियारी कटितैक ?” ओकरा दया अबैक जे दिनभरिक थाकल-मादल मनोज ठीक सँ कलौ-खेनाय खाइतो हेतैक कि नहि। संगहि एहि सभ बातक उल्टा सेहो ओतबे ओकरा सोचा जाइक, “कोन ठीक ककरा संगे रहैत हेतैक । शहर मे त’ आइ-काल्हि बिन बियाहे सांय-बहु बनि रहब आम बात भ’ गेल छैक ।” ओ लालटेन केँ एकदम मद्धिम क’ मोबाइलक डेटा ऑफ केलक आ सुतबाक प्रयास करय लागलि।… कि एक टा खटका सन आवाज अयलैक। ओकरा बुझेलैक जेना छोलनी सन किछु चीज सँ  केओ बहार सँ बिलैया केँ अलगा रहल होइक। एक पल त’ ओकरा विश्वास नहि भेलैक, मुदा दोसर क्षण ओकर आँखि गवाही देलकैक। ओ धड़फड़ा क’ उठल आ लालटेनक बत्ती केँ एक्के बेर तेज क’ देलकैक। मुदा लौ एक्के बेर जोर सँ फकफकेलै आ चारू भर अन्हारक साम्राज्य पसरि गेलैक। एही बीच केबाड़ीक बिलैया ऊपर उठि क’ माथे भरे खसि पड़लैक। मनोरमा जाबत किछु बुझितय ओकरा एक टा बलिष्ट बाहुपाश जकड़ि लेने रहैक। ओ जोर सँ चिचिया चाहलक, मुदा ओइ तरहत्थीक सामने ओकर आवाज मिमियेबा लेल बाध्य भ’ गेल रहैक। ओ तैयो हारि नहि मानलक। अपन पूरा ताकत लगा समधानि क’ एक्के बेर खूब जोर सँ मारलक दुनू मुक्का। आ से ओहि आदमीक डाँड़े पर जा क’ बजरल रहैक। जकड़ ढील भ’ गेल रहय आ मरदबा लटपटाइत भागल रहैक। अन्हार मे कोशिशक बादो ओहि आदमीक चेहरा नहि चीन्हि सकल मुदा धुआ-काया सँ अनुमान लगबैत रहल। 

            मनोरमा भरि राति बैसिए क’ बितेलक। सिरमा तर सँ दियासलाइ खोजि क’ लालटेन जरा लेने रहय। और की क' सकैत अछि ? एक मन भेलैक जे एखने जाइ आ सौंसे कचिया हाँसू बुढ़बाक पेट मे आर-पार क’ दै, मुदा बैसले रहि गेलि। ओकरा सामने, आब मनोजक पहिल पत्नीक भागि जयबाक कारण स्पष्ट भ’ गेल रहैक। बाह रे समाज ! उल्टे ओहि मौगी केँ दिनक इजोत मे चरित्रहीन साबित क’ दैत छैक, जकरा संगे रातुक अन्हरिया मे बलात्कार करैत छैक ! ठीके कहैत छलीह डॉक्टर दीदी, “अपन समाज मे बलात्कार जायज छैक, प्रेम नाजायज। हम सभ जाहि समाज मे रहैत छी ओ भीषण रूप सँ मानसिक रुग्णताक शिकार छैक । पुरुष केँ प्रेम करबाक लेल कतेको गोपी आ राधा चाही मुदा पत्नी सीता सन निमुँह चाही। मौका भेटिते ओ इंद्र बनि कोनो अहल्याक घर घुसि अन्हरिया राति मे बलात्कार करत। बुझलहुँ ने मनोरमा, जाधरि पुरुषक मनक इलाज नहि हेतैक ताधरि स्त्रीक प्रति अत्याचार नहि घटतैक । कानून बनेला सँ आ फाँसी देला सँ किछु नै हेतैक। जाहि दिन स्त्रीक मनक बात पुरुष समाज सुन’ लगतैक तहिया ई समाज साँचे बहुत सुन्दर भ’ जेतैक। खाली विश्वगुरु-विश्वगुरु चिचियेला सँ किछु नै हेतैक ।” सत्ते, डॉक्टर दीदी जीवनक कतेक प्रैक्टिकल बात कहैत छथि। भोरहरबा मे जा क’ ओकरा कने कालक लेल भक लागल रहैक। 

                भोर मे उठल तँ मनोरमा केँ पता लगलैक जे आइ कते दिनका बाद दलाल लौफा हाट गेल अछि। सनोज केँ खेत मे ‘ठोकरा’ ओल’क ड्यूटी द’ गेल रहैक। मनोरमा केँ सनोज पर दया आबि गेलैक आ एक पलक लेल रतुका बात ओ बिसरि गेल। जल्दी-जल्दी रिफाइंड तेल मे दू टा परोठा सेद क’ आमक फारा आचारक संग सनोजक सामने परसि देलक। सनोज चटकारा ल’ क’ बड़ी काल तक अचारक खलकोइया केँ चुसैत रहल आ फेर खेत दिस विदा भ’ गेल। मनोरमा अपने दिन भरि भुखले रहि गेल। ओकरा एक मन भेलै जे एखने मनोज केँ फोन करय आ सभ टा बात बता दैक। फेर की मन मे अयलैक, ओ निर्णय बदलि लेलक। साँझखन दलाल अयलैक त’ आँगन नहि अयलैक। सनोजक हाथे लगभग डेढ़ किलोक एक टा फूलकोबी आँगन भेजबा देने रहैक। मनोरमा सनोजेक हाथे खेनाइ दूरा पर पठा देने रहैक आ खिड़की सँ ससुर केँ सुनबैत कहने रहैक, “बौआ जतरा मे अहाँक भैया एथिन त दरभंगा ल’ जा क’ बाबूक इलाज नीक जकाँ करा देबैक। ओपरेशनो भ’ सकैत छैक, मुदा डांड़क कनकनी सदाक लेल ठीक भ’ जेतैक।” 

            दलाल कोबीक एक टा बड़का टुकड़ा रोटी मे लपेटि क’ मुँह मे लेनहि रहय कि टहकल तेल सन पड़लै मनोरमाक बात। क्षण भरि लेल संज्ञाशून्य जकाँ भ' गेल। ताउर सुखा गेलैक। एक्के बेर गीड़’ चाहलक, कि कोबीक डांठ हल्लक मे जा क’ अटकि गेलै। जल्दी-जल्दी पानि सँ गटकलक, जोर सँ सरकल, जे धीरे-धीरे हिचकी मे बदलि गेलैक। तरकारीक बुकनी मगज धरि पहुँचि गेल रहैक, किछु पानि नाक सँ आ किछु आँखि सँ बहि गेलैक। ऑपरेशन शब्द साजिशक पर्याय बुझेलैक दलाल केँ। बाटीक तरकारी छीपा मे उलटि ओ बाटी मे हाथ धोअ’ लागल, मुदा एखनो ओकर नजरि छीपा मे पड़ल ओहि कोबीक गस्सल फाँक पर अटकल रहय जे आधा झरकल आ आधा हरियर रहय। 

                एहि घटनाक लगभग एक महीना बीत रहल छलैक। एहि बीच दलालक डाँड़ मे एक्को बेर हुक नहि पैसल रहैक। मनोरमाक आत्मविश्वास बढ़ि गेल रहैक। ओ मनोज केँ सब टा बात खुलि क’ नहि कहल। नहि चाहैत रहय जे घर बिलैट जाय। आब देर राति तक दलाल इंदुकलाक दलान पर बितब’ लागल छल। इंदुकलाक भाइक एहि बेर माघ मे तेसर बरखी भ’ जेतैक। भातिज सब परदेस मे, घरक सभ टा जिम्मेदारी इंदुकलाक कान्ह पर छलैक। आइ-काल्हि हर दोसर दिन ओकर बरद केँ कोनो ने कोनो बेमारी पकड़ि लैत छलैक आ दलाल ओकर देखभाल मे राति-राति भरि अपस्याँत रहैत छल। मनोरमा आब सूत’ सँ पहिने बिलैया केँ डोरि सँ नीक जकाँ बान्हि दैत छलि। 

            ओइ दुपहरिया मे छौड़ी सभ पढ़य लेल अयलैक त’ ओकर मन उचटल जकाँ रहय। पढ़ैबाक बदला मनोरमा एमहर-ओमहरक बात करैत रहलि। छौड़ी सभ सेहो रस ल’ क’ कतेको सूचना दैत गेलैक। रुबिया कहलकै, “है भौजी से बुझलहक, ओ जे सरपंचा छ’ ने से परसू राति मे धमदाहा बालीक घर मे घुसि गेल रहैक। ओ कुकुर बुझि क’ तेहन ने डाँग मारलकैक जे एकटा अलंग तोड़ि देलकैक। से कहै छिय’ तीन दिनक बाद घर सँ निकललह सरपंचा, सेहो नंगराइत। लोक पुछैक की भेलह त’ कहय जे साँड़ पटकि देलक खेत मे।” 

दोसर छौड़ी एहि घटनाक विश्लेषण करैत बजलैक, “मार बाढ़नि जुआन सभ परदेस खटैत छैक आ गाम मे बुढ़बा सब कनिया-पुतरा, धी-बेटी केँ जीयब मोस्किल केने छैक।” 

जखन बौह केँ संगे रखबाक डाँड़ मे दम नै रहय छैक त’ बियाहे कियैक करय छैक। बियाही क' माय-बापक चरवाही मे छोड़ि क’ शहर मे समदाही संगे मस्त रहैत छैक ।” 

रुबियाक बात पर मनोरमा केँ हँसी लागि गेल रहैक। ओ कहलकैक, “देखब रूबी, अहाँ अपन दूल्हा सँ पहिने करार क’ लेब।” रुबिया लजा गेलि रहय। तखने सुधीर आबि गेल रहैक । ओकरा हाथ मे कादम्बिनी पत्रिकाक प्रेमकथा विशेषांक रहैक । ओ मनोरमा केँ दैत कहलकैक, “ध्यान सँ पढ़बै भौजी बड़ इंट्रेस्टिंग कहानी सब छैक।” मनोरमा कहलकैक, “से पढ़लाक बाद कहब इंट्रेस्टिंग छैक कि नहि ।” आ मुस्किया देने रहैक। 

दलाल भड़ामवालीक एहि रूप सँ डरा गेल रहय। “आखिर बिना कोनो बेमारीक ई हमर कथीक अपलेशन करेतैक ? कोनो ठेकान नहि एहि मौगीक। पहिनहि सँ संस्थाक खेलायल अछि।” ओकरा भीषण साजिश बुझेलैक । ओ भीषण असुरक्षाबोध सँ ग्रसित भ’ गेल छल। असुरक्षा सँ त्रस्त व्यक्ति केँ अपन सुरक्षाक सामने किछु ने सुझा पड़ैत छैक। ओ कतेको नीचा खसि सकैत अछि। ओहिनो दलाल लोकक खौंझेबाक कारण भीड़-भाड़ सँ बचैत रहय। ओ आब बात-बात मे सनोज केँ पचास टा गारि दैत रहय। अपन हित-अपेक्षित केँ खोजि-खोजि क’ कान मे फुसफुसा क’ मनोरमाक चरित्रक-हनन करय। ओहि दिन पुरनी पोखरि पर अपन बालसखा बंकर सँ कहलकैक, “भजार, हमारा त’ मनोजबाक ईहो कनियाँक चालि-चलन ठीक नै बुझाइ छौक। ई परमेसराक बेटा सुधिरबा संगे हरदम लटापटी करैत रहैत छैक। घर मे रहब मुस्किल भेल जाइत अछि ।” 

हाँट-दबाड़ नहि करबही त’ नाक कटा क’ छोड़ि देतौ आइ-काल्हिक छौड़ी-मौगी।” बंकर सलाह देलक। 

हम समझाब' चाहलियैक त’ उल्टे कहैत छैक जे हमर दिमाग फिर गेल छैक। आब हमर अपलेशन करेबाक जिद पर अड़ल छैक।” 

मार बहिनचोद के, बिना बीमारीक कोन अपलेशन करेतौक रे ? कोन ठीक, किडनी-फिडनी निकलि क’ बेच देतौक आ लापत्ता भ’ जेतौक, पहिलुकबी जकाँ । हम त’ ई कुटुमैती करैते काल कहने रहियौक भजार जे मसोमातक बेटी केँ घर नहि आन, खेलायल हेतौक छिनरी के ।” दलाल किछु बजितय कि ओत’ पछबारि टोलक दू-चारि टा छौड़ा आबि गेलैक। ओ दुनू चुप भ’ गेल। 

दलाल अपन पुतहुक मादे ई गूढ़ रहस्य जकरा कहय तकरा सँ अंत मे ईहो निहोरा करय, “ई बात अपने तक राखब, इज्जतिक मामिला छैक।” आ ओ आदमी दोसर-तेसर केँ वास्कोडिगामाक स्टाइल मे रहस्योद्घाटन करैत एहि बात केँ दोहराबय, “ई बात हमरे टा बूझल छल जे अहाँ केँ कहलहुँ तें अपने तक राखब।” तीन-चारि दिन मे ई हालत भ’ गेलैक जे हर दलान आ खेत-खरिहान मे मनोरमाक चर्चा आम भ’ गेल। एक से एक रहस्यमय कथाक कल्पना, निर्माण आ वितरण अहर्निश चलि रहल छल। मनोरमाक चर्चा होइते लोक कहय, “हमारा त’ बहुत पहिनहि सँ सभ टा पता अछि। हम त’ अपन अँखिए पकड़ने छियैक । एक साँझ हम हर द’ कहबाक लेल दलालक घर गेल रही त’ ओ दालान पर नहि रहैक। अंगना गेलियैक त’ देखैत छी जे... छौड़ा मुँह पर गमछा बान्हिक’ भागि गेलनहि त' ओही दिन पकड़ि क’ डाँड़ तोड़ि देने रहितियनि सरबे के।” 

की करबहक हौ, बेचारा दलालक भागे खराब छैक, पहिने घरवाली मरलैक, फेर पहिल पुतहु भागलै आ कोनो भोर सुनभक जे राति मे ईहो सुधिरबा संगे निपत्ता भ’ गेलैक।”  

...आ किछु उचक्का सभ ईहो प्रचार क’ रहल छलैक, “भड़ामवाली भौजी दलालक बधिया कराब’ चाहै छैक, तें ओकरा बदनाम क’ रहल छैक।” 

फेर इन्दुकलियाक खटिया के मचमचेतैक हौ?” 

हें हें हें!... ठें ठें ठें!... 

            मनोरमा केँ रुबियाक माध्यम सँ सभ टा खिस्सा पता चलल रहैक। रुबिया ईहो कहने रहैक जे दलाल काका हमरो बाबू केँ कहैत रहय जे अपन बेटी केँ भड़ामवाली लग किए जा दैत छही, बिगाड़ि देतौक। मनोरमाक दिमाग सन्न रहि गेलैक। लोक कतेक खसि सकैत अछि ? ताहू मे ससुर, बियाह मे घोघट देनिहार ! लाज रखबाक बचन देनिहार। छी: ! ओ फोन निकाललक मनोज केँ लगेबाक लेल, मुदा की दिमाग मे अयलैक संस्था वाली दीदीक नंबर खोजय लागलि। सर्च करबाक लेल सुभद्रा टाइप केलक कि पूरा नाम स्क्रीन पर आबि गेलै--डॉ. सुभद्रा झा। ओ डायल क’ देलक। 

ओमहर सँ आवाज अयलैक  हेल्लो! 

दीदी, हम छी मनोरमा। चिनहलियैक ?” 

हँ, हँ, किएक ने, कहू कोना छी?” 

            मनोरमाक आँखि नोरा गेल रहैक आ गला भारी। लगभग बीस मिनट धरि ओ सुभद्रा दीदी सँ बतियाइत रहल। एकहक टा खिस्सा हुनका बता देलकनि आ एहि चक्रव्यूह सँ निकलबाक लेल हुनका सँ सलाह सेहो माँगलक। सुभद्रा ओकरा धैर्य रखबाक दैत किछु सलाह सेहो देने रहथिन, “देखू मनोरमा एहि समाजक मन मे हजारो सालक जमल काई केँ अहाँ एक दिन मे नहि साफ़ क’ सकैत छी। जेना कहलहुँ से करू आ जँ जान पर बनि आबय त’ हमर नंबर अहाँ लग अछिए, हम थानाक नंबर सेहो इनबॅाक्स क’ दैत छी।” 

सुभद्रा सँ बात केलाक बाद मनोरमाक मन कने हल्लुक भेल रहैक आ आत्मविश्वास सेहो मजगूत। 

            दुर्गा पूजाक मेला जमि गेल रहैक। पंचमीक भोरबा मे लगभग तीन बजे मनोज गाम पहुँचल रहय। टेम्पो-टेक्सी वला सभ त’ परदेसी केँ देखिते जेना महीना भारिक कमाइ एक्के बेर मे लुटि लेबय चाहैत छल। दरभंगा सँ गाम कुल एक्काबन किलोमीटरक लेल पंद्रह सौ रुपैया लेने रहैक ऑटो वला। दिल्ली मे एतेक दूरीक लेल अधिक सँ अधिक ओकरा पाँच सौ रुपैया लगितैक । तीन आदमी मिलि क’ कयने रहय ई ऑटो। बभनटोलीक बौआ झा जे सागरपुर मे एक टा मंदिर पर सात हजार महिनाबारी पर काज करैत छैक आ गांधीनगर मे कपड़ाक छोट-मोट कारोबार कर’ बला रहमत मियाँ संग मिलिक’ सझिया ऑटो कयने रहय मनोज। जँ ई दुनू गोटे नहि भेटितैक त’ फेर बसे टा आसरा रहैक। मनोरमा भुखले ओकर बाट ताकि रहल छलैक। मनोज केँ नीक लगलैक मुदा ओकर चुप्पी आ सर्द व्यवहार ओकरा दुखी क’ देने रहैक। खाइत-पियैत फरीछ हु लागल रहैक। मनोज एतेक दिनका बाद आयल रहै। मनोरमा किछु कह’ चाहलकैक त’ ओ अनठा देलक। ओकरा एक्के टा भूत सवार रहैक। ओ मनोरमा केँ बियाहक तेसर राति दिस ल’ जयबाक कोशिश केलकैक, मुदा मनोरमा यंत्रवत प्रतिक्रिया विहीन बनल रहलि। ओ चिढ़ क’ कहलकैक, “जखन मन मे बिर्रो उठल रहैत छैक त’ देह मे लैस नहि अबैत छैक, ओना बलात्कार करबाक त' अहाँ केँ सर्टिफिकेट भेटले अछि।” मनोज किछु बूझि नहि सकल आ कनिए काल मे फोंफ काटय लागल। पूजा मे अहू बेर राजा सलहेशक नाच आयल रहैक। कुसुमाहरणक प्रसंग लौडिस्पीकर पर चारू भर गुँजि रहल छलैक। 

            मनोज अगिला दिन साँझखन मेला दिस घूम’ निकलल त’ ओकरा कान मे मनोरमाक बारे मे कतेको अनसोहाँत बात पिघलल शीशा जकाँ पड़ैत रहलैक। ओकरा मनोरमा पर एक्कोरत्ती शक नहि रहैक, मुदा ई सौंसे गाम बताह थोड़े भ’ गेल छैक ? जेमहर जाऊ एक्के रंग बात 

रे बाऊ तोहर कनियाक मादे जे किछु ऊँच-नीच सुनलियौक से नीक नहि लागल।” 

दलाल तोरा दुनू भाइक लेल बड़ पैघ त्याग केने छौक, ओकरा दुखी जुनि करिहें रे बाऊ।” 

हम त कहबौ एकरा दिल्ली की ल’ जेबही, ओतहुओ घिना जेतौक।” 

छोड़ एकर मोह, मरदक लेल मौगीक कोनो कमी छै की?” 

ओ की सोचि क’ गाम आयल छल आ की सुनि रहल अछि। पहिने तीन गोटे मिलिक’ एक कमरा लेने रहय आ गाम आब’ सँ पहिने अपन एक टा अलग कमरा किराया पर ल’ लेने रहय। ओकरा विश्वास रहैक जे मनोरमा केँ ई कमरा पसंद अयतैक। मनोज केँ मनोरमा सँ किछु पुछबाक हिम्मतो नहि भ’ रहल छलैक। अगिला साँझ ओ तीन टा गोली भाँगक खा क’ सूतय लेल चलि गेल रहय। ओकरा मेला जेबाक हिम्मत नहि भेलैक। जे भेटैक से एक्के टा बात... मनोरमा एहि बात केँ ताड़ि गेल रहय। ओ मनोज सँ आहिस्ते सँ पुछलकैक, “अहूँ केँ हमर चरित्र पर शक अछि किने?” 

नहि, लेकिन पूरा गाम थोड़बे झूठ बजतैक?” 

आ अपन बापक चरित्र पर की कहनाइ अछि अहाँक” मनोरमाक धैर्य जवाब द’ रहल छलैक। 

अहाँ, बताह भ’ गेल छियैक की?” 

हाँ, हम बताह छी। कहियो अहाँ ई जानबाक प्रयास केलिऐ जे अहाँक बियहुती कियैक भागि गेल रहय ?” मनोज केँ लगलैक जेना ओकर पौरुष पर प्रश्न-चिन्ह लागि गेल होइक। ओकरा मनोरमा पर बड्ड तामस उठलै। तैयो ओ स्थिति केँ सामान्य करबाक लेल मनोरमा केँ अपन आलिंगन मे लेब’ चाहलक। मनोरमाक मन खिन्न रहैक। ओ कहलकै, “पहिने अहाँ हमर प्रश्नक जवाब दिय’ हम जनैत छी, अहाँक ई राति भरिक प्रेम अछि, भोर होइते हमारा पर पंचैती करय वला मे अहूँ रहब।” 

मनोज केँ किछु फुरा नहि रहल छलैक, ओ भाकुआयल याचनापूर्ण आँखिए मनोरमा दिस तकैत रहल। 

देखू, बियाहक आधार मात्र घर नहि होइत छैक, सेक्स नहि होइत छैक। तन, मन आ आत्माक एक संग मिलन पति-पत्नीक संबंध केँ स्थाइ बनबैत छैक। जखन मन आ आत्मा पर चोट पहुँचैत छैक त' तन मासुक लोथड़ा मात्र रहि जाइत छैक। पहिने हम दुनू गोटे अपन-अपन मनक काँट निकाली, तखने फेरो सँ विश्वास जमि सकैत अछि।” 

मनोजक मन जाहि फुनगी पर चढ़ल रहैक, ओकरा मनोरमाक बात अनसोहाँत लगलैक। संगहि तामस सेहो, “एक त’ हमारा सनक प्रोग्रेसिव आदमी जे एतेक बात सुनलाक बादो मनुहार क’ रहल छियनि आ ई छिड़ियाइत छथि। हमरा त’ आब पूरा विश्वास भ’ रहल अछि, नइँ त’ कोनो सतबरती मौगी भला एना...” तैयो मनोज मात्र एतबे बाजल, “एखन ई बात सब छोड़ू, भोर मे बात करब।” 

त फेर भोरे मे हमारा संग ईहो बात करब।” मनोरमाक ठोकल जवाब मनोजक पौरुष केँ आहत क’ देलकैक। ओ उठल आ मेला दिस घूम’ लेल निकलि पड़ल। मनेमन मनोरमा केँ गरियाबैत रहल, “ईह छिनरी के... सतबरती बनैत छैक। सौंसे गाम घिना क’, नाक कटा क’, उल्टे चोर कोतबाल केँ डाँटय।” 

दलाल केँ अपन प्रतिभा पर बहुत विश्वास आ गर्व रहैक। केहन-केहन बाभन-राजपूत-भुईंहार के कान कटैत रहय ओ। ई कल्हुका जनमल हमर की नोचि लेत?.. ओ मनेमन मुस्कियेलक। मौका भेटिते मनोज केँ कहि देने रहैक, “एखन एकरा दिल्ली ल’ जेबाक कोन जल्दी छौक ? ओकर माम के समाद भेजबा देलियैहें। जतरा दिन ल’ जेतैक । छओ महीना नहिरा मे छोड़ि दही। दिमाग ओरेतै तखन देखल जेतैक।” मनोज चुप्पे रहल। 

ओमहर दुर्गाजीक भसानक तैयारी चलि रहल छलैक आ एमहर मनोरमा केँ नहिरा-भसानक तैयारी मे दलाल लागल छल। एक-दू टा अपन हित-अपेक्षितक संग सरपंच केँ सेहो ओ बजा लेने रहय। “कोन ठीक ‘संस्था’क खेलायल मौगी अछि, कोनो रंगताल ने ठाढ़ क’ दिए।” मनोज सेहो एक कोन मे चुपचाप बैसल मोबाईल पर कोनो गेम मे उलझल रहय। मनोरमाक मामा कें पहिनहुँ किछु अनसोहाँत लागल रहैक जे एतेक दिन त’ कहलो पर दलाल बिदागरी नहि करेलकै आ आब जखन पाहुन गाम आयल छथि त’ समाद द’ क’ बिदागरी करा रहल छैक । मुदा एत’ आबि क’ हुनको किछु-किछु भनक लागि गेल रहनि। ओ हिम्मत करैत बजलाह, “जाधरि पाहुन गाम मे छथि, मनोरमो एतहिये रहितैक त’ नीक रहितैक।” 

एखन चुपचाप अपन भगिनी केँ ल’ जाऊ, जे कहै छी।” दलाल बाजल। 

मार बैंह के, कोन खानदान छी अहाँ सभक, नाक कटा देलहुँ हमारा सभक।” सरपंच पहिनहि सँ तैयारी मे रहैक। 

            दूरा आ अंगनाक बीच लागल टाटक अ’ढ़ सँ दालान परहक गलगुल सुनि मनोरमा केँ बुझबा मे किछु भाँगठ नहि रहलैक। ओ सीधे दूरा पर आबि क’ ठाढ़ भ’ गेलि। आइ ओकरा माथ पर नुआ लेबाक कोनो आवश्यकता नहि बुझेलै। एक पलक लेल सभ केओ सकपका गेल रहैक । देवमोहन ठाकुर किछु बाजय चाहैत छल कि मनोरमा गरजल, “हम कत्तौ नै जेबैक, भेजबाके छैक त’ एहि बुढ़बा के बद्री-केदार तीर्थयात्रा पर भेजू जे अपन पापक प्रायश्चित करतैक। अपन छिनरपन नुकेबाक लेल ई बुढ़बा हमरा भरि गाम मे बदनाम क’ देलक । हम थाना-पुलिस बजा लेबैक, बलु एत’ सँ नहि हिलबैक।” 

थाना-पुलिसक नाम सुनिते रिपुदमन झाक तालु सुखा लागल रहनि। ओ दलाल दिस तकैत बजलाह, “कने मैया जीक भसौनक व्यवस्था मंदिर पर जाक’ देखैत छियैक।” आ उठि-पुठि क’ निकलि पड़लाह। बात केँ सम्हारैत देवमोहन ठाकुर बाजल, “हय कनियाँ बिना सबूत के ऐना नहि आगि उठेबाक चाही तोरा। दलालक प्रतिष्ठा परोपट्टा मे छनि।” 

त’ ठीक छैक हम अपन मोबाईल मे सभ किछ रिकार्ड कयने छियैक जे कोना लोक बिलैया छिटका क' घर मे घुसैत छैक । काल्हि जा क’ पुलिस के द’ अबैत छियैक । आ पंचैती केनिहारो के नाम लिखा देबैक।” 

            दलालक चेहरा फक पड़ि गेल। सरपंच अपन अंतिम तीर छोड़ने रहय, “हमारा सब बूझल अछि। आइ-काल्हि राष्ट्रवादी लोक केँ बदनाम करबाक लेल एहिना ककरो धर पर ककरो मूड़ी लगा’ क’ वीडियो बना दैत छैक। सभ टा टेक्निकक खेल छियैक। ई जरूर कोनो साजिश छियैक।” 

ई वीडियो असली छियैक कि नकली से त’ अदालति मे फरिछेतैक सरपंच जी, मुदा अहाँ केँ जे नकली साँड़ पटकि देने रहय, तकर असली सबूत हमारा लग मे छैक। एहि गामक चारि-पाँच टा बुढ़बाक एक्के संगे आपरेशन करेनाइ बड़ जरूरी छैक।” 

            सरपंच मोदेलाल अवाक् रहि गेल रहय। एतेक पंचैती केलक कहियो कियो चौआ नहि हिललैक आ आइ ई दू-कौड़ीक मौगी हुनका चुप करा देने रहय। ...ई मौगी हमर बधिया कराओत? ईह बुरि...’ गारिक आधा वाक्य ओ मनहिमन पूरा केलक। दलालक त’ जेना वाके हरण भ’ गेल रहैक। आ मनोज केँ अपना ऊपर ग्लानि भ’ रहल छलैक । एक बेर ओ अपन पिता दिस घृणा सँ भरल नजरिए तकलक आ अपन माथ पकड़ि लेलक। किछु काल पंच सभ दलाल दिस तकैत रहल जे ओ अपन सफाइ मे किछु बाजत, मुदा दलाल केँ त’ जेना ठकबकोर लागि गेल रहैक। धीरे-धीरे एक-एक क’ पंच सभ ससर’ लागल। आब मनोरमाक ध्यान मामा दिस गेल रहैक। ओ झट सँ पाएर छूलक आ बाजल, “बैसू मामा हम चाह बना क’ अनैत छी।” ओ जल्दी सँ तीन कप चाह बना क’ आनलक आ मामाक संग-संग दलाल आ मनोज दिस सेहो बढ़ा देलकैक। दलाल त’ नहि लेलक मुदा मनोज झिझकैत कप उठा लेने रहय। दलालक आँखि एखनो जमीने मे गड़ल रहय। चाह पी क’ मामा निकलि गेल रहथि। मनोरमाक जिद केलाक बादो ओ नहि रुकला, “भोरे महींस के दुहतैक, एकहत्थू भ’ गेल छैक।” सनोज मेला पर सँ घुरलैक त’ मुरही-कचरी आ आलूक च’प भौजी लेल लेने आयल रहैक। ओ कहलकैक, “भौजी पहिने गरम-गरम खा लिय’ फेर भनसा करब।" 

            कनेक काल पहिने घरिघंटा आ शंखक आवाज बंद भ’ गेल रहैक। दुर्गाजी भसि गेल रहथि। दलाल केँ खेनाइ मनोरमा सनोजक हाथे दूरा पर भेजबा देने रहय, पता नै खेलक कि नहि। “कोनो बात नहि भोर मे ओ छीपा धुआ जेतैक।” मनोरमा सोचलक आ बाकी बर्तन धो-धा’ क’ पथिया मे पानि गर’ लेल छोड़ि देलक। सूतय लेल गेलि। मनोज पहिनहि सँ पड़ल रहय। बहुत हिम्मत क’ क’ ओ बाजल, “हमारा माफ क’ दिय’। चलू दिल्ली, फेर एहि गाम घुरि क’ नहि अयबैक।” 

गाम सँ भागला सँ समस्याक निराकरन थोड़बे हेतैक ?” 

त’ चलू थाना मे रिपोर्ट लिखा दियौक ?” 

से तकर जरूरत पड़तै त’ रिपोर्टो लिखा देबैक, मुदा कानून बनेला मात्र से ई बीमारी नहि जेतैक।” 

एहन आदमी पर एखनो अहाँ केँ दया अबैयै? 

फाँसी घीचै-लगबैक त' एक्को टा मरद दुनिया मे बचतैक ? कि जुआन कि बूढ़? एक दिन अहूँ केँ जँ बुढभस बीमारी भ’ जाए तखन ?” मनोरमाक ठोर पर मुस्की छिटकि गेल रहैक। मनोज ओकरा दिस तकैत रहि गेल। मनोरमा कहलकैक, “हम डॉक्टर सँ बात केने छियैक, अहाँ अपन बाप केँ डॉक्टर लग चलय लेल तैयार करू। सब ठीक भ’ जेबाक चाही। आ कने ध्यान रखियौक, कहीं किछु क’ ने बैसय!” 

से किछु ने करतैक। हमर बाबू सन घाघ भेटत?” मनोजक सामने पहिल कनियाक चेहरा नाचि गेल रहै, “एक टा बात कही?” 

कहू ने।”

ओइ वीडियो केँ डिलीट क’ दियौक।” 

मनोरमा केँ हँसी लागि गेलैक। बाजल, “ओ त’ हम फुसिए कहने रहियै, अहूँ केँ त’ हमारा पर विश्वास नहि रहल?” 

आब त’ बकैस दिय'।” मनोज दुनू हाथे मनोरमाक पैर जाँतैत बाजल। 

मनोजक गाल पर अपन ठोरक लिपस्टिक चिपकाबैत मनोरमा बाजलि, “सुधरबाक एक टा मौका अहूँ केँ भेटबाक चाही... जाऊ, बकैस देलहुँ।”  

श्रीधरम 
मैथिली मे लगभग दर्जन भरि कथा विभिन्न पत्र पत्रिका मे प्रकाशित। किछ कथाक आनो भाषा मे अनुवाद। किछ  संकलन मे सेहो कथा संकलित अछि। दू दर्जन सँ अधिक आलोचनात्मक लेख, शोध आलेख आदि विभिन्न पत्र पत्रिका सभ मे प्रकाशित। मैथिली पत्रिका अन्तिकाक संपादन सँ सम्बद्ध श्रीधरम सम्प्रति आत्मा राम सनातन धर्म महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) मे हिन्दीक असिस्टेंट प्रोफ़ेसर छथि । हुनका सँ संपर्क हुनक मोबाइल नम्बर +91-9868325811  आ ईमेल sdharam08@gmail पर कयल जा सकैछ ।

*ई कथा मैथिलीक प्रतिष्ठित पत्रिका मिथिला दर्शनक टटका अंक मे सेहो प्रकाशित अछि ।

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