Sunday, 17 February 2019

प्रेमक रेखागणित (कथा) - श्याम दरिहरे

‘‘तों हमर आब केन्द्रविन्दु बनि गेल छें।’’

‘‘आऽ तों हमर की बनि गेल छें ?’’

‘‘हम छी बनि गेल तोहर परिधि। चारु दिससऽ तोरा आवृत कएने।’’

‘‘तखन हमर तोहर एकठाम हैब कोना संभव अछि संदीप ? तों हमर परिधि बनल चारुभर घुमैत रहबें आ हम केन्द्र बनि निश्चल अपन स्थानमे सटल रहब। तखन तऽ भेल प्रेमक सबटा गुड़ गोबर।’’ रेखा बाजलि।

‘‘न्न ! से कोना हेतैक गुड़ गोबर। एखन हमर बनाबट पूरा कहाँ भेलए। तों केन्द्र बनल रहबें आ हम परिधि बनि प्रेमक त्रिज्यासऽ जुड़ैत रहब। तों जखन रेसीप्रोकेट करबें तखन दुनू त्रिज्या मिलि व्यास बनि जेतैक आ प्रेम पूर्ण भऽ जेतैक प्रिये रेखा मैडम।’’ संदीप कहलकैक आ दुनूकेँ हँसी लागि गेलैक।

‘‘से व्यास तऽ कहिआ ने बनि गेलौ तखन आइ एतेक फेकि किए रहल छें। सेहो छौ एकदम खाँटी मैथेमेटिकल फेक।’’ रेखा हँसिते हँसिते कहलकैक।

‘‘गलत एकदम गलत। एक तऽ हम ई फेकि नइ रहल छी ई तऽ अछि हमर प्रेमक अभिव्यक्ति। दोसर जे ई हमर मैथेमेटिकल नहि बल्कि तोहर सेवामे जेओमेट्रिकल अभिव्यक्ति अछि मैडम।’’ संदीप कहलकैक।

फेर दुनू गोटाकेँ हँसी लागि गेलैक।

‘‘जेओमेट्रिकल अभिव्यक्ति प्रेममे बेसी कारगर होइत छैक।’’ संदीप बाजल।

‘‘से कोना ?’’ रेखा बिहुँसति पुछलकैक।

‘‘मैथेमेटिक्समे कन्सट्रक्सन नहि खाली गणना छैक। एकदम निष्क्रिय गणना। मुदा जेओमेट्रीमे अपन भुजा बढ़ाउ आ सामनेक रेखाकेँ पकड़ि लिअऽ। हे एनाकऽ।’’ संदीप हँसैत कहलकैक आ रेखाकेँ अपन बाँहिमे भरि लेलकैक।

‘‘देख बाबू तों आइ काल्हि बड़ धृष्ट भेल जाइत छें। एकर परिणाम भोगऽ पड़तौ तखन बुझबिहिं।‘‘ रेखा ओकरा अनुरागसऽ दूर ठेलैत बाजलि।

‘‘कोनो परिणामक कोनो डर नहि। अब चाहे सिर फूटे चाहे माथा अब तो......। ’’ संदीप फेर रोमान्सक मूडमे कहलकैक।

‘‘बस बस जँ भोरे भोरे फेकल भऽ गेल होउक तऽ हम सब आब आफिस विदा होइ।’’ रेखा आगू विदा होइत कहलकैक। मुदा संदीप रेखाकेँ पाछुसऽ बाँहिमे लैत बाजल, ‘‘एकटा बात कहिऔक रेखा ?’’

‘‘की ?’’

‘‘प्रेममे मैथेमेटिकल गणना सेहो बड़ा शानदार होइत छैक।’’

‘‘से कोना ?’’

‘‘प्रेममे कखनो एक जोड़ एक बराबर दू नहि होइत छैक।’’

‘‘अच्छा तऽ कते होइत छैक ?’’ रेखा उत्सुकतासऽ पुछलकैक।

‘‘प्रेममे वन प्लस वन इज इक्वल टू एवरीथिंग इन द वर्ल्ड। (एक जोड़ एक बराबर संसारक सब किछु)’’ संदीप कहलकैक।

‘‘वाह! सुन्दर, अति विलक्षण!’’ रेखा आनन्द लैत कहलकैक।

‘‘आ टू माइनस वन इज इक्वल टू जीरो, नथिंग। एवरीथिंग गॉन। ( दू घटे एक बराबर शून्य, किछु नहि। सब किछु खतम)’’ संदीप गंभीर होइत कहलकैक।

‘‘तोहर ई सब बात सुनिकऽ आइ फॉल इन लव विद यू अगेन एण्ड अगेन संदीप। यू आर रीअली ग्रेट लवर। आइ लव यू टू संदीप आइ लव यू।’’ रेखा सेहो भावुक होइत बाजलि आ आफिस लेल दुनू विदा भऽ गेल।

रेखा आ संदीपक भेंट इन्टरव्यूक समय भेल छलैक। परीक्षा छलैक कोलकातामे भोरे दस बजेसऽ। संदीप स्टेसन पर उतरि सीधे साल्ट लेक परीक्षा स्थल पर जुमि गेल छल। एकटा गाछक तर बैसि एकटा पुस्तक उलटा रहल छल। थोड़ेक कालक बाद एकटा अति सुन्नरि कन्या सेहो अपन बैग लेने पहुचलैक। आफिस खुलबामे बिलंब छलैक। तें ओ कन्या सेहो ओही गाछ तर चबूतरा पर बैसलि।

‘‘हलो, अहाँ की इन्टरव्यू देबऽ आयल छी ?’’ संदीप अंग्रेजीमे पुछलकैक।

‘‘हँ हम इन्टरव्यू लेल आयल छी। आ अहाँ ?’’ कन्या हिन्दीमे जबाब देलकैक।

‘‘हँ हमहुँ ओही लेल आयल छी। अहाँ कत्तसऽ अयलहुँ अछि?’’ अइबेर संदीप सेहो हिन्दीमे पुछलकैक।

‘‘हम मधुबनीसऽ आयल छी। अहाँ कत्तसऽ अयलहुँ अछि ?’’ कन्या पुछलकैक।

‘‘हम सहरसासऽ आयल छी। हमर नाम अछि संदीप झा।’’ अइबेर ओ खाँटी मैथिलीमे बाजल।

‘‘हमर नाम अछि रेखा मल्लिक। वाह हम दुनू गोटा तऽ मैथिले निकललहुँ। हम बड़ डेरायलि अबैत रही। पहिलबेर एतेकटा शहर अयलहुँ अछि। हावड़ा स्टेसनसऽ बाहर आबिकऽ तऽ हमर हाथे पएर सुन्न भऽ गेल भीड़ भाड़ देखिकऽ। टैक्सी लेलहुँ आ ओकरा एतुका पता कहलिऐक। संयोगसऽ ओ नीक लोक आ बिहारीए छल। नीक जकाँ एतऽ धरि पहुँचा देलक। आब अहाँ भेटि गेलहुँ तऽ आधा कन्फीडेन्स हमरा अहिना आबि गेल।’’ रेखा प्रसन्न होइत बाजलि।

‘‘अहाँ कोन ट्रेनसऽ अयलहुँ ?’’

‘‘गंगासागरसऽ।’’

‘‘अरे हमहुँ तऽ दरभंगामे गंगेसागर पकड़ने छलहुँ।’’ संदीप कहलकैक।

समय पर लिखित परीक्षा आ इन्टरव्यू भेलैक। चारि बजे रीजल्ट सुना देल गेलैक। रेखा आ संदीप दुनूक सेलेक्सन भऽ गेल छलैक। रीजल्ट सुनि दुनू बेस प्रसन्न भेल छल। हाथ मिलाकऽ एक दोसरकेँ बधाइ देने छलैक।

‘‘तखन आब ?’’ संदीप पुछलकैक।

‘‘आब सातम दिन ज्वाइन करबा लेल अयबाक छैक। अहाँ वापस कोना हेबैक ?’’ रेखा पुछलकैक।

’’हमरा घुरतीक रिजर्वेसन नहि अछि। आब तऽ जेनरले बोगीमे लटकि फटकि कऽ जाए पड़तैक।’’ संदीप बाजल।

‘‘हम कोना जाएब से फुराइते ने अछि। कंपनी लिखने छलैक जे दू तीन दिन ठहरबा लेल तैयार भऽकऽ अयबा लेल। तें घुरती टिकट हमहुँ नहि लेलहुँ। हम तऽ आब काल्हिए कोनो जोगार करब।‘‘ रेखा बाजलि।

‘‘रातिमे कत्त रहबइ अहाँ ?’’

‘‘सैह तऽ सोचि रहल छी। अच्छा जँ आइ रीजल्ट आइ नहि फरिछैतैक तऽ अहाँ कत्त ठहरितिऐक?’’ रेखा पुछलकैक।

‘‘कोनो होटलमे रहि जइतिऐक। आर की।’’ संदीप बाजल।

‘‘तखन एकटा मदति करु। हम आइ धरि कोनो होटलमे नहि रहल छी। तें कने हमरा संग चलू। होटलमे हमरा लेल एकटा रूम बुक करा दीअऽ तखन अहाँ चलि जाएब । हम काल्हि कोनो ट्रेनसऽ दिने दिने पटना आ ओतऽ सऽ बससऽ मधुबनी चलि जाएब।’’ रेखा आग्रह करैत बाजलि।

संदीप कने काल चुप रहल तखन बाजल, ’’आब हम अहाँ एकेठाम नौकरी करब। सहकर्मी होएब तखन अहाँकेँ अनजान जगहमे असगर छोड़ि चलि जायब उचित नहि बुझा रहल अछि। हमरे कोन रिजर्वेसन अछि जे गाड़ी छुटल जाइअए। चलु हमहुँ एकटा रूम लऽकऽ रहि जाइत छी। काल्हि दुनू गोटा संगे पटना चलब।’’

‘‘अहाँ कते नीक छी संदीपजी!’’ प्रसन्नतासऽ रेखा बाजल छलि।

तहिआसऽ दुनूगोटा संगे रहए लागल। ज्वाइन करऽ दुनू संगे आयल। एके होटलमे फेर ठहरल। एक सप्ताहक बाद एकटा तीन बेडरूम फ्लैट भाड़ा पर लेलक। एकटाकऽ बेडरूम ओ सब अपन अपन रखलक आ एकटा साझी रहलैक गेस्ट रूम हिसाबे। दुनू अनजान जगह पर एक दोसराक सहारा छलैक। नीक बेजाएमे संग रहए लगलैक। तखन एतेक आपकतामे दू युवा हृदयमे प्रेमक उद्भव होएब कोनो आश्चर्यक बात नहि छलैक आ से भेलैक। मुदा प्रेमकेँ व्यक्त करब आ खुलिकऽ स्वीकार करब कठिन बुझा रहल छलैक।

एक रविकऽ भोरे दुनू बालकोनीमे बैसल छल। एकाएक संदीप कहलकैक, ‘‘रेखा, अहाँ एकटा बात जनैत छी जे मैथिलीमें छौंड़ा छौड़ीक बीच प्रेम करबाक भाषाक विकास नहि भेल छैक ?’’

‘‘एकर की मतलब भेलैक सैह हम नहि बुझलहुँ। कने फरिछाकऽ कहिऔक।’’ रेखा बाजलि।

‘‘देखऔ हिन्दीमे प्रेमक संबोधन छैक ‘तुम’। तहिना बंगलामे छैक ‘तुमि’। मुदा मैथिलीमे छैक अहाँ - अहाँ। से कहू तऽ अनकाइन सन लगैत छैक वा पति पत्नी सनक।’’ संदीप बाजल।

‘‘से किए! मैथिलीओ मे तऽ छैके - तों, तोरा, रौ, गय आदि।’’ रेखा कहलकैक।

‘‘हँ छइ तऽ अवस्से मुदा ओकर प्रयोग अपना ओइठाम छोटाह बना देने छैक।’’ संदीप निराश जकाँ बाजल।

‘‘अपना ओइठाम माए, बहीन, पीसी, आ बेटा, भाए, भतीजा आदिकेँ छोड़ि अन्यकेँ लोक ‘अहाँ’ कहैत आयल छैक। छौंड़ी छौंड़ा स्कूल कालेजमे हिन्दी अंग्रेजीमे प्रेम कऽ लैत अछि। मिथिलामे पति पत्नीक बीच प्रेम छोड़ि आर कोनो प्रेमक मान्यता नहि छैक। तें साहित्य सेहो एहि संबंधमें चुपे सनक अछि। तखन प्रेमक भाषाक विकास मैथिलीमे होउक कोना। मुदा अचानक अहाँकेँ आइ मैथिलीमे प्रेमक भाषाक खगता किएक भऽ रहल अछि।’’ रेखा आश्चर्यसऽ हँसैत कहलकैक।

‘‘हम अइ ‘अहाँ अहाँ’ केँ कतेक दिन उघैत रहब। तें एकरासऽ मुक्त होबऽ चाहैत छी।’’ संदीप कने कुटिल मुस्कानक संग बाजल।

‘‘अर्थात् ?’’

‘‘अर्थात् जे हम आब रेखाकेँ ‘अहाँ’ नहि बल्कि ‘तों, तोरा, गय’ कहऽ चाहैत छी।’’ संदीप खुलिकऽ बाजल।

‘‘अँय रौ छौंड़ा तों हमरा एना घुमा फिराकऽ प्रपोज कऽ रहल छें। दुष्ट नहितन !!’’ रेखा ओकरा कुर्सी परसऽ ठेलैत कहलकैक।

संदीप कुर्सी परसऽ खसैत खसैत बाँचल, ‘‘गय दुष्ट तों एना ठेलिओकऽ हमर प्रेम स्वीकार तऽ कएलें ने ?’’

‘‘तोरे भाषामे स्वीकार केलिऔक तखन आब संदेह किएक होइत छौक!!’’ रेखा बाजलि।

तकर बाद दुनूकेँ जोरसऽ हँसी लागि गेलैक। बड़ीकाल धरि दुनू हँसैत रहल।

‘‘एतेक भूमिका बान्हिकऽ तोहर प्रपोज करब हमरा बड़ नीक लागल संदीप ! यू आर रीअली समथिंग।’’ रेखा आनन्दित होइत ओकर हाथ अपना हाथमे लैत कहलकैक।

‘‘तों सेहो जाहि विधिए अपन स्वीकृति देलैं से अद्भुत छलौक। सत्ते हमरा बड़ नीक लागल रेखा। हमरा तोरा बीच आब ई औपचारिकताक बन्हन टूटब आवश्यक भऽ गेल छल।’’ संदीप बाजल।

‘‘तैओ एकटा बात हम साफ साफ कहि दैत छिऔक बाबू! एकरा बंबईआ लिव इन रिलेसन नहि बुझि लिहें।’’ रेखा कहलकैक।

‘‘हम तोरासऽ रोमान्स नहि करैत छी। हम तोरा प्यार करैत छिऔक रेखा। प्रेममे तोहर सुनरताइ, तोहर मुस्कान, तोहर भावना, तोहर दृष्टि अही सबसऽ काज चलैत रहत। जँ हमसब रोमान्स करितहुँ तऽ अइ सभक कोनो महत्व नहि रहितैक। रोमान्स मे चाहैत छल केवल तोहर देह। तोरा कोनो शिकायतक अवसर हम नहि देबौक कहिओ।’’ संदीप ओकर माथ अपन छातीमे सटबैत बाजल।

‘‘बाप रे बाप! तों कते बात जनैत छें संदीप! हम सत्ते तोरासऽ प्यार कऽकऽ ......।’’ रेखा बजैत बजैत चुप भऽ गेलि।

दुनू एक संग रहैए दुनू एक रंग रहैए।

रेखाकेँ माए छैक बाप नहि छथिन। रेखा जखन तीने बरखक छल तऽ बाप मरि गेलखिन। माए अपन पऽर पटिदारक दबाब आ कुटचालिकेँ बरदासि करैत एकमात्र संतान लेल जान उपछि देने छैक। रेखा अपनहुँ माएक कामना पूर्ण करबा लेल जी जानसऽ परिश्रम कएने छैक। आब तऽ सहजहिं ओ अपन पएर पर ठाढ़ भऽकऽ घरक दरिद्रा आ माएक मुँहक उदासी कात कऽ देने छैक।

संदीपक घरमे एकर ठीक उलटा बाप छथिन माए नहि। बाप आ एकटा छोट भाए गाममे रहैत छथिन। भाए लोकल कालेजमे बीएमे पढ़ैत छैक। गाम छैक कोशीक तटबंधक भीतर। नाव आ साइकिल अखनहुँ सबसऽ सुभीता सवारी छैक ओकरा गामक। खेत पथार कम नहि छैक मुदा उपजा छैक भगवाने भरोसे। ने गाममे नीक जकाँ बसले अछि ने गाम छोड़बाक सट्ठे छैक। संदीप अपन बापक सबटा आशाक केन्द्र विन्दु छैक। संदीपक बिआह हेतैक पुतहु घर औतीह आ फेर घरमे लक्ष्मीक पएर पड़त से सपना सजौने छथिन। गाममे सज्जन मुदा कहबैका लोक छथि पंडित दीनानाथ झा। बेटा एमहर प्रेमक पाठ पढ़ि हुनकर जाति धर्ममे पलीता लगा रहल छथिन बिनु कोनो परिणामक अनुमान कएने। से धराधर अध्यायक अध्याय रटि गेलखिन अछि। परिणाम बुझि आइधरि के प्रेम कएलक जे ओ सब करओ। तें सबटा अवधारने अछि दुनू।

तैओ एकदिन रेखा अपन संदेह व्यक्त कएने छलि, ‘‘हमर सबहक ई एकतरफा प्यार कोन रंग आनत से कहिओ सोचैत छें संदीप।’’

‘‘एकतरफा माने ?’’ संदीप अकचकाइत बाजल।

‘‘एकतरफा माने ई जे हमसब अपने मोने तऽ प्रेममे बोरल जा रहल छी मुदा गार्जियनक बिचारक कोनो अटकर अछिए नहि।’’ रेखा स्पष्ट कएलक।

‘‘तोहर की बिचार छलौक जे माएसऽ पतरा देखाकऽ कुल गोत्र पुछिकऽ प्यार प्रारंभ करी- माताजी जँ अपने आदेश करी तऽ प्रेमक हम श्रीगणेश करी ?’’ संदीपक मसखरी सुनि दुनूकेँ हँसी लागि गेलैक।

‘‘प्यार नेआरिकऽ नहि होइत छैक मैडम। इन्टरव्यूक दिन गाछक तर पहिलबेर तोरा देखिते भेल जे अरे ई छौंड़ी तऽ हमर अछि! ई कतए हेराएल छलि एतेक दिन। से तेहन जोरदार घायल भेलहुँ जे पंडित दीनानाथ झाक सबटा शिक्षा बिसरा गेल। तखन आदेश प्राप्त करितहुँ कखन।’’ संदीप हँसैत कहलकैक।

‘‘अच्छा! लव ऐट फर्स्ट साइट!! तें बाबू पहिले दिनसऽ एतेक ध्यान राखब शुरू कऽ देने छलाह।’’ रेखा सेहो हँसैत बाजलि।

‘‘आर ने तऽ की हमरा कुकुर कटने छल जे अनठीआ छौंड़ी लेल ओतेक तरद्दुति करितहुँ।’’ संदीप फेर हँसल।

‘‘तों कते खराब लोक छें संदीप। हम एतेक दिन बुझैत रही जे तों असगर मैथिल लड़की देखि हमर मदति कएने रहइ। आ तों अपना योजना पर काज कऽ रहल छलें। बाप रे! छौंड़ा सब लड़की पटाबक कतेक दाव जनैत छैक!!’’ रेखा संदीपकेँ ठेलैत बाजलि।

‘‘जी मैडम एते सुन्नरि गर्लफ्रेन्ड पाबऽ लेल दाव सीखहे पड़ैत छैक। हँ तऽ तोरा खगता छौक गार्जियनक। प्यार करबामे हुनकर कोनो भूमिका नहि छनि। भूमिका हेतनि बिआहमे। आ से तऽ हमरा लोकनि एखन कएलहुँ नहि। हम तों एक दोसरकेँ प्यार करैत छी। प्रेम लेल एतेक पर्याप्त छैक।’’ संदीप बाजल।

‘‘वाह रे निश्चिन्त लोक! आ अइ प्यारक परणिति बिआह छैक की नहि से बाज तऽ।’’ रेखा फेर जोर देलकैक।

‘‘ओकर समय एखन नहि आयल छैक।‘‘

‘‘से कोना ?’’

‘‘देख रेखा प्रेम एकटा अस्थायी दिवानापन छैक। ओ दिवानापन भूकम्प जकाँ उद्वेलित करैत छैक दुनूकेँ आ फेर शान्त भऽ जाइत छैक। ओ उद्वेलन शान्त भेलाक बादे ई जाँच करबाक आ निर्णय करबाक छैक जे प्रेमी जोड़ाक मोऩ एक दोसराक संग गुंफित भेलैक की नहि। ओ जोड़ फेर टूटतैक तऽ नहि।’’ संदीप गंभीरतासऽ बाजल।

‘‘तऽ की हमरा लोकनि एखन भूकंपमे जीबि रहल छी ?’’ रेखा पुछलकैक।

‘‘ऑफकोर्स।‘‘ संदीप ओकरा बाँहिमे लैत कहलकैक, ‘‘आ भूकम्पक धमक हमरा छातीमे सुनि ले। उत्तेजना, वादा अथवा पैशनक नाम प्रेम नहि छैक। प्रेम तऽ एकटा आनन्ददायी घटना छैक। सबसऽ सुन्दर कला आ जीवनक सबसऽ महत्वपूर्ण समय। ओकरा ओही रूपमे लेबाक चाही।’’

‘‘तों प्रेम कतेक नीक जकाँ बुझैत छें संदीप। हम ई सब बात किएक नहि बुझैत छिएैक!’’ रेखा ओकरा देहमे आर नीक जकाँ सटैत बाजलि।

‘‘ प्रेम करब प्रारंभ कएने छें ने। हम सबटा बुझा देबौक’’ संदीप बाँहिकेँ आर सक्कत करैत बाजल।

किछु दिनक बाद रेखाक माए कोलकाता अएलखिन। बेटीकेँ संदीपक संग एके फ्लैटमे रहैत देखि कोनो अन्यथा प्रतिक्रिया व्यक्त नहि कएने छलखिन। ओ शनि दिनकऽ पहुँचल छलखिन। ओ कीचन एकदम खाली देखि बेटीकेँ पुछलखिन, ‘‘भनसाघरमे तऽ किछु छौके नहि तऽ भोजन कोना करैत छें रेखा ?’’

‘‘एक साँझ कंपनीक कैंटीनमे आ दोसर साँझ बाहर होटलमे।’’ रेखा बाजलि।

‘‘आ तोहर संगी संदीप ?’

‘’आहो ओहिना करैत छैक।’’

‘‘ओ अनठीआ भऽकऽ शुरुएसऽ तोहर एतेक मदति केलखुन। अखनो अपन जकाँ ध्यान रखैत छथुन आ तों बेचाराकेँ एक साँझ भोजनो बनाकऽ नहि देलहिन।’’ माय कहलकैक।

‘‘माय तों ओकरा ओतेक बेचारा नहि बुझहिन। अहिना एक सहकर्मी दोसरक मदति करैत छैक। ओहो कनेमने हमर संग देलक तें की हम ओकर गुलाम भऽ गेलिऐक जे ओकरा भोजन बनाकऽ खुएबइ ? नौकरीओ करबइ आ भानसो करबइ से की संभव छैक माय ! ओ हमर सहकर्मी अछि मात्र दोस्त। तों कोनो आन बात नहि सोचि लिहें से कहि दैत छिऔक।’’ रेखा बाजलि।

‘‘हम कहाँ किछु कहइ छिऔ। बालिग छें असगर बाहर रहइ छें अपन नीक बेजाए आब अपने बुझबें। सबदिन हम थोड़बे संग रहबौंक। मुदा एकटा बात कहि दैत छिऔक जे हम सब दिन होटलमे नहि खाएब।

सब वस्तुजात किनिकऽ लऽ आन। काल्हिसऽ भानस हम अपने करब।’’ माए कहलखिन।

’’हम तऽ एकबेर कहलिऐक जे कीचनमे सबटा समान रहबाक चाही। कहिओ काल जँ मोन भेल तऽ किछु बनाइओ लेलहुँ। मुदा तोहर ओ बेचारा एकदम मना कऽ देलक। तऽ हमरे कोन खगता रहए जे खुशामद करिऔ गऽ। हमर सबहक रूम आ बाथरूम ने अलग अलग अछि। कीचन तऽ साझिए छैक। जे करबैक से दुनूक सहमतिए सऽ किने। ओ मना कएलक तऽ हमहुँ अनठा देलिअइ। ओ अबैत छैक तऽ तोंही पूछि लिहैंक।’’ रेखा स्पष्ट करैत बाजलि।

‘‘पूछि की लेबैक! ओ की हमरा मना करताह। हम तऽ.......।’’ माए एखन बात पूरा कएनहुँ नहि छलखिन की संदीप रूममे प्रवेश कएलक। दुनू माइधी ओकरे देखऽ लागलि। ओकरा संग एकटा रिक्साबला सेहो छलैक। दुनूक हाथमे मारिते रास झोड़ा आदि छलैक।

‘‘अइ झोड़ा सबमे एतेक रास कोन समान सब छउ संदीप।’’ रेखा पुछलकैक।

‘‘कीचनक बर्तनभड़ा आ राशन तरकारी अदि।’’ संदीप कहलकैक।

दुनू माइधी छगुन्तासऽ एक दोसराक मुँह ताकऽ लागलि।

फेर संदीपे बाजल, ‘‘आंटी की हमरे सब जकाँ सबदिन बाहरे खेथिन ! तें सब प्रबंध कऽ अनलिऐक। गैसक कनेक्शन तऽ छैके। जखन मोन हेतैक तऽ आब बनाइओकऽ खाएल जेतैक। अइमे हर्जे की! की आंटी ?’’

‘‘हमसब यैह तऽ चर्चं करैत रही ता अहाँ सब किछु किनिओकऽ लऽ अनलिऐक। अहाँ कते नीक छी बौआ! हमरा मोनक बात बुझि गेलिअइ।’’ माय प्रसन्नतासऽ अभिभूत भए कहलखिन।

‘‘हँ हँ बड़ नीक बौआ। बड़ अगरजानी पंडित। यैह बात जखन हम कहैत रहिऐक तऽ बड़का बड़का फिलासफी झाड़ैत रहए आ माएकेँ इम्प्रेस करबा लेल देखिऔ केहन ज्ञानी केहन सुशील बनि गेलैक। बाप रे बाप छौंड़ा सब कतेक गँओ सब जनैत छैक !!’’ रेखा व्यंग करैत कहने छलैक।

‘‘अँए गे! तों एना रेकार मारिकऽ किएक बात करैत छहुन हिनकासऽ। यैह संस्कार सिखने छें गाममें ?’’ माएकेँ रेखाक बाजब बेजाय लागल छलनि।

‘‘गाममे जे सिखौलँए से बाप-पित्ती सब लेल किने। एकरा लेल तऽ नहि सिखौने छें। ई तऽ हमर संगी सहकर्मी अछि। एकरा की कहिऔ ‘यौ संदीप बाबूजी यौ’ ?’’ रेखा हँसैत बाजलि आ फेर सब एक संग हँसऽ लागल।

‘‘छोड़ि दिऔ आंटी, ई संबोधन हमसब सहमतिएसऽ बजइ छी। अइमे कने बेसी अपनापन बुझाइत छैक।‘‘ संदीप समर्थन करैत बाजल।

‘‘ठीक छइ जे अहाँ सबहक मोन।’’ माए कीचनमे समान सरिआबए लागल छलीह।

रेखाक माए तऽ माए छलखिन। बेटीमे प्राण बसैत छलनि। जे बेटीकेँ पसिन्न सैह हुनको पसिन्न। ओ गाम जएबासऽ पूर्व एकबेर रेखासऽ बिआहक मादें पुछने छलखिन तऽ रेखा कहने छलनि जे तों चिन्ता नहि कर माए। हमरा पर भरोसा राख। हम कोनो एहन ओहन काज नहि कऽ सकैत छी। समय पर सब मनोरथ पूरा हेतौक। किछु समय आर दे। माए निश्चिन्त भऽकऽ गाम घुरल छलखिन।

असली परीक्षा प्रारंभ भेलैक जखन संदीपक बाप आ भाए कोलकाता आबक सूचना देने छलखिन। रेखा डेरा गेल छलि, ‘‘संदीप आब की करबें ?’’

‘‘की करबें माने ! आब दू बरखसऽ हमसब नौकरी करैत छी आ एक फ्लैटमे रहैत छी। हमर छोट भाए कएबेर आबिकऽ सबटा देखिए गेलए। हमहुँ कएबेर गाम गेलहुँए। आब बाबू अबैत छथिन तऽ की हेतैक। जेना रहैत छी तहिना रहब। ने किछु गलत कएलहुँ ने किछु नुकाबक खगता अछि। फ्लैटक भाड़ा आधे देबऽ पड़ैए से देखि तऽ ओ प्रसन्ने हेताह।’’ संदीप बाजल।

‘‘एतबो आसान नहि छैक बौआ जेना तों हँसीमे बजैत छें। तोहर भाए पढ़ैत लिखैत छौक। ओ दुनिया देखइ सुनइ छइ ओकरा ई सब पचब ओतेक कठिन नहि छैक। मुदा कोसिकन्हाक पंडित श्री दीनानाथ झा बाप भऽकऽ एतेक जल्दी सबटा स्वीकार करथुन से असंभव।’’ रेखा बाजलि।

‘‘ठीक छैक तऽ तोंही कह जे की करबाक चाही ?’’ संदीप पुछलकैक।

‘‘जँ तोहर बिचार होउक तऽ जाधरि ओ सब एतऽ रहथिन हम अनामिकाक संग ओकरे डेरामे रहि लेब।’’ रेखा सुरक्षित प्रस्ताव रखलक।

‘‘नहि किन्नहु नहि। से की हमसब कोनो चोरीनुकी कएने छी जे डेरायब। प्रेम करब अधलाह बात नहि छैक। एक ने एक दिन तऽ ई सत्य प्रकट होबाक छैके तऽ अही बेर भऽ जाइक तऽ बेजाय की। बाबू देखि लेथिन बुझि लेथिन सब किछु तऽ बढ़ियें हेतैक। बात पुरनेतइ तऽ हुनको बिचार बदलतनि। कोनो स्थितिमे हम तोरा अनका घर नहि पठा सकैत छी। अइसऽ तऽ हमर सबहक अपराधबोध प्रकट हैत जे अपराध हमरा लोकनि करबे ने कएलहुँ।’’ संदीप अपन दृढ़ता देखौलक।

‘‘एखन जतेक वीरता देखबैत छें से बाबूक समक्ष रहतौक तखन ने। तों एखन धरि अपना बाबूक मादें जे किछु कहने छें ताहिसऽ आशंका होइअए जे किछु गड़बड़ ने भऽ जाउक।’’ रेखा एखनो डेरायल छलि।

‘‘से जे हैतैक आब तकर समाधान निकालल जेतैक। तोहर माएसऽ सीखऽ पड़तनि हमरो बाबूकेँ।’’ संदीप बाजल।

पंडित दीनानाथ झा शनिदिन भोरे साल्टलेक डेरा जुमि गेलाह। छोटका बेटा प्रदीप संगे छलखिन तें कोनो कष्ट नहि भेलनि। ओ पहिलहुँ एकाध बेर कोलकाता गौंआक डेरा पर आयल छथि। तें बेसी अनभुआर नहि लागल छलनि। संदीप दुनू गोटाकेँ तेसर बेडरूममे स्थापित कऽ देलकनि। स्नान जलखइ होइत होइत पंडितजीकेँ सबटा सुनगुन लागि गेलनि। ओ पहिले प्रदीपसऽ पूछिकऽ बातक संपुष्टि प्राप्त कएलनि तकरा बाद हुनका एको क्षण बरदासि नहि भेलनि। भोजनोपरान्त बेरिआमे संदीपसऽ पुछारि कएलनि। संदीप सबटा सत सत संक्षेपमें कहि देलकनि। आब तऽ पंडितजी अग्निश्च वायुश्च भऽ गेलाह। कन्याक जाति दोसर तऽ ओतेक कष्टक बात नहि लगलनि मुदा दू बरखसऽ बिनु बिआहे संग रहबाक बात किन्नहु नहि अरघलनि। ओ बेटाकेँ किछु उठा नहि रखलखिन। संदीप एकबेर सबटा कहलाक बाद चुप्पी लगा देलक। बाबूक पहिल तामस पिबि लेबाक सोचि लेने छल। पंडित बजैत बजैत जखन चिकरए लगलखिन तऽ प्रदीप मैदान सम्हारलक, ’’बाबूजी कने नहुँए बजिऔ। अइठाम अगल बगलमे आन लोक सब छइ। अपन गामक लोक नइ छइ। समय बढ़िकऽ कहाँ सऽ कहाँ चलि गेलइ आ अहाँ एखनो कोसिकन्हाकेँ पकड़ने छी। बेटाकेँ नौकरी चाही मल्टीनशनलमे आ परंपरा चाही मिथिलाक अठारहम शताब्दीबला। दुनू कोना कऽ हैत। ई सब बात आब शहरमे रेहल खेहल भऽ गेल छइ। तैओ भैया अहाँक परंपराकेँ ओतेक खंडितो नहि कएलनि अछि।’’

बाप शान्त होएबाक बदला आर बेसी गरजऽ लगलखिन। पहिले लक्ष्य मात्र संदीप छल आब प्रदीप सेहो निसाना पर आबि गेल छल, ‘‘तों सब आब हमर बेटा नहि मास्टर भऽ गेलाहें। आब परंपरा आ आधुनिकता हमरा तोरा सबसऽ पढ़ पड़त। जाति पाति जँ बिसरिओ जाइ तऽ बिनु बिआहे कनिया संग दू बरससऽ रहैए, ई होइ ? तखन उलटे हमरे पढ़बऽ चललए दुनू। हम बड़ बकलेल बड़ गमार आ ई दुनू लंदनमे जनमल बड़ होशियार। रौ तोहर माय मरि गेलीह तऽ हम तोरे दुनूके देखिकऽ संतोष कएलहुँं तहिएसऽ आस लगौने छलहुँ जे पुतहु ताकब। बेटाक बिआह करायब। पुतहु परिछिकऽ घर आनब। फेर लक्ष्मीक पएर घरमें पड़त। उजड़ल घर फेर घर भऽ जाएत। तों सब सबटा सत्यानास कऽ देलें आ आब हमरा गमारो कहैत छें। हमरा बुते आब समझौता करब पार नहि लगतौ। काल्हि हम मनोहराक डेरा कालीघाट चलि जाएब आ ओतहिसऽ गाम। ज्जो भरि पौलहुँ तोरा दुनू भाइसऽ।’’

‘‘बाबू अहाँ बात नीक जकाँ कने बुझि लिऔक। अहाँक कोनो मनोरथ हम नहि तोड़लहुँ। आधुनिकताक संग सेहो परंपरा निमाहल जा सकैत छैक। से ज्ञान अहाँसऽ हमरा सबकेँ भेटल अछि। तकरा हम नहि बिसरल छी। हम एक फ्लैटमे अइ दुआरे छी जे दुनूक आधा भाड़ा बचैत अछि। हम दुनू गोटा बिआह अवश्य करऽ चाहैत छी मुदा कोनो सीमाक अतिक्रमण हमसब नहि कएने छी। अहाँक जे सेहन्ता अछि से पूरा करू। ओहिमे कहाँ कोनो भाँगठ पड़लए। एकेटा कमी भेलए जे कन्या अहाँक बदला हम स्वयं ताकि लेने छी। शेष सबटा बाकिए अछि। हमरा पर विश्वास करू आ हमरा क्षमा कऽ दीअऽ।’’ संदीप अन्तिम बात बाजिकऽ उठि गेल। सब चुप छल। अपना रूमसऽ रेखा सेहो सबटा सुनि रहल छलि। ओ भोरसऽ एखन धरि एको बेर बाबूक आँखिक सामने नहि पड़ल अछि। संदीप अपन रूममे गेल आ तैयार भऽकऽ घरसऽ बाहर भऽ गेल।

पंडित दीनानाथ झाक मोन बेस छटपटा रहल छलनि। की करी की नहि। एकदिस बेटाक प्रसन्नता आ दोसर दिस अपन मोनक टीस। कोन दिस बढ़ि जाथि से निस्तुकी एतेक जल्दी कोना होइतनि। घसमोड़िकऽ ठामे ओछाओन पर पड़ि रहलाह। कने नीन्न सेहो भऽ गेलनि। जखन आँखि खुजलनि तऽ फेर वैह गुनधुनी धऽ लेलकनि। आब ओ अइ पार की ओइ पार करबाक मोन बना लेलनि। जोरसऽ हाक देलखिन, ’’प्रदीप कहाँ छें ?’’

बालकोनीसऽ आबिकऽ प्रदीप ठाढ़ भेल। ‘‘संदीपकेँ बजा। आब तसफीआ भैए जाए।’’

‘‘भैया तऽ तखने घरसऽ निकलि गेलाह। औताह तखने बात हैत।’’ प्रदीप कहलकनि।

साँझ भेल राति भेल मुदा संदीप नहि घुरल। प्रदीप भोजन बनौलक। दुनू बापुत भोजन लेल प्रतीक्षा कऽकऽ थाकि गेलाह संदीप नहि घुरल। आब सबकेँ चिन्ता होएब स्वभाविक छलैक। रेखा सेहो अपन रूममे चिन्ता मग्न छलि। ओकरा होइत छलैक जे ओकरे कारण एकटा परिवार छिन्न भिन्न होएबा पर आबि गेल छैक। फेर होइत छलैक जे ओ कोनो गलती तऽ नहि कएने अछि। ओकरा संदीप पर दया अबैत छलैक जे ओ बेचारा असगरे ई युद्ध लड़ि रहल छैक। जखन की ओकर आधाक सहभागी तऽ ओहो अछि। ओकरो किछु करबाक चाही। मुदा की ? ओ की करओ ? संदीप घर छोड़िकऽ निकलि गेल छैक से अलग चिन्ताक बात छैक। मोबाइल धरि स्वीच आफ कएने छैक। बड़का वीर बनैत छलैक ओकरा सामने। बाप जहाँ एकबेर हुरपेटलकैक की बस्स...। सब शेखी घुसरि गेलैक। बापक मिनती करबाक बदला रण छोड़ि देलक। आब ओकरा कतऽ ताकल जाए। ओ सब दोस्त सबसऽ घुमा फिराकऽ पुछि लेने छल। केओ कोनो सूचना नहि देने छलैक।

रातिमे केओ भोजन नहि कएलक। पंडितजी आब दोसरे फाँकमे फँसि गेलाह। भेलनि जे परंपराक रक्षामे कहीं बेटे ने हाथसऽ निकलि जानि। पत्नीक मृत्युक बाद जे तपस्या कएलनि से जिद्दक कारण कहीं भंग ने भऽ जानि। तकर चिन्ता होबऽ लगलनि। आखिर संदीप चलि कतऽ गेल ? हम बाप छी एकबेर विरोधो करऽ सऽ गेलहुँ। एकबेर डाँटहु सऽ गेलहुँ। एखन तऽ गपेसप ने भऽ रहल छलइ। एहन कोनो निर्णय तऽ हम नहि कहि देलिऐक जे ओ.....। हम तऽ एखन ओहि कन्याकेँ देखबो नहि केलिऐक अछि। ई काज तऽ संदीपेक छलैक। प्रदीप कहलक जे कन्या बड़ सुन्नरि आ सुशील छैक। से देखितिऐक तऽ कहीं हमर मोन बदलिए जाइत। से प्रयास नहि कएलक आ भागि गेल। रातिभरि अहिना कछमछ करैत बिति गेलनि। एको बेर आँखि नहि लगलनि।

भोरेसऽ फेर प्रदीप जहाँ तहाँ बौआए लागल जे कतहु भाए अभरि जाइक। ओ ओतेक चिन्तित नहि छल। ओ बुझौत छल जे भैया कोनो होटलमे रुकिकऽ बाबूक तामस कम हेबाक प्रतीक्षामे हेताह। बाबूक कमजोरी हम दुनू भाइ छिअनि। एकाधे दिनमे तामस बिला जेतनि। से बात भैया सेहो बुझैत छथिन।

दीनानाथ बाबू असगरे अपन रूममे पड़ल चिन्ता मग्न छलाह। ‘‘बाबूजी हम अपनेसऽ दू मिनट बात कऽ सकैत छी?’’ नारी कंठ सुनि ओ चेहा उठलाह। केबाड़ दिस देखलनि। सलवार कुर्त्ता ओढ़नी पहिरने ठाढ़ि एकटा दिव्य कन्याकेँ देखिते रहि गेलाह। हुनका ई बुझबामे कनिओ भांगठ नहि रहलनि जे ओ के अछि। उठिकऽ बैसैत बजलाह, ‘‘हँ हँ किएक नहि। आउ बैसू।’’

रेखा एकटा कुर्सी पर बैसि गेलि।

‘‘हँ आब कहू।’’ दीनानाथ बाबू बजलाह।

‘‘हमर नाम रेखा अछि। हम संदीपक संग ओही आफिसमे काज करैत छी।’’ रेखा कहब प्रारंभ कएलक आ अपन सबटा भूगोल इतिहास सुनबैत आगु कहलकनि, ‘‘ संदीप आ हम एक फ्लैटमे रहैत छी। मुदा एक संग नहि रहैत छी। हमरा दुनू गोटाकेँ अपन मर्यादाक सीमा बुझल अछि। पुतहुक अपनेक सब सेहन्ता हमरो सऽ पूर्ण भऽ सकैए। हम मैथिले कन्या छी। सासु ससुरक प्रति की कर्त्तव्य होइत छैक से हमरो बुझल अछि। पढ़ि लिखि लेलासऽ की नौकरी कएलासऽ लोक आन नहि भऽ जाइत छैक बाबूजी। हँ तखन कनेमने चलनसारि अवश्य बदलि जाइत छैक। आ से बदलाव तऽ संस्कृतिमे होइते रहबाक चाही। तखने हम दोसर संस्कृतिक संग बराबरी कऽ सकब अन्यथा जमकल पानिमे कदइ पकड़ि लेत।’’

दीनानाथ बाबू रेखाक रूप गुण आ बुद्धिसऽ चमत्कृत भऽ चुकल छलाह। एहने पुतहु तऽ ओ चाहैत छलाह। बजलाह, ‘‘अहाँ की चाहैत छी बौआ ?’’

‘‘अपनेक स्वीकृति आ आशीष।’’ रेखा बाजलि।

‘‘अहाँ सनक पुतहु ककरा नहि चाही।’’ ओ ठाढ़ होइत बजलाह।

रेखा हुनका पएर पर झुकि गेल।

‘‘मुदा संदीप ?’’ दीनानाथ बाबू आशिर्वाद दैत अपन चिन्ता प्रगट कएलनि।

‘‘ओ बड़ संतुलित आ बुझनुक लोक छथि बाबूजी। ओ अपनेक डरे कोनो होटलमे छथि। ओ लीव नहि लेने छथि तें काल्हि आफिस अवश्य औताह। हम जखने अपनेक आशिर्वादक बात कहबनि की ओ घुरि औताह। अपने चिन्ता नहि करू।’’ रेखा कहलकनि।

‘‘अहाँ जखन एतेक विश्वाससऽ कहैत छी तऽ चिन्ता किएक करब।’’

‘‘हम भानस बनबैत छी। अपने प्रदीपकें फोनसऽ वापस बजा लिऔन। सबगोटा कल्हुके खएने छी।’’ रेखा अह्लादसऽ बाजलि।

दीनानाथ बाबूक आँखि भीजि गेलनि। ओ प्रदीपक नंबर मिलाबऽ लगलाह।
श्याम दरिहरे
साभार- साहित्यिक चौपाड़ि पत्रिका

Saturday, 9 February 2019

फगुआ: मिथिला-मैथिलक गर्व-पर्व - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

महाप्रभु श्री चैतन्यदेव 
समस्त मानव समुदाय हेतु पाबनि-तिहारक एकटा विशेष महत्व अछि। एकटा खास तरहक जीवन शैलीमे दीर्घकाल धरि रचैत-बसैत लोकक मनः स्थितिमे एक प्रकारक श्रांति आबि जाइत छैक जे कि जीवनक आनो प्रभागके प्रभावित करय लगैत छैक। एहि श्रांति (थाकनि) के पुनर्गति प्रदान करबाक हेतु मानवक जीवन शैलीमे उत्सवक व्यवस्था धराओल गेल अछि। ई उत्सव आ कि पाबनि तेहार अपन विभिन्न रूप-प्रतिरूपसँ हमरा सभक जीवन आ ओकर गतिके समृद्ध करैए। उत्सव-पर्वादिक आनंदोत्सव आ विरहोत्सव नाम सँ दू टा मुख्य प्रभाग भ’ सकैए जकरा सांस्कृतिक, साहित्यिक, धार्मिक, शैक्षिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि रूपमे सेहो पुनर्विभाजित कयल जा सकैए। फगुआ सेहो एकटा एहने उत्सव अछि जे अपन सांस्कृतिक- ऐतिहासिकादि महत्व लए एकटा प्रसिद्ध पर्व अछि। सब पाबनिक संग कोनो विशेष घटना अवश्ये रहैत अछि। फगुओक संग कएक रंगक घटना जुड़ल अछि। श्रीमद्भागवत महापुराणक सातम स्कन्धक जय-विजय, हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यपु, प्रह्लादिक कथासँ प्रारंभ होइत अछि जाहिमे हिरण्यकश्यपु अपन भगवद्भक्त पुत्र प्रह्लाद भगवद्विमुख नहि क’ सकला सन्ताँ ओकरा मृत्युदंड सुना, मारबाक कतेको यत्न करैत अछि मुदा ओ नहि मरैछ। बादमे हिरण्यकश्यपु अपन होलिका नामक बहिनके बजा, प्रह्लाद ओकरा कोरामे बैसाय, आबामे द’ दैत छथि। होलिका अपन प्राप्त वरदानक-विरुद्ध जरि क’ सुडडाह भ’ जाइछ मुदा प्रह्लाद जीबिते बहराइछ। फगुआके अहू परिप्रेक्ष्यमे देखल जाइछ। ब्रजक लठमार होली त’ प्रसिद्ध अछिये। ई भारतीय वर्षक वर्षान्त आ वर्षारम्भक महापर्व रूपमे सेहो मनाओल जाइछ जाहिमे रंग-भस्म (अबीर) धारण करबाक चलनसारि अदौसँ रहल अछि। वाग्देवी भगवती सरस्वतीक पृथ्वी पर प्रथमतः अवतरणक प्राकट्योत्सवमे बसंतपंचमीसँ फाल्गुनी पूर्णिमा धरि रंग-भस्म धारण (धूलि वन्दन) करबाक पौराणिक उत्सवक परम्परा सेहो फगुआक महत्वके सम्बलित करैत रहल अछि। मुदा होलिका-प्रह्लाद आ कि ब्रजक लठमारादिक परम्परासँ मिथिला-मैथिलके गर्व करबाक सुच्चा आ एकछत्र अधिकार नहि कायम होइत अछि। मिथिलावासी लए फगुआ उत्सवक मादे गर्व करबाक एकटा दोसर कथा अछि जे बेस महत्वपूर्ण अछि। 

भारतीय इतिहासमे ‘भक्ति-आन्दोलन’ कालक पहिल पाँतिक आन्दोलनी श्रीचैतन्य देव मैथिल-मिथिलाक संतान छलाह, तेँ हुनका ‘मैथिल’ कहबाक हमरा लोकनिक अधिकार कतहु-ककरो सँ बेसाहय नहि पड़त अपितु स्वतः सिद्ध अछि। एहि महामैथिलक जन्म 1486 ई-मे बंगालक नदिया जिलाक ‘नवद्वीप’ नामक गाममे फगुएक दिन भेल। ई शुद्धरूपेण हमरे लोकनिक सौभाग्य जे मिथिलेक माटि-पानिक परम्पराक मणि बंगालमे प्रकट भए सम्पूर्ण विश्वमे एकटा नव ऊर्जा भरलक। भक्त कवि रैदास, नामदेव, नानक, तुकाराम, वल्लभाचार्य लोकनिक समकालीन श्रीचैतन्य देवक पूर्वज मैथिल छलाह से अंधराठाढ़ी सँ प्राप्त अभिलेख सँ प्रमाणित भ’ चुकल अछि।1 दोसर प्रमाण जे श्रीचैतन्य देवक नामोपाधि ‘मिश्र’ छलनि। हिनक पिता पं- जगन्नाथ मिश्र, पितामह उपेन्द्र मिश्र, प्रपितामह मधुकर मिश्र आदि। ‘मिश्र’ उपाधि बंगालक आ कि बंगाली ब्राह्मणक नहि अछि जहिना चटर्जी, मुखर्जी, बनर्जी उपाधि मिथिला किंवा मैथिलक नहि। ‘मिश्र’ उपाधिधारी मैथिल ब्राह्मण लोकनिक उल्लेख तत्कालीन श्रीहट्ट (सिलहट, असम) मे सेहो अभरैत अछि। छठम शताब्दीक निधनपुर ताम्र-लेखमे सेहो ई अल्लिखित अछि।2 अंधराठाढ़ीक अभिलेख आ श्रीहट्टक अभिलेखक मिलान कयला सँ ई अवश्य प्रमाणित होइत अछि जे ई पंडित-दार्शनिक-ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण लोकनि श्रीहट्टक शासकक आमंत्रण पर बजाओल गेल छलाह। राजाक उचिती-मिनती पर ओत्तहि बसियो गेलाह। श्रीचैतन्य देवक प्रपितामह श्रीमधुकर मिश्रक उल्लेख ओत्तहि भेटैत अछि।3 मधुकर मिश्रक माझिल पुत्र उपेन्द्र मिश्र जनिक सात पुत्रमे पं- जगन्नाथ मिश्र तेसर रहथि। तहिया एमहर मिथिला आ ओमहर नवद्वीप सौंसे भारतमे विद्याक केन्द्र रूपमे प्रतिष्ठित छल। मिथिलामे पक्षधर मिश्र आ श्रीहरि मिश्र (विद्यापतिक गुरुजन) प्रसिद्ध नैयायिक रहथि त’ ओमहर नवद्वीपमे गंगादास आ नीलाम्बर मिश्र सन धुरंधर नैयायिक रहथि। मैथिल पंडित लोकनि बंगाली छात्र लोकनिके ग्रंथ ल’ जाय सँ रोकि देने रहथि। तेँ मिथिलाक संग नवद्वीपक विद्यार्जनी प्रतिस्पर्धा सुविख्यात छल। तहियाक विद्वत् समाजमे न्यायशास्त्रक अध्ययन-अध्यापन विद्वान होयबाक एकटा प्रमाण-पत्र सन छल। तेँ उपेन्द्र मिश्र अपन पुत्र जगन्नाथ मिश्र के न्यायशास्त्रक अध्ययन हेतु विद्वत्प्रवर श्रीनीलाम्बर मिश्र (चक्रवर्ती) लग नवद्वीप पठाओल, जतय ओ अध्ययनोपरांत ‘पुरन्दर’क उपाधि (न्यायशास्त्रक अध्येता हेतु सर्वश्रेष्ठ उपाधि) प्राप्त कयल। एही सँ अभिभूत भ’ श्रीनीलाम्बर मिश्र (चक्रवर्ती) अपन पुत्री ‘शची’क विवाह हिनका सँ कराओल आ हिनका लोकनिक रहबाक स्थायी व्यवस्था नवद्वीपे मे क’ देल। एही शची देवीक गर्भ सँ एहि महामैथिल श्रीचैतन्य देवक जन्म भेल।

तहिया दिल्लीक गद्दी पर सिकन्दर लोदीक आधिपत्य छल। 28 वर्षक बाद इब्राहीम लोदी प्रभुत्वमे आयल। मुदा ताहिसँ पूर्वहि मथुरा-वृन्दावनक समस्त देवमन्दिर ध्वस्त क’ देल गेल छल। तहियाक बंगाल सेहो बेस अराजक भ’ चुकल छल। कपट-षड्यंत्र-व्यभिचार-नरहत्यादि रौद्ररूप धारण कयने छल। तत्कालीन विश्वमे कएक प्रकारक घटना घटि रहल छल। 1485 ई- सँ पाश्चात्य इतिहासकार वर्तमान युगक प्रारंभ गछने छथि। 1485 ई- मे इंगलैंड मे हेनरी सप्तम सत्तारूढ़ भ’ रहल छलाह। 1487 ई- मे भारत हेतु समुद्री मार्गक अनुसंधान कयल गेल आ जहिया वास्कोडिगामा भारत अयलाह तहिया श्री चैतन्यदेव 12 वर्षक रहथि। मार्टिन लूथर ईसाइ धर्मक सुधार हेतु झंडा बुलंद क’ रहल छलाह, मुद्रण यंत्रक आविष्कार भेल छल, पृथ्वीक पश्चिमी गोलार्धक खोज भेल छल। अभिप्राय जे एहने सन विशिष्ट वैश्विक परिघटनाक कालखंडमे श्रीचैतन्य देवक आविर्भाव एहिमे नव अध्याय जोड़ैत अछि जे कि मिथिला-मैथिलक लेल पर्याप्त गर्वक विषय अछि।

आइयो मिथिलामे एकटा प्रथा सन अछि जे जँ कोनहु स्त्रीक कोखि नष्ट भ’ गेल होइक, बच्चा सोइरी आ कि शैशवावस्थामे मरि गेल हो किंवा जन्मकालिक कोनहु प्रकारक अनहोनी सँ ग्रस्त हो त’ बादक जनमल बच्चाक सेवा-वारीमे चिलकाउर बड़ सतर्क रहैत छथि, संगहि जानि-सुमानि क’ ओकरा खरपहा नाम राखि देल जाइछ ई सोचि जे खरपहा नामबलाके भगवान अल्पायुमे नहि ल’ जाइत छथिन। एहि क्रममे लोक अपने जनमल बच्चा के आनक हाथे बेची लेबाक सन ‘बिध’ सेहो करैए। ई मैथिल परम्परा सेहो छैक। चैतन्य देवक अग्रज ‘विश्वरूप’ अल्पायुएमे ‘साधु’ बनि धर-दुआरि तेजि देने रहथि। ताहि सोगे पंडित-दम्पति बड़ दुखित रहल करथि। तेँ चैतन्य देवक जन्मोपरांत हिनका लए एकटा तितहा नामक चयन भेल - ‘निमाइ’। हिनक जन्म गृह एकटा नीमक गाछक तरमे छल ताहू कारणे ‘निभाइ’ नाम पंडित-दम्पतिक धारणाक अनुकूले लगलनि। माता शची हिनक बेसी शिक्षा-दीक्षा पक्षधर नहि रहथिन मुदा पिताक स’ह पाबि आ अपन विशिष्ट प्रतिभाक बले किछुए वर्षमे ओ न्यायशास्त्रक आचार्य भ’ गेलाह। वाक्-युद्ध आ शास्त्रर्थ मे मोन लगैत छलनि। न्याय सूत्रक हिनक नव व्याख्या तत्कालीन पंडित-नैयायिक लोकनि के चकविदोर लगा दैत छल। किछु वर्ष धरि त’ ई न्याय आ व्याकरणक अध्यापनो कयल आ ताही क्रममे दिग्विजयी पंडित केशव कश्मीरीके शास्त्रर्थ मे परास्तो कयल। मुदा पिताक अकाल परलोक गमन सँ परिवारक भार हिनकहि पर आबि गेलनि। पिताक श्राद्ध करबा लए 1508 ई- मे श्रीचैतन्य देव गया (बिहार) आयल रहथि। एहि यात्रक प्रसंग ‘जानकीक नगरी’ जयबाक इच्छा सेहो प्रकट कयने रहथि। श्राद्धादिक उपरांत एतहि ओ श्रीईश्वरी पुरी नामक कृष्णोपासक संत सँ कृष्णमंत्रक दीक्षा ग्रहण कयल। श्रीचैतन्य देवक चरण-चिह्न मंदिर पटनाक महात्मा गाँधी सेतुक नीचाँमे आइयो विद्यमान अछि जे हिनक गया आगमनक कथा जोगओने अछि। श्रीचैतन्य देवक जीवनमे हिनक गया यात्रक विशेष महत्व अछि, कारण एतहि ओ दीक्षित भेलाह आ एकटा चपल निभाइ एतहि सँ गंभीर सन देखाय लगलाह। श्रीकृष्णनाम संकीर्तन ‘हरे कृष्ण---हरे राम-------’ के अपन वैश्विक दायित्वक निर्वहनमे माध्यम रूपमे सम्मिलित करबाक दृढ़ निश्चय एतहि कयलनि।

तत्कालीन बंगालमे कीर्तन करब, ढोल-मृदंग- करतालादि ल’ क’ समूह मे नाचब-गायब राजाज्ञा द्वारा त’ वर्जित छले, सनातनधर्मी साधु-संतक एकटा खास भाग सेहो एकरा धर्मविरुद्ध करारि देने छल।चैतन्य देवक एहि नाम-संकीर्तनक विरुद्ध सब गोटे मिलि काजी (बादशाह द्वारा नियुक्त) लग नालिस कयलक। काजीक सिपाही सभ आबि क’ किरतनियाँ सभक झालि छीनि लेलक, मृदंग फोडि़ देलक, मुख्य संकीर्तनकारी श्रीपाद नित्यानंद आ श्रीहरिदासक कान-कपाड़ सेहो फोडि़ देलक। संकीर्तनक बहन्ने लोक सब ईश-भजन त’ करिते छल, मुदा एकर एकटा आर महत्वपूर्ण पक्ष ई छल जे लोक सब एहि नाम पर एकठाम जुटि अपन सुख-दुख सेहो बतियाइत छल, अभाव आ सहयोगक बात - व्यवस्था होइत छल, शास्त्र-विद्यादिक आदान-प्रदान होइत छल, समाजक दशा-दिशा पर चिंता आ चिन्तन होइत छल। नाम संकीर्तनक विरुद्ध काजीक आदेश अयलासँ एहि समस्त व्यवस्था आ लोकतांत्रिक विशिष्टता पर आसन्न संकटक संभावना के अकानि श्रीचैतन्य देव शीध्रहि नदिया नगरक समस्त जनताके एकस्वरसँ आह्वान कयल जे ओ लोकनि अपन-अपन खोल (चाँदखोल-बंगालक संकीर्तन आ संगीतक एकटा विशिष्ट तालवाद्य)-करताल प्रभृत वाद्ययंत्रक संग संकीर्तन-मण्डली बना क’ नवद्वीपमे एकत्र होअय। तहियाक नदिया नगरक जनसंख्या अझुका कलकत्ता सँ कम नहि रहल होयत।4 संकीर्तन सम्राट श्रीनिमाइ पंडित (श्रीचैतन्य देवक अध्यापकीय नाम)क संकीर्तन वाहिनी चलल चाँदकाजीक सशस्त्र सेनाक संग निःशस्त्र लड़य लेल। राजसत्ताक विरुद्ध श्रीचैतन्य देवक ई पहिल संघर्ष छल। एखन हिनक ‘बहिक्रम’ मात्र 19-20 वर्षक छल। जनसमूहक महासागर देखि चाँदकाजी हारि मानलक आ ओतहि गछलक जे ओ स्वयं आ ओकर वंशज सेहो एहि नाम-संकीर्तनक कहियो विरोध नहि करत। आइयो नवद्वीपक चाँदकाजीक वंशज हिन्दूक ‘नाम-संकीर्तन’मे तन-मन-धन सँ सहयोग करैत अछि। हिन्दू - वैष्णवजन आइयो नवद्वीप स्थित चाँदकाजीक समाधिक सेवा-सुरक्षामे लागल भेटैत छथि। एहने सन मारिते रास विशिष्ट सामाजिक शैक्षिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-दार्शनिक अवदानक कारणे श्रीचैतन्य देव भक्ति कालक अग्रणी महापुरुष भ’ सकल छथि। नाम-संकीर्तनके अपन आन्दोलनक माध्यम बना एकरा विराट फलक पर उपलब्ध करयबाक कारणे हिनका ‘संकीर्तनैक पितरौ’ सेहो कहल जाइत छनि।

24 वर्षक उमेरमे (1510 ई- मे) श्रीचैतन्यदेव एकटा केशव भारती नामक निष्किंचन साधु सँ सन्यास-दीक्षा ग्रहण क’ परिव्रजनमे निकलि गेलाह जाहि क्रममे उड़ीसाक महाराज श्रीप्रतापरुद्र, नैयायिक वासुदेव सार्वभौम भट्टाचार्य लोकनिके अपन सान्निध्य देल। दक्षिणक यात्रमे श्रीराय रामानन्द आ श्री वेंकट भट्ट सन दार्शनिक विद्वान संग भेँट-वार्ता भेलनि जाहि प्रसंगक श्रीचैतन्य देवक दर्शन ‘अचिन्त्यभेदाभेदवाद’क संदर्भमे बेस महत्व अछि जाहिमे जीव-जगत-ब्रह्म-ईश्वर-साध्य-साधन-पुरुषार्थादि विषय पर विशद आ गंभीर चर्चा भेल अछि।5  1514 ई- मे श्रीचैतन्य देव श्रीवृन्दावन धामक पहिल खेप यात्र कयल जाहि क्रममे श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीजीवगोस्वामी सन दार्शनिक-वैष्णव विद्वानक व्यक्तित्व-निर्माण कयल जे कि अपन-अपन योग्यता-क्षमतानुसार एहि दर्शन आ साहित्य के भक्तिरसामृतसिन्धु, उज्जवलनीलमणि, वृहद्भगवतामृत, षट्संदर्भ सन गंभीर ग्रंथरत्न देल जकरा प्रति समस्त भारतीय वाघ्मय ऋणी रहत, कारण हिनके लोकनिक प्रसादात ‘भक्ति’के दशम रसक रूपमे स्थापना आ व्याप्ति भेटलैक। एकर एकमात्र सूत्रधार छलाह श्रीचैतन्य देव।

अपन पहिलुके वृन्दावन-यात्रक क्रममे लुप्त-ध्वस्त मथुरा-वृन्दावनक जीर्णोद्धार हेतु श्रीचैतन्य देव एकटा विराट अभियान चलाओल आ एहि लेल अपन प्रिय परिकर श्रीलोकनाथ गोस्वामी आ श्रीभूगर्भ गोस्वामीके वृन्दावन पठाओल। तदुपरांत श्रीरूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी, गोपाल भट्ट, रघुनाथदास, रघुनाथ भट्ट (छय गोस्वामी सँ प्रसिद्ध) लोकनि एकाएकी वृन्दावन आबि श्रीचैतन्य देवक एहि महाभियानके गति द’ क’ वृन्दावन के भक्ति-आन्दोलनक महान केन्द्रक रूपमे स्थापित कयल आ व्रज-वृन्दावनक नव-उज्जीवन कयल। हिनका लोकनिक अतिरिक्त श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी, प्रबोधानन्द सरस्वती आ नारायण भट्ट लोकनि सेहो भक्ति ग्रंथक रचनामे महत्वपूर्ण योगदान कयल। भक्ति-साहित्यक जतबा रचना एहि कालमे भेल ततबा पहिले कहियो नहि गेल छल।6

वृन्दावनमे देवालय सभक निर्माण सेहो सर्वप्रथम श्रीचैतन्य देव आ हुनक परिकर द्वारा भेल अछि।7 गोवर्धन स्थित राधाकुण्ड आ श्यामकुण्डक खोज सेहो हिनकहि द्वारा भेल। वृन्दावनक प्रसिद्ध सप्तदेवालयक भगवान चैतन्ये सम्प्रदायक आचार्य लोकनि द्वारा स्थापित अछि। दक्षिण यात्रक क्रममे ‘ब्रह्म संहिता’ (5म अध्याय) आ विल्वमंगल रचित ‘कृष्णकर्णामृत’क प्रति संग आनब आ एकरा बहुमुल्य सम्पत्ति बूझि सदति अपना संग रखबाक अध्येता आ ग्रंथस्नेही प्रवृत्ति सेहो हिनक मैथिलत्वके पुष्ट करैए। अभिप्राय ई जे आजुक वृन्दावन सेहो एहिये महामना मैथिलसंतान श्रीचैतन्य देवक महावदानक प्रतिफल अछि।

अपन 6-7 वर्षक परिव्रजन मे श्रीचैतन्य देव यत्र-तत्र भक्ति बीजक वपन-अंकुरण-सिंचनादिक कार्य कयल आ 1516 ई- मे पुरी चलि गेलाह। अपन शेष जीवन श्रीजगन्नाथजीक शरणमे श्रीकृष्णप्रेम सँ भावित भ’ क’ बिताओल आ 1534 ई- मे 48 वर्षक अवस्थामे श्रीजगन्नाथ जीमे लीन भ’ गेलाह। उडि़या कवि आ श्रीचैतन्य देवक समकालीन श्रीअच्युतानन्द अपन ‘शून्य संहिता’ नामक ग्रंथमे श्रीचैतन्य देवक अंतर्धान होयबाक घटनाके विस्तारसँ लिखने छथि। लीन होयबाक एहि घटनाक समर्थन परवर्तीकालक साहित्य यथा-चैतन्य भागवत (ईश्वर दास) चैतन्य मंगल (लोचन दास) प्रभृति प्रामाणिक ग्रंथ सेहो कयने अछि। विद्यापतिक पद-रचनाक श्रवण-मनन-आत्मविभोरक घटना हिनक स्वभूमि प्रेम दिस त’ संकेत करिते अछि, श्रीविष्णु पुरीजी (तरौनीक उद्भट विद्वान आ साधु) संगक हिनक पत्रचार सेहो एकरा पुष्टे करैए जाहिमे एकटा माला पठयबाक श्रीचैतन्य देवक निवेदन सुविख्यात अछि। पत्र आ निवेदनक उत्तरमे श्रीपुरी महाशय 13 विचरण (अध्याय)मे नवधा भक्तिक व्याख्या करैत ‘भक्तिरत्नावली’ नामक ग्रंथ पठा देल। श्रीचैतन्य देव अलौकिक आनंदक संग एकरा शिरोधार्य करैत श्रीपुरी महाशय के स्वजन घोषित कय अपन निवेदनक निजगुज अर्थ लगा तकर एहि विशिष्ट प्रकारक पूर्ति हेतु आभारो प्रकट कयने छलखिन।8 चैतन्य साहित्यक परवर्ती रचनाकार लोकनि अधिकांश प्रामाणिक ग्रंथ रचना ‘ब्रजबुली’मे कयने छथि जकर भाषा वैज्ञानिक प्रकृति आ सामीप्य मैथिली संग बेसीए अछि। श्रीचैतन्य देवक विवाह विष्णुप्रियाजी सँ भेल छलनि। ई राज पंडित श्रीसनातन मिश्रक सुपुत्री छलीह, मैथिल मूलक छलीह। स्वजातिक-स्वकोटिक मैथिल ब्राह्मण संग ई वैवाहिक सम्बन्ध सेहो हिनका लोकनिक ‘मैथिले मूल’ के दृढ़ करैए।

मैथिली साहित्यमे एहि महामना मैथिलके बड़ अनठाओल गेलैक। मैथिलीमे एकटा नाटक ‘श्रीचैतन्य महाप्रभु’ (प्रो- योगानन्द चौधरी) आ एकटा महाकाव्य श्रीचैतन्य चन्द्रायण (श्रीरामचन्द्र मिश्र ‘मधुकर) उपलब्ध अछि। चैतन्य चन्द्रायणक प्रामाणिक रचनात्मकता असंदिग्ध अछि कारण एहिमे मारिते रास ऐतिहासिक तथ्यक समावेश भेल अछि। 1971-72 ई- मे भेल विदेश्वर यज्ञक क्रममे एकर रचना भेल आ पं- श्रीरामनन्दन मिश्र (जगतपुर, मधुबनी)क सत्प्रयास सँ आ बड़ी महारानी, दरभंगा राजक आर्थिक सहयोगसँ जीव सेवा संघ (बेनीपट्टी, मधुबनी) एकर प्रकाशन सेहो कयलक। विदेश्वरक ई यज्ञ मिथिलामे श्रीचैतन्यमताश्रित कृष्णभक्ति आ भक्तक प्रचार-प्रसारक सुपरिणाम छल। चारूकात शैव-शाक्तक बौद्धिक समाज आ ताहि बीचमे ई वैष्णव आयोजन जकरा कि दरभंगा राजक सोझा-सोझी समर्थन प्राप्त छलैक, 1971-72 ई- मे ई एकटा पैघ घटना सन छल। एहिमे श्रीमद्भागवत कथा, रासलीला, आध्यात्मिक प्रवचन, संत-सम्मेलन, नाम-संकीर्तनादिक गदेल मुदा सैंतल व्यवस्था छलैक। कएक टा विशिष्ट घटना सेहो एहि कालखंडमे घटल जाहिमे एकटा घटनाक त’ ऐतिहासिक महत्वक छल जे बड़ी महारानी (राज दरभंगा) 1969 ई- मे श्रीरासबिहारी दास गोस्वामीजी (बेनीपट्टी) सन वैष्णव आ परमवीतरागी संतसँ श्रीचैतन्यमताश्रित कृष्णोपासनाक मार्गमे दीक्षिता भेलीह। एहि महावसरक उपलक्ष्यमे बड़ी महारानी अष्टयाम नाम संकीर्तनक आलावे आवालब्रह्मचारिणी वैष्णव दासीजी (बहिनजी, बेनीपट्टी) सन वैष्णवी-विदूषी कथावाचिका सँ श्रीमद्भागवतक कथा सेहो सुनने रहथि। एही आध्यात्मिक परिवेशमे श्रीचैतन्य चन्द्रायणक रचना भेल छल। खाँटी मैथिली भाषामे रचल लीला-गाथा (महाकाव्य)क काव्य-सौन्दर्य आ प्रामाणिकता श्रीचैतन्य देवक मैथिलत्वक परिप्रेक्ष्यमे कएक अर्थमे महत्वपूर्ण आ प्रशंसनीय अछि। चैतन्य देवक स्वजन होयबा सन गर्व-बोध सँ अभिभूत श्रीमधुकरजी सम्पूर्ण मैथिल-मनोयोग सँ एहि महाकाव्यके रचने छथि। श्रीचैतन्य देवक

सोहर:-

श्रीशची मैया अंगना, बालक गौर बदना, 
जनम लेल रे, हरि जनमल रे। 

बधावा गीत:- 

माँगै लय अएलहुँ बघावा हे ! मिथिला के पमरिया । 
युग-युग जिबओ निमाइ हे ! मोर लागौ उमरिया ।। 
नहि लेबै हम हाथी ओ घोड़ा, 
राखू फराके असर्फीक तोड़ा, 
हमहूँ पमरिया छी बाबाके गामक, 
माँगय ने अएलहुँ भिखरिया हे, मिथिलाके पमरिया ।। 

तहिना छठिहारक गीत, चैतावर, चुमाओन, लोरी, मुड़नक गीत, उपनयनक गीत प्रभृत वैशिष्टय एहि ग्रंथक उत्तम साहित्यिक पक्षमे सँ अछि। तथापि मैथिलीक इतिहासकार-समालोचक लोकनि द्वारा एहि ग्रंथक महत्वके अनठायब सेहो मैथिल-स्वभावक अनुकूले बूझैत छी। मैथिलीक महाकाव्य पर पी-एच-डी- उपाधि ल’ पटना विश्वविद्यालय मे प्रोफेसरी कयनिहार महामहिमके सेहो ई महाकाव्य नहि अभरलनि जखन कि एकर रचना-क्रमक ऐतिहासिकता एतेक सक्कत आ बुलंद रहल अछि।

श्रीचैतन्य देवक एहने-एहने विशिष्ट अवदानक कारणे हिनक जन्म-तिथि फगुआ (फागुनक पूर्णिमा) मैथिल-मिथिलाक लेल एकटा गर्व-पर्व अछि। सम्पूर्ण विश्वमे हिनक जयंती महोत्सव मनाओल जाइछ। ताहि अर्थमे मिथिले कने पछुआयल सन लगैए। यद्यापि कतहु-कतहु ई महोत्सव मनाओलो जाइछ, विशेष क’ चैतन्य-सम्प्रदायी कृष्णोपासक लोकनिक बीच, मुदा एहिठाम हिनक आध्यात्मिक-दार्शनिक अवदानक मोजर बेसी अछि। हिनक मिथिला अयबाक सेहन्ता त’ प्रत्यक्षतः पूर्ण नहि भ’ सकल रहनि मुदा हिनका द्वारा प्रवर्तित दर्शन-उपासना-वैष्णवतादिक प्रचार-प्रसार मिथिलेक किछु वीतरागी संत लोकनि खूबे कयलनि अछि। मिथिलाके पहिल-पहिल श्रीचैतन्य देवक नाम-संकीर्तन- ‘हरेकृष्ण---- हरे राम---’ सँ परिचय करौनिहार एकटा बंगाली विद्वान-वैष्णव-दार्शनिक संत श्रीपरमानंद दास गोस्वामी (बंगाली बाबा) अपन संन्यासोपरांत जीवनक लगभग 60 वर्ष चैतन्य देवक ओही मिथिला-गमनक अपूर्ण सेहन्ताक यथासंभव पूर्तिक पाछाँ लगा आजीवन मिथिलामे घूमि-घूमि नाम-संकीर्तनक प्रचार-प्रसार कयल। फलस्वरूप मिथिलो मे आब श्रीचैतन्य देवक भावधारानुकूल आयोजनक संख्यामे वृद्धि भेल अछि तथापि हुनका मिथिला-मैथिल सँ जोडि़ तदजन्य भावसँ गौरवान्वित भ’ एहि आयोजन सबके मनायब शेषे अछि जाहिसँ काल्हि समस्त विश्वके चिकरि क’ कहि सकी जे ई महामानव-महामैथिल श्रीचैतन्य देव हमरहु छलाह, हमरहि छलाह।

संदर्भ-

1- श्रीचैतन्य चन्द्रायण - श्रीरामचन्द्र मिश्र ‘मधुकर’
2- मिथिलाक सांस्कृतिक इतिहास - प्रो- राधाकृष्ण चौधरी
3- श्रीचैतन्य देव - श्रीसुन्दरानन्द विद्याविनोद
4- श्रीचैतन्य मत - डॉ- अवधबिहारी लाल कपूर
5- श्रीचैतन्य चरितामृत (मध्य लीला)-श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी
6- ब्रजके रासिकाचार्य - डॉ- अवधबिहारी लाल कपूर
7- Mathura : A District Memoir (3rd edition)
8- श्रीचैतन्य चरितामृत (अंतलीला) - श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी

डॉ. कमल मोहन चुन्नू