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अग्निपुष्पक किछु कविता

मैथिली कविता मे कतेको 'वाद' सब अबैत-जाइत रहल । यथा - सहजतावाद, अभियंजनावाद, अकवितावाद, नवकवितावाद, आ अग्निकवितावाद, आदि-आदि । समयक कोनो कालखण्ड मे कविताक मूल प्रवृति तत्कालीन समाजक व्यवस्था, कविताक स्वरूप आ यथास्थितिक प्रति विद्रोह होइत रहल अछि । 'अग्निपुष्प' अग्निजीवी पीढ़ीक महत्वपूर्ण नाम छथि । समाजक परिपेक्ष्य मे कोनो विचार कोनो कालखण्डक लेल प्रासंगिक भ' सकैत अछि मुदा कालांतर मे ओही विचार केँ एकटा रूढ़िवादी परम्परा मे परिवर्तित भ' जयबाक कतेको उदाहरण हमरा-अहाँक सोझाँ पसरल अछि । 'अग्निपुष्प'क कविता एहने ठाम आबि क' प्रासंगिक होइत अछि । ई परिवर्तनकामी होइत छथि । दियादक घर मे 'भगतसिंह' जनमबाक कबुला करय बला एहि समय मे 'अग्निपुष्प' परिवर्तन अपना घरहि सँ शुरू करैत छथि (ध्यानार्थ हिनकर 'पिता' कविता) । एकठाम अपने कहैत छथि जे आइ-काल्हि परिवर्तनकामी केँ 'उग्रवादी' कहि समाप्त क' देल जाइत अछि । ई तहियो सत्य छल जहिया लिखल गेल छल आ आइयो सत्य अछि । शासनक लेल सब दिन सँ 'परिवर्तनकामी' लोक अवांछित तत्व रहल अछि; रहबो करत; से…

कुछ हिन्दी कविताएँ

1. अलविदा

मुझे ये दुःख है कि
मैं वैसा नहीं हो सका था 
जैसा तुम चाहते थे,

तुम्हें भी होता होगा
मेरे वैसा न होने का दुःख
जैसा मैं तुम्हारी चाह में था,

और फिर 
सबकी बेहतरी के लिए
अपनी-अपनी चाह के साथ
हम दोनों 
समय के बीच से निकलकर
समय के साथ हो लिए,

फिर एक दिन तुमने कहा-
"समय के साथ सब कुछ खत्म हो गया ।"
मैंने पूछा-
"मैं भी ?"
तुम चुप हो गई थी और मैं हँस रहा था 

और उस दिन के बाद से 
मैं चुप हूँ पर तुम हँस नहीं पाती हो !

ऐसा क्यूँ ?


2. तुम

मैं पाना चाहता हूँ तुमको
तुम्हें पूर्णतया खोने के बाद भी,
जबकि जनता हूँ मैं कि 
तुम मेरे पाने या खोने की
सीमा-रेखा से बाहर हो अब,

मैं झूलना चाहता हूँ द्वन्द के झूले में
वैसे जैसे झूलते थे तुम्हारे झुमके
बस एक मेरे छू देने भर से,

और फिर मेरे देखते-देखते ही तुम
सिमटने लगती हो अचानक मुझमें,
सिमटकर बिन्दु जैसे गोल-मोल हो जाती हो
बिल्कुल अपनी माथे के काली बिन्दिया जैसी,

और मैं सोचता ही रहता हूँ कि
कहाँ से सीखा होगा तुमने ये जादू-टोना
कि जिसमें घिरा हुआ मैं
सहता ही रहता हूँ नित नए-नए प्रयोग 
तुम्हारे आँखों के प्रयोगशाला में।


3. बचाव

कई बार सब कुछ टूटकर भी
जो बचता है
वो सिर्फ उतना …

कुलानन्द मिश्रक तीनटा कविता

कुलानन्द मिश्रक कविताक बाट चलब जीवनक सोझ साक्षात्कार थिक। हिनक कविता मे जीवन अपन सम्पूर्ण जटिलता आ ओझरा, सरलता-सरसता-ममता आ राग-विराग ओ संगति-विसंगतिक संग अभिव्यक्त भेल अछि। मिथिलाक प्रति कविक संपृक्ति रोमांटिक वा तात्कालिक नहि, आत्मीय ओ सहज अछि। आ एहि अर्थमे कुलानन्द मिश्र अपन माटिक एकान्त कवि छथि-अपन कथ्य, भंगिमा ओ भाषा-सम्वेदनाक संग। यात्री ओ राजकमल चौधरीक बाद मैथिली कविताक एकटा इमानदार नाम। ई तीनू कविता हुनकर तीनू कविता संग्रह 'ताबत एतबे', 'आब आगाँ सुनू' आ 'ओना कहबाक लेल बहुत किछु छल हमरा लग' सँ लेल गेल अछि। कुला बाबू आ सुकान्त सोमक एकटा सहयोगी संग्रह 'भोरक प्रतीक्षा मे' सेहो आयल रहनि।

'स्मृतिक छाहरि मे गामक धाह' कविता 'ताबत एतबे' आ 'उत्तरक प्रतीक्षामे' कविता 'आब आगाँ सुनू' संग्रह मे संग्रहित अछि। 'ओना कहबाक लेल बहुत किछु छल हमरा लग' कविता बीस टुकड़ी( वा खण्ड) मे  लिखल गेल कविता अछि जकर पहिल पाँच टुकड़ी सितम्बर 1972 आ शेष बीस टुकड़ी अगस्त 1980 मे लिखल गेल छल, जे कालांतर मे एहिए नाम सँ संग्रहक रूप मे संग्रहित भेल…