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कुलानन्द मिश्रक तीनटा कविता

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कुलानन्द मिश्रक कविताक बाट चलब जीवनक सोझ साक्षात्कार थिक। हिनक कविता मे जीवन अपन सम्पूर्ण जटिलता आ ओझरा, सरलता-सरसता-ममता आ राग-विराग ओ संगति-विसंगतिक संग अभिव्यक्त भेल अछि। मिथिलाक प्रति कविक संपृक्ति रोमांटिक वा तात्कालिक नहि, आत्मीय ओ सहज अछि। आ एहि अर्थमे कुलानन्द मिश्र अपन माटिक एकान्त कवि छथि-अपन कथ्य, भंगिमा ओ भाषा-सम्वेदनाक संग। यात्री ओ राजकमल चौधरीक बाद मैथिली कविताक एकटा इमानदार नाम। ई तीनू कविता हुनकर तीनू कविता संग्रह 'ताबत एतबे', 'आब आगाँ सुनू' आ 'ओना कहबाक लेल बहुत किछु छल हमरा लग' सँ लेल गेल अछि। कुला बाबू आ सुकान्त सोमक एकटा सहयोगी संग्रह 'भोरक प्रतीक्षा मे' सेहो आयल रहनि।

'स्मृतिक छाहरि मे गामक धाह' कविता 'ताबत एतबे' आ 'उत्तरक प्रतीक्षामे' कविता 'आब आगाँ सुनू' संग्रह मे संग्रहित अछि। 'ओना कहबाक लेल बहुत किछु छल हमरा लग' कविता बीस टुकड़ी( वा खण्ड) मे  लिखल गेल कविता अछि जकर पहिल पाँच टुकड़ी सितम्बर 1972 आ शेष बीस टुकड़ी अगस्त 1980 मे लिखल गेल छल, जे कालांतर मे एहिए नाम सँ संग्रहक रूप मे संग्रहित भेल…

ऑब्जेक्शन मी लार्ड नाटकक रचना सँ मंचन धरि - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

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चेतना समिति, पटनाक विद्यापति स्मृतिपर्व समारोह-2015क अवसर पर एहि नाटक ‘ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड’क प्रथम मंचन भेल छल। हमरे लिखल एहि नाटकक निर्देशन सेहो हमरे करय पड़ल छल। से परिस्थितिवश करय पड़ल। एकर पृष्ठभूमि मे मारिते रास सामान्य-असामान्य कारणसभ सेहो छल। सर्वप्रथम तँ एहि नाटकक कथ्य ल’ क’ हमरा भय छल जे समिति आ ओकर नाट्य-परम्परा केँ ई जँचतैक कि नहि। कारण एकर मूल कथ्य छल फाँसीक विरोध अर्थात् फाँसीक सजाक विरोध। बीच-बीच मे एत्संदर्भित राजनीतिक स्थिति पर व्यंग्य सेहो छल। 2015 लगा क’ चारिम बेर हम समिति द्वारा नाटकक संयोजक बनाओल गेल रही जाहि क्रम मे मदति करू माता (विभारानी, 2011), अधिष्ठाता (रोहिणी रमण झा, 2013), मृत्युंजया (रोहिणी रमण झा, 2014) प्रभृति नाटकक निर्देशन क’ चुकल रही। 
                           ‘ऑब्जेक्शन भी लार्ड’क कथ्य मरखाह अछि से हम आइयो गछै छी। हमर पक्ष वस्तुतः ई अछि जे मानवक जीवन लेबाक अधिकार ककरहु नहि होयबाक चाही। ने कोनो व्यक्ति आ ने कोनो संस्था कोनो व्यक्तिक जीवन-हरण करय। कानून मे सेहो मृत्युदंडक प्रावधान केँ समाप्त क’ देल जाय। से केहनो अपराधी किएक…

एकटा अइपन अपन लिखि त' दितहुँ अहाँ (संस्मरण) - गुंजन श्री

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तहिया ग्रेजुएशन मे रही। प्रोजेक्ट वर्क चलैत रहय। साधारणतया लेट सँ घुरैत रही डेरा। आइ मुदा साँझहि सँ मोबाइल बेर-बेर बाजय। माँ करय फोन जे आइ जल्दी आबि जइहें। कियैक ? हम पुछलियैक। माँ कहलक हरेकृष्ण भैया आयल छथिन्ह। "अच्छा" कहि क' हम फोन काटि देल।

हम ताहि सँ पहिने हुनकर सिर्फ नाम सुनने आ कविता पढ़ने रही। पिताजी बेसी काल कविताक संदर्भ मे हुनकर नाम लैत छलखिन। हमरा घर मे हुनकर कविता संग्रह "एना त नहि जे" बीस टा सँ बेसीए प्रति छल। जे धीरे-धीरे पिताजी अपन प्रिय सबकेँ दैत रहथिन। हमरा त' घरे मे रहय सबटा। एक दिन उनटाओल ओहि पोथी केँ। कारण मोन मे भेल जे कियैक कहैत छथिन पिताजी जे एहि पोथी केँ बाइबिल जकाँ पढ़बाक चाही। आखिर बात की छैक एहि मे। से उनटाओल ओकरा। पहिल कविता जे उनटल से छल "गुलाबखास"। हम एहि आमक नाम सुनने रही। खयनो रही। बड्ड नीक लगैत छैक ई नाम खयबा मे। कविता पढ़ल मुदा ओहि कविताक मूलाधार मे आम नै छल आ ने ओ आम कविता रहय। आम सँ बेसी जे बात छल से घेरि लेलक। आम आ भाषा एक्के कविता मे तेना ने ठाढ़ रहय ने जे बिहुँसय लागल रहय मोन। दू-तीन बेर पढ़ल ओहि कविता केँ। प्रा…

तीन टा मैथिली कविता - गुंजनश्री

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1. रहना नहीं देश वीराना है

मीत !
कोना रहब पार लगैत अछि
ओहि नगर मे जाहि ठामक
सुरुज गछारल हो
मोन झमारल हो
किरण जे अबैत हो चानि पर
गिरहथ विर्त हो
लगेबा लेल ताहि पर
रंग-बिरंगक फिल्टर

झूर-झमान होइत लोक जतय
बाट तकैत हो दिन घुरि अयबाक,
झुझुआन होइत जाइ जतय
सरोकारक अनिवार्य मुदा हेराइत संस्कृति ,
लतखुर्दन कयल जाइत हो जतय
लोकतंत्रक सबटा गुण-धर्म
आ एहि सभ पर
मुस्की छिड़ियबैत हो सिंहासन
भाभाक हँसय ओकर चौदहो देबान,
कमला बलान मे संविधान केँ
दहा देबाक लेल रचल जाइत हो
नित-नव व्यूह,

एहि व्यूहरचनाक ओस्ताज सबहक नगर मे
कतेक दिन बाँचल रहि सकब हम-आहाँ मीत
चलू ने कोनो आन ठाम
जतय दिन
असगन्नी पर ओलरल नितुआन
मैल-कुचैल निरासि देल गेल अंगा सँ फराक
अपन अस्तित्व गढ़बाक व्योंत मे हो
आ राति
नढ़ियाक भूखब सुनबाक अभ्यस्त कानक रकबा सँ
अपना केँ एकात क'
चन्द्रमाक आभा मे नहयबाक सूर-सार करैत हो...


2. एना किएक करैत छलाह ओ ?
एहि शताब्दीक माथ पर अप्पन समस्त उर्जाक साक्षी राखि अपन आबय बला पीढ़ीक लेल करय चाहैत रहथि ओ एकटा दसखत जकरा देखि कहल जा सकैछ जे ई पुरखा छलाह हमर जे नहि अबडेरलाह कहियो कोनो राजनितिक क्षत-विक्षत नीति केँ
हुनका आजीवन…

समकालीन मैथिली कथा मे उपेक्षित वर्ग- डा.राजाराम प्रसाद

‘समकालीन कथा’, ‘कहानी’ आ ‘समांतर कथा’ एक मानल गेल अछि। समकालीन कथा मे कोनो नव आ स्पष्ट विभाजनक रेखा नहि खिंचल जा सकैछ। ‘समकालीन’ शब्द सँ ‘नव’ ‘समसामयिक’, ‘आधुनिक’ वा ‘वर्त्तमान’क क्रियात्मक बोध होइत अछि। दोसर शब्द मे इहो कहल जा सकैछ जे-‘‘समकालीन अर्थात् ‘अद्यतन’, ‘अधुनातन’, ‘अत्याधुनिक’ तथा ‘नवता’ आदि। कखनहुँ-कखनहुँ समकालीन कथा कहानीक स्थान पर ‘सचेतन’ कहानी ‘सहज’ कहानी तथा ‘अ-कहानी’ सेहो कहल गेल अछि। किन्तु एहिमे सँ कोनहु पर्याय द्वारा समकालीनताक सम्यक् स्पष्टकीरण नहि होइछ।’’ ‘समकालीन कथा साहित्यमे समष्टि चेतना’ आलेखमे डॉ- अणिमा सिंह लिखने छथि। ‘समकालीनताक समर्थक लोकनिक आग्रह छनि जे समकालीन कथा सँ एहन कथाक अर्थ-ग्रहण कएल जाय जकर रचना हाल मे भेल हो आओर जाहिमे तत्कालीन जीवनानुभूतिक तटस्थ चित्रण हो।’ एहि रूप मे एहि शब्दक चर्चा तथा स्थिति केँ वर्त्तमान विचारक लोकनि वर्त्तमान शतीक सप्तम दशकक उत्तरार्द्धहिक अवदान मानैत छथि किन्तु एतय शंका ई उठैत जे आइ जकरा ‘समकालीन कथा’ कहल जाइत छैक तकरा कालान्तर मे अतीत कथा वा पूर्वकालीन कथा’ कहल जेतैक आओर तकर स्थान पर तत्कालीन समकालीनता-सम्पन्न कथा आबि ज…

बनैत-बिगड़ैत देश आ सुकान्त सोमक कविता- डॉ. तारानंद वियोगी

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सुकान्त सोम मैथिलीक एक विरल कवि छथि, आ हुनका कविता पर बात करब मैथिली काव्येतिहासक एक दुर्लभ अध्याय पर बात करब थिक। मुदा, एहि मे समस्या छैक जे अपन कवि-निर्मिति पर, अपना सोचक काव्य-परिदृश्य पर आ कि अपन कविता-प्रतिमान पर हुनकर अलग सं कोनो लेखन नहियेक बराबर हमरा लोकनि लग उपलब्ध अछि। दोसर, सुकान्त सन विद्रोही साधक-कवि पर जाहि व्यापकताक संग समीक्षा-विचार हेबाक चाही, से नहि भ' सकल अछि। तेसर, मुख्यधाराक हिन्दी पत्रकारिता मे पछिला तमाम बरस ओ ततेक मुखर-प्रखर रहला जे हुनकर यशस्वी पत्रकारक छवि तर मे हुनकर ई दुर्लभ कवि पिचाएल आ नुकाएल रहि गेल अछि।

सुकान्त कें पढ़बा काल हुनकर पहिल जाहि विशेषता पर सब सं पहिने ध्यान जाइत अछि, से ई जे अपन कविता सब मे ओ बेर बेर कविता कें परिभाषित करैत चलैत छथि। 'कविता लेल एकटा कविता' आदिक तं शीर्षके स्वयं सैह अछि, बांकी बहुतो ठाम अवसर एला पर अथवा अवसर ताकि क' ओ ई काज करैत छथि। अपन कविताक बारे मे हुनकर ख्याल छनि जे ई 'मनुक्खक कविता' थिक जे 'एकटा सार्थक आ सामरिक चुप्पीक संग शुरू होइत अछि।' अपन कवि-कर्मक चिन्हासय दैत कहैत छथि जे हम 'अहा…