Monday, 18 March 2019

बनैत-बिगड़ैत देश आ सुकान्त सोमक कविता- डॉ. तारानंद वियोगी

श्री सुकान्त सोम
सुकान्त सोम मैथिलीक एक विरल कवि छथि, आ हुनका कविता पर बात करब मैथिली काव्येतिहासक एक दुर्लभ अध्याय पर बात करब थिक। मुदा, एहि मे समस्या छैक जे अपन कवि-निर्मिति पर, अपना सोचक काव्य-परिदृश्य पर आ कि अपन कविता-प्रतिमान पर हुनकर अलग सं कोनो लेखन नहियेक बराबर हमरा लोकनि लग उपलब्ध अछि। दोसर, सुकान्त सन विद्रोही साधक-कवि पर जाहि व्यापकताक संग समीक्षा-विचार हेबाक चाही, से नहि भ' सकल अछि। तेसर, मुख्यधाराक हिन्दी पत्रकारिता मे पछिला तमाम बरस ओ ततेक मुखर-प्रखर रहला जे हुनकर यशस्वी पत्रकारक छवि तर मे हुनकर ई दुर्लभ कवि पिचाएल आ नुकाएल रहि गेल अछि।

सुकान्त कें पढ़बा काल हुनकर पहिल जाहि विशेषता पर सब सं पहिने ध्यान जाइत अछि, से ई जे अपन कविता सब मे ओ बेर बेर कविता कें परिभाषित करैत चलैत छथि। 'कविता लेल एकटा कविता' आदिक तं शीर्षके स्वयं सैह अछि, बांकी बहुतो ठाम अवसर एला पर अथवा अवसर ताकि क' ओ ई काज करैत छथि। अपन कविताक बारे मे हुनकर ख्याल छनि जे ई 'मनुक्खक कविता' थिक जे 'एकटा सार्थक आ सामरिक चुप्पीक संग शुरू होइत अछि।' अपन कवि-कर्मक चिन्हासय दैत कहैत छथि जे हम 'अहांक राष्ट्रीय उद्यानक हरियर जंगल मे रत रत करैत कुरहरि भांजि रहल छी।' एक ठाम कहैत छथि-- 'पातविहीन छाल नोंचल गाछक चीत्कार थिक हमर कविता।' एक आर ठाम कहैत छथि, 'सुखैल हड्डीक झनझनाहटि थिक हमर कविता।' एक ठाम तं ओ इहो कहैत छथि जे 'हमर कलमक नीब पर नचैत अक्षर अहांक शान्ति-व्यवस्था लेल घातक अछि।'

मिथिला मे सदा सं कविता कें कामिनी मानबाक चलन रहलैक अछि, पंडितो लोकनि कें जखन एकरा हीन साबित करबाक होइन तं 'रजनी-सजनी' कहथि। मुदा, सुकान्त कहैत छथि, 'हमर कविता प्रेयसीक अंगक भूगोल नहि, ओकर सुखाइत-टटाइत आतंकक इतिहास थिक।' हमरा तं कौखन लगैत अछि जे मैथिल कवि लोकनिक काव्यांग प्रक्रियाक एहि सं सुंदर विवेचना साइते कतहु आन ठाम भेटत जेना सुकान्त अपन एक कविता मे केने छथि--'फूलपात काढ़ल कापी मे लिखल कविता/ उदासी मे गाओल गेल गीत आ/ हर आ हरबाहक मादे लिखल गेल आख्यान/ कोन दिशाक ज्ञान करबैत कोन युगक संकेत करबैत गुजरि जाइछ।'

।। दू ।।

कखनो कखनो सोचै छी, सुकान्तक कविता मे ई सब एना एना किए अछि? कतहु बिंब पर बिंब चढ़ि जाइ छै। कतहु कमलाक बिंब गरम खून कें ठंडा करक प्रतीक के रूप मे आबै छै, कतहु घोर विक्षुब्ध बला व्यंग्य मे अपन पीड़ा ब्यान करैत कविता-वाचक ठेठ अभिधा मे चीत्कार करय लगैत अछि। कतहु निस्तब्धता तेहन भयाओन भ' क' आबै छै जे नबगछुलीक ठाढ़ि सभक कनफुसकी साफ-साफ सुनाइ पडै छैक। मुदा, 'जलकुंभीक लेल अपस्यांत एकटा आतंकित वनमुर्गी' एक तरह सं बुझू तं हुनकर स्थायी टेक छियनि। ई वनमुर्गी आठम दशकक आम भारतीय आदमी थिक, जकरा लेल सुकान्त लगातार जिबैत, सोचैत आ कविता लिखैत रहला अछि। कहै छथिन, 'अन्हारक खिलाफ आदिम संघर्षक सैनिक' थिक ई, मुदा आइ गर्दिश मे अछि।दोसर दिस, शासन के वहशीपन के जते चित्र सुकान्तक कविता सब मे ठाढ़ भेल अछि, से फेर हुनका समयक कोनो आन कवि लग दुर्लभ अछि।

आदमी सं आदमीक सम्बन्धक अनेक वृत्तान्त पर सुकान्तक ध्यान गेलनि अछि। माय अछि तं तेहन जे अपन कोटि कोटि जनमक वात्सल्य अपन एक संतान पर निछाबर क' सकैत अछि। पिता तेहन पिता जे अन्यायक विरुद्ध लड़बे अपन विरासतक रूप मे छोड़ैत अछि। ओहि ठाम जे व्यक्ति-रूप जनता अछि,ओकर एक कर्तव्य मातृभूमियोक प्रति अछि। ई ओकरे देश थिक। ओम्हर ओ देश अछि तखनहि एम्हर ई गाम अछि। ध्यान देबाक थिक जे सुकान्तक ओइ ठाम देश अमूर्त भाववाची नहि। ओ जखन कखनहु आएल अछि तं अपन पूरा भौगोलिक राजनीतिक संदर्भ संग आएल अछि। ओकरा हम चीन्हि सकैत छिऐक जे भारत थिक। ओकरा पाछू महान स्वतंत्रता संग्रामक आदर्श छैक। तें, जखन हम सब सुकान्तक कविता मे हुनकर आदमीक खोज करी तं ओतय क्यो एक व्यक्ति नहि देखाब देत। ओ सामूहिक मनक दहाइ, सैकड़ा, हजार सनक जीव थिक। सुकान्त ओकर बात लिखैत कहै छथिन जे हमही कारखाना सं इस्पात बहार करै छी, शहरक प्रत्येक घर ठाढ़ केने छी, हमरे पसेना खेत मे खसैत छैक तं फसिल लहलहाइत अछि आ हिमालयक बर्फ पर खसय तं देशक लक्ष्मण-रेखा बनैत छैक, आदि आदि।

मोन रखबाक चाही जे आजादी बादक हवा मे एक नेनपन सं सांस ल क जबान भेनिहार आरंभिक पीढ़ीक एक कवि सुकान्त छथि। सत्तरि के दशक अबैत अबैत स्वतंत्रता-संग्रामक ओ आदर्श टूटि चुकल रहैक। आब तं हालत ई छल जे लोकतंत्रे मानू समाप्त छल। तानाशाही फासिज्म पूरा तरह सं देश कें गछाड़ि लेने रहै। पहिने अघोषित इमरजेन्सी छल बाद मे औपचारिको इमरजेन्सी लागू भेलै। मुदा आजादीक ओ आदर्श जकरा जीवन मे शामिल रहै, ओ आगि हृदय मे जरैत रहै, ओ विरोधक बिगुल फूकि देलक। ओतय हिंसा-अहिंसाक सवाल मिथ्या छल। ई युद्ध सुकान्तक कविता मे हम सब जारी देखैत छी।

सुकान्तक कविता-समय पर कने ध्यान देल जाय। ओ समय छल जखन विश्व भरि मे छात्र आन्दोलन भ' क' अपन परचम लहरा चुकल छल, जकर धमक हरेक ठाम, भारतो मे सुनल जा सकै छल। एही आन्दोलनक परिणाम-स्वरूप फ्रांस मे महाबली दिगालक पतन भेल छल। चे ग्वारा, कास्त्रो, सार्त्र-सन नामेक नहि, तारिक अली, कोहन बेंदित आ हर्बर्ट मार्कूसक नामक धूम छल। भारतीय युवा लोकनिक वामपंथी रुझान अपन चरम पर छल। ई दौर कैरियरिज्म के नहि, आदर्श सभक तलाश आ ओकरा लेल जीवन अर्पित करबाक समय रहैक। सेंट स्टीफन सं ल' क' सेन्ट जोन्स धरिक लड़का-लड़की नक्सलबाड़ी मे, श्रीकाकुलम के जंगल मे पाओल जा सकै छल। एहि युवा सभक हृदय मे अपन सपना छल जे अपना सं बाहर अपन देश धरि, दुनियां धरि जाइत छल। ई पीढ़ी परिवर्तन चाहैत रहय, आ ताहि लेल लड़ि रहल छल। ई पीढ़ी अपना कें सौभाग्यशाली बुझय कि ओकरा अपन किछु सपना छैक आ लड़ैत जं ओ मारल जाय, तं ओकरा समझ मे एहि सं बेसी सार्थकता ओकरा जीवनक आर किछु नहि भ' सकैत अछि। आजादी कें तखन मात्र पचीस बरस भेल रहै। आजादीक पचीसम बरस सं पैंतीसम बरस धरि के कालक धुकधुकी सुकान्तक कविता मे एलनि अछि।

ओ समय जाहि ठाम, जाहि युगान्तरक घुमान-बिंदु पर छल, जं लंपट नेतातंत्रक नृशंस विजय नहि भेल रहैत तं आइ क्यो कल्पना नहि क' सकैत अछि जे ई देश कतय रहितय। सुकान्तक कविता एही परिस्थिति सभक उपजा थिक। हुनकर कविताक अस्सल महत्व तखन उद्घाटित हैत जं ओहि समय मे हिन्दी आ बांग्ला सहित आन-आन भाषा-साहित्य मे लिखल कविताक संग ओकरा पढ़ल जाय। कहब जरूरी नहि जे एहि महासंग्राम मे मिथिलोक हिस्सेदारी कोनो कम नहि छल। कते प्रतिष्ठित घरक बेटा अपन शहादत देलक, कते युवा अपन महत्वाकांक्षी पढ़ाइ बिच्चहि मे स्थगित करैत श्रीकाकुलम पहुंचला। बंगाल एकर धधकैत प्रयोगशाला छल आ सुकान्त तहिया बंगालक महानगर कलकत्ता मे रहैत छला।

सुकान्तक कविता मे जलकुंभी लेल अपस्यांत आतंकित वनमुर्गीक रूपक सर्वांगता मे आएल अछि। ई आम लोकक दशा बतबैत अछि। कलकत्ताक सड़क पर तहिया सिद्धार्थशंकर रायक मस्तान के एकच्छत्र राज छल। कोनो कानून नहि, कोनो तर्क नहि, विरोध मे उठाओल गेल एको आबाज स्वीकार नहि। मुख्यमंत्रीक आ कि पार्टीक निजी गुंडा सय-दू सय लोकोक समूह कें बीच सड़क पर मारि क' राताराती लाश गायब क' सकै छल। आइ जखन इतिहास अपना कें दोहरा रहल अछि तं हम सब अटकर लगा सकै छी जे केहन ओ समय रहल हेतै। सुकान्तक कविता मे अबैत अछि जे 'कमला, अहां विस्मृतिक गह्वर मे चलि जाउ/ कमला अहां एना नहि मोन पड़ू।' कमला हुनक नेनपनक नदी छियनि जकरा संग जीवनक अनेको सुखद प्रसंग जुड़ल छै। ओ अपन प्रेयसीक प्रेम-स्मृति कें अप्रासंगिक बुझैत छथि--'हे सुनयना,बर्फ गलाब' बला सूर्य कत' छै/ कत' छै ओ आगि जे हमर/ हृदय मे भरल बारूद कें लहका सकय?' अपना बारे मे खबर उऐह छै जे 'एहि दारुण शीत मे हम/ एकटा अघोषित युद्ध लड़ि रहल छी।' आ संकल्प यैह जगैत छैक जे 'ठामठीम पसरल ओझरायल रेखा सब कें समेटि/ देशक नक्शाक बीचोबीच एक्केटा मोट रेखा खीच दी, आ/ पच्चीस बर्षक अभ्यन्तर लिखल गेल अपन समस्त/ कविता कें कविताक रक्षा मे/ अस्वीकार क' दी।'

सुकान्त एहि ठाम मात्र अपन कविताक बात क' रहल छथि। लेकिन हम सब समझि सकै छी जे ओ कुल्लम मृदुल कविता कामिनी विलास के पतन के बात क' रहल छथि। ओ समूचा मैथिली काव्य-परंपराक निरर्थकताक बात करैत छथि जतय बड़का बड़का महाकाव्य मे बाझल कवि लोकनिक पतक्का फहराइत रहैत अछि आ ओम्हर 'गामक पोखरि मे महीस सब पहिनहि जकां जलक्रीड़ा करैत रहैत छैक'। हम सब बूझि सकै छी अपन कविता सब मे कविता कें बेर बेर परिभाषित केनाइ हुनका किए जरूरी लागलनि अछि। ओ पौरुषक स्वर चाहैत छथि जाहि सं दुर्गत देश-समाज फेर सं उठि क' ठाढ़ भ' सकय। अपना कवि कें ओ 'अन्हारक खिलाफ आदिम संघर्षक सैनिक' बतबैत छथि। कहबाक चाही जे सुकान्तक कविता साहित्य आ राजनीतिक, जनवादीक राजनीतिक आत्यन्तिक मिलन विन्दु थिक। आजादीक बाद नेता लोकनि कोन तरहे देशक विकास केलनि अछि तकर कुल्लम हिसाब-किताब सुकान्तक कविता मे भेटि जाएत। देशक स्पष्ट उत्पाद थिक आतंकवादी सत्ता राजनीति। मुदा, सुकान्त लग प्रतिरोध हुनक स्थायिभाव छियनि। हमर ई सोनाकटोरा देश आ ताहि पर एकटा आतंकवादी गैंग कब्जा क' लेत, आ जकर ई देश छियै तकरा संग एहन व्यवहार करत, एकरा कोना बर्दास्त कयल जा सकै छै, जीताजी तं एकर पुरजोर प्रतिरोध हेतै-- सुकान्तक कविता-वाचक एहने सोच राखनिहार एक बौद्धिक युवा थिक, जकर भूमि मिथिला छियै मुदा मिथिला भारत मे अछि आ भारतक दुख सं अपना कें एकात करब ओकरा लेल कोनहुना संभव नहि छैक।

।। तीन ।।

1984 मे सुकान्तक पहिल कविता-संग्रह एलनि 'निज संवाददाता द्वारा'। एहि मे हुनकर 31 गोट कविता संकलित छलनि। 1986 मे कुलानंद मिश्रक 7 गोट कविताक संग सुकान्तक 9 गोट कविताक संयुक्त संग्रह 'भोरक प्रतीक्षा मे' शीर्षक सं आएल। संग्रहक भूमिका मे मोहन भारद्वाज लिखलनि--'सुकान्तक कविता विरोध मे ओहि सब बिंदु पर ठाढ़ भेटैत अछि जतय सं शोषण आ मनुक्ख पर लादल यंत्रणाक यात्रा शुरू होइत छैक। अन्तर्विरोधी स्थितिक द्वन्द्व मे जिबैत लोकक व्यथा सुकान्तक कविता मे अपन प्रखरतम रूप मे आएल अछि। ई व्यथा एकटा व्यक्ति, एकटा गाम आ एकटा समाज-- सबहक अछि। ओ व्यक्ति, गाम आ समाज देशो मे अछि आ विदेशो मे। ओकर सीमा भूगोल मे नहि, शाश्वत मानवीय स्वभाव मे छैक।'

कहबाक चाही जे मैथिली कविताक भौगोलिक सीमा कें जे कवि लोकनि बढ़ा सकला, ताहि मे सुकान्त सोम सर्वोपरि छथि। से एहि कारणें जे जेना जेना ई सीमा कविता मे बढ़ैत गेल अछि, तेना तेना ओ मैथिली कविताक पाठकोक मानसिक सीमा कें आगू बढ़बैत चलला अछि।

सुकान्तक कविताक कतेको गोट विशेषता सब अछि। एहि सब पर ध्यान देने हुनकर कविक विराटता प्रकट होइत छैक। असल मे, जाहि प्रयोजनक लेल ओ कविता लिखैत छथि, सैह बहुत विशिष्ट अछि। कवि लोकनि जे कविता लिखैत रहला अछि से या तं यश लेल, अथवा अर्थ लेल, अथवा अपन अकल्याण निवारण लेल, अथवा अपन आनंद लेल लिखला अछि। सुकान्तक काव्य-प्रयोजन एहि सब सं बिलकुल भिन्न छनि। ओ जनमुक्ति लेल लिखैत छथि। ई 'जन' शब्द बड़े व्यापक, आ पुरानो ततबे। कारण, ऋग्वेद मे सेहो एहि शब्द कें ठीक एही अर्थ मे हम सब प्रयोग होइत देखै छी। जन माने जनता, जकर एक इकाइ हम छी आ कि सुकान्त छथि। मार्क्सवादी लोकनि कें पुछबनि तं कहता जे 'सर्वहारा' शब्दक जे अर्थ ठीक वैह नहि छैक, जे 'जन' के अछि। सर्वहारा अबैत छैक औद्योगिक मजदूर समुदाय सं जखन कि जन गाम सं अबैत छैक। गामक किसान आ कृषि-मजदूर। सुकान्त मुदा एहि विभाजन कें कत्तहु स्वीकार नहि करैत छथि। हुनकर यैह जन कतहु जं खेत सं सोना उपजाबै छै, तं कतहु फैक्ट्री सं इस्पात, कतहु सियाचीन मे देशक सिमान बचबैत छैक।

भारतक इतिहास मे देखबै जे यैह जन थिक जकरा पर शासन कयल जाइत छैक, आ एहि शासन लेल जानि नहि कतेको तरहक शासन-प्रणाली चलन मे आनल गेल। सुकान्तक समय लोकतांत्रिक प्रणालीक शासनक समय थिक, जकरा बहुत आराम सं बाहुबली लोकनि, बनियां लोकनि, मनबढ़ू नेता लोकनि तानाशाही-प्रणाली मे रूपान्तरित क' लेलनि अछि। जन के एतय ई हालति छैक जे अंगरक्षकक बूट तर मे ओकर कल्ला दबाएल छै आ ओ रोगाह कुकूर जकां कें कें क' रहल अछि। वास्तविक स्थिति छैक जे एही जन के निर्माण केने देशक निर्माण होइत छैक आ देश आगू बढ़ैत अछि। मुदा, सुकान्तक कविता मे हमरा लोकनि देखैत छी, आ वास्तविक घटना-चक्र मे तं देखितहि छी जे शासन-संचालनक एहि समुच्चा कर्मकांड मे जनताक लेल कोन्नहु टा स्थान नहि छै। नीति आ योजना ककरो आन कें ध्यान मे राखि क' बनैत अछि। लाभान्वित ककरो आन कें करबाक मंशा भीतर भरल रहैत छैक, यद्यपि कि कहल यैह जाइत अछि जे एहि सं देश के विकास हेबाक छै। एहि छद्म कें देखार करब सुकान्तक काव्य-प्रयोजन छनि।

मैथिली कविताक भारतीयता एक एहू बात मे निहित अछि जे आने साहित्य जकां एत्तहु नौटा रस छै। एहि नबो रस मे हास्यरस बली कि करुण रस बली, ताहि सम्बन्ध मे हमरा सब लग पुरखा कवि लोकनिक कतेको संस्मरण अछि। मुदा ई रस-शास्त्र सुकान्तक कविता बुझबा मे लेशमात्रो सहायता नहि क' सकत। हुनका ओइ ठाम एकटा दशम रस भेटत। ओ थिक विक्षोभ रस।

लगातार लगातार के अन्याय आ उत्पीड़न सं ई उत्पन्न होइत अछि। अनीति एकर आलंबन थिक। विरोध केला पर पुलिसक गोली सं मारल जाएब उद्दीपन। सौंसे दिन बरद जकां खटलाक बादो ने निचैनक रोटी, ने मनुक्ख सन के आवास, ओकर आत्मसम्मान लेल शासक-दलक कोनो गत्र मे लेहाजक आभास तक नहि, ओकर बाल-बच्चाक भविष्य लेल दूर-दूर तक कोनो संवेदनशीलता नहि कतहु। एकरा सब कें विभाव, अनुभाव, संचारी भाव-- जे कहि लिय'। सुकान्तक कविता पढ़ैत आइ अहां कें लागि सकैत अछि जे रोहिंग्या तं मात्र एक उपाधि थिक जकर निर्णय भूगोल केलकैए, बांकी असली उत्पीड़ित तं एहि देशक ई जन थिक। हुनकर आकलन छनि जे एहि दुर्घट परिस्थिति कें बदलल जा सकैत अछि। आ, अपन जीवनक चरम सार्थकता ओ एही मे देखैत छथि जे परिस्थिति कें बदलबाक चाही। तें हुनकर विक्षोभ आक्रोश सं विद्रोह धरिक अपन समुच्चा प्रक्रिया पूरा करैत अछि।

सुकान्तक कविता-वाचक मैथिली कविताक इतिहास मे एकटा अलगे पहचान ल' क' अबैत अछि। ओ ने यात्री जीक वाचक जकां गमैया किसान थिक ने राजकमल चौधरीक वाचक सन दिशाहारा बौद्धिक। जीवकान्तक वाचक जकां ओ सुधांग प्रगतिशील ग्रामीण सेहो नहि थिक। तखन सुकान्तक वाचक केहन थिक? ओ बौद्धिक थिक, कतहु बेसी गंभीर। मुदा ओकरा लेल चिन्तनक ओते महत्व नहि छैक जते पुरुषार्थक। ओ भला लोक मैथिल जकां भुखलो पेट ढकारक देखाबा करैबला नहि थिक। अपन एक-एकटा दुख कें ओ कलमबंद करै छथि जाहि सं सनद रहय। सामंती हमला मे पिताक बारहटा दांत टुटबाक प्रसंग हो कि मायक हुकरब कि भरि दिन खटलाक बादो आधा पेट खा क' आठ बाय आठ के कोठली मे निन्न बिना बेचैन औनाएब--ओ कथूटा नुकाएब नहि जनैत अछि। एकर स्वाभाविक परिणति थिक नक्सलबाड़ी, भोजपुर। एक ठाम जखन ओ प्रिया कें बिसरि जाइ लेल संबोधित करैत छथि कि कमला कें नै मोन पड़बा लेल बरजै छथि, कि गाम-घर कें बिसरि जयबाक बात करैत छथि तं तकर मर्म मे जेबाक चाही। मिथिलाक माटि पर ओ नक्सलबाड़ीक फसल लहलहाइत देखय चाहैत छथि।

सुकान्तक कविता बहुत प्रौढ़। मैथिली कविता कें रजनी-सजनी बूझि क' जे लोकनि एहि ठाम ढुकय चाहता, सुकान्तक कविता एहन लोक कें बैरंग आपस हेबा लेल बाध्य क' देत। हुनकर जाबन्तो कविता दोहारा बान्ह के कविता सब थिक जाहि मे एक्कहि संग अनेक स्तर चलैत रहैत छैक। चित्र दर चित्र, विचार दर विचार अबैत छैक। शैली जे कहबै जे एकटा कोनो पकड़लनि आ समुच्चा कविता लिखि गेला, सेहो नहि। अक्सरहां कविताक आवेग अपना लेल बीच मे जा क' अपन अलग शैली अख्तियार क' लैत छैक। सौन्दर्यक पारखी सेहो ओ अलबत्त। हुनका ओतय 'जुआन बांसक कोपड़ पर लुबधल चम्पइ रौद' अछि तं कतहु 'धान कटल खेतक सोन्हगर गंध मे मातल' 'एकटा हाक केराउ आ तीसी फूलक मेहराव दैत अछि'। हुनकर कविता मे जे आवेग आ लय अछि से तते लस्सेदार जे मानू अगिला बिंब-समूह कें तं घिचि-घिचि आनिते अछि, ओकर लस्सा पाठकक मन धरि पसरि जाइत छैक, जं ओ कविता मे एक बेर प्रवेश क' गेल हो तं। ताहू पर सं कबीर टाइप के खिलंड़ापन। आ, बुझौअलि बुझेबाक गंहीर आ मारक कलाकारी से ठामठीम जगजगार।

हुनकर कविता ने जीवकान्तक कविता जकां एकहारा छनि ने उदयचंद्र झा विनोदक कविता जकां वर्णनात्मक। ओइ ठाम चित्र दर चित्र अबैत छैक जे अंत मे जा क' एकटा निस्सन कथ्य मे निमज्जित होइछ। एहि सभक कारण हुनकर कविता भरल-पुरल, गज्झिन स्वरूप बनबैत अछि। एकटा स्तर विचारक रहैत छैक जे समुच्चा चित्र कें गतानने रहैत छैक, एकतान एकलय बनबैत छैक। स्वाभाविक थिक जे एहि सब कथूक अपन जटिलतो छैक। ई जटिलता तखन आरो बढ़ैत अछि जखन ओ सामयिक राजनीति पर अपन कोनो रूपक रचैत छथि। कोनहु ठाम नगर भरि मे एकटा जंगली चीताक हरबिरड़ो रहैत छैक, तं कतहु मुइल हाथीक मांसक लोभी गिद्ध समुदायक बीच तीन दांतवाली एकटा बुढ़ियाक प्रवेश होइत छैक। तें अहां अक्सरहां महसूस करब, सुकान्तक कविता अपन पाठक सं नव पात्रता, नव रसज्ञताक अपेक्षा करैत रहैत छैक।

सुकान्तक कविता मे भेटैत अछि जे देशक भीतर एकटा युद्ध चलि रहल अछि। जं ई जन अपन वाजिब रोजी, अपन आत्म-सम्मान आ अपन स्वतंत्रता लेल बेगरतूत अछि तं ई युद्ध अवश्ये अवश्यंभावी थिक। कोन युद्ध थिक ई? निश्चिते गृहयुद्ध थिक। कवि स्वयं अपनो एहि युद्ध मे शामिल छथि। अपन कविता सब मे जे हुनका हम सब बजैत सुनैत छी, ओ बाजब एकटा सामान्य बाजब नहि, एकटा सामरिक चुप्पी कें बीच मे राखि क' बाजब थिक। ओ कहैत छथि, 'महाश्मसान बनल ई देश हमर नहि भ' सकैत अछि/ जल्लाद सभक ई देश हमर नहि भ' सकैत अछि/ जोआन आकृति कें तेजाब सं जरा देब' बला ई देश हमर नहि भ' सकैत अछि।' तखन, कोन देश अहांक देश थिक कवि? ओ कहैत छथि, 'आब आवश्यक जे/ ठामठीम पसरल ओझरायल रेखा सभ कें समेटि/ देशक नक्शाक बीचोबीच एक्केटा मोट रेखा खीच दी।' जखन ओ कहैत छथि जे 'माय-बाप बेटाक जन्म मात्र ऊके लगाब' लेल नहि दैत छै' आ 'पति मात्र ओछाओनेक साझीदार नहि होइत छैक' तं कहय असल मे ओ यैह चाहैत छथि जे एहि जनयुद्ध मे भागीदार होयबे मनुष्यताक चरम अहोभाग्य थिक। ओ अपनो एहि युद्ध मे शामिल छथि। हुनक रणनीतिक आकलन छनि जे जनता जीतत आ वास्तविक स्वतंत्रता जरूर एहि देश कें नसीब हेतै। ओ कहैत छथि, 'मौसम आबि रहल छै/ सभ किछु फरिछा जयबाक/ गाछ मे झूलैत पातक/ पयर तर दबाइत पातक/ अंकुरस्थ पातक/ स्थिति फरिछा जयबाक/ मौसम आबि रहल छै।' हुनक स्पष्ट आकलन छनि जे जनता अपन युद्ध लड़ि क' ई देश अवश्य बचाओत।

।। चारि ।।

अपन कविता मे एकठाम ओ अपन देशक आजादी कें 'एकटा चौंतीसवर्षीया भोतिआएल राजनीति' कहलनि अछि। तखन देखबै जे हुनक कविता सब मे टुटैत गामक पीड़ा आ मुक्त बाजारक मायाजालक अनेक चित्र सेहो आएल अछि। एक ठाम कहैत छथि, 'हमरा लोकनि अपन रचनात्मक मूल्य कें/ बेसी सं बेसी दाम मे बेचबाक लालसा मे/ प्रतिदिन व्यापारिक संघ सभ सं अपील कइये रहल छी/ युग सौदेबाजीक थिकै।' एक ठाम सामाजिक सरोकारक मादे कहैत छथि जे 'हमरा लोकनि परचर्चा मे लीन/ अपन दियादक मथदुक्खी सं आनंद मे बाझल रहि जाइत छी।' एकठाम कतहु एहनो संकेत दैत छथि जे भारतक राजनीति आ नेतागिरीक कारण भारतीय मनुष्यता मे कतेक ह्रास भेल अछि। सुकान्तक काव्य-प्रवृत्ति कें देखैत कौखन प्रश्न उठैत अछि जे ई सब आखिर की थिक? ई सब थिक आजादीक आदर्शक पूर्णत: ध्वस्त हेबाक निशानी। आजादी नामक जे युवती चौंतीसेक उमेर मे उढ़रि गेल छल, से सत्तरि सालक बुढ़ियाक रूप मे आइयो कोना आ किए नरक भोगि रहल अछि? एहू प्रश्नक उत्तर सुकान्तक कविता मे भेटि सकैत अछि। एकटा सही कविता अपना कविता-समयक समस्त जटिलता अपना भीतर नुकौने रहैत अछि।

इमरजेन्सीक कालखंडक लिखल हुनकर कविता सब मे सत्ताधारी आतंकक चित्र सब तं अयबे कयल अछि, तकरा संग-संग राजनीतिक महाधूर्तइक बिंब सेहो आएल अछि। ओतय आजादीक आदर्श कें चालाकी सं पृष्ठभूमि मे ठेलि देबाक चतुराइ छैक। सरकार अपन पल्ला झाड़ि लेलक, बुझू। धर्मक राजनीति, अस्मिता-विमर्श, मुक्त बाजार, भूमंडलीकरणक स्वागत-- ई सब की थिक? यैह सब तं विकास थिक। जे आजादी हरेक आंखिक सपना बनि क' एक दिन उतरल रहय, हरेक हाथक लेल काज हरेक नागरिक लेल आत्मसम्मानक वचन उचारैत, हरेक हृदय मे ई आसभरोस जगबैत प्रकट भेल छल जे 'जे काजुल से भरिपेट खाएत/ ककरो नहि बड़का धोधि होएत', तकरे रक्षक संवैधानिक, जनकल्याणकारी सरकार आइ पूरा आत्मविश्वासक संग आंकड़ा गनबैत अछि जे पकौड़ा बेचब आ कि ओला-ऊबर चलाएब तं सेहो रोजगार थिक।

एहना मे तं उचिते जे सुकान्तक कविता असमाप्त लगैत अछि। से ठीके असमाप्त अछि, कारण ओ युद्ध असमाप्त अछि। ओ अपनहु गछने छथि। हुनक 'प्रतीक्षान्त' कविताक समापन पंक्ति छनि--'बेरंग बुर्ज सभक दोहाइ दैत हमरा लोकनि/ कखनो बोकारोक विस्फोट मे/ कखनो चासनालाक बाढ़ि मे/ कखनो बंगोपसागरक चक्रवात मे/ कखनो लद्दाख आ कच्छक रण मे/ मारल जाइत छी/ सभ दिन सभ ठाम/ प्रतिवादविहीन/ मीत हे, हमरा लोकनि एखनो/ एहि चैती बसात मे प्रतीक्षारत छी कि/ क्यो तं आबय आ/ एहि खरायल कासवनक निरंग होइत आकाश मे/ एकटा रंग पसारय/ भ्रम आ सपना कें फरिछाबय/ क्यो तं आबय।'

साइत अपना युगक हरेक जिम्मेदार कविता अनागतेक आवाहन सं समाप्त होइत हो।



आलेख :- डॉ. श्री तारानंद वियोगी

Monday, 18 February 2019

मैथिल फाल्केक प्रसूति-व्यथा: मॉलीवुडक आह्वान - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

मैथिली मे त’ आब कएक टा सिनेमा बनि गेल अछि। घुसकुनियाँ कटैत ई क्रम चलितो रहत से कहल जा सकैत अछि। एकर गुणवत्ता आ निर्माणक बहस होइते रहत आ तकर अछैत मैथिली अपन किछु घबाह आशावादक संग ‘रील लाइफ’क यात्र तय करिते रहत। मुदा मैथिलीक फिल्म निर्माणक 50 वर्ष होइतहुँ ई एकटा कर्णचुम्बी आँकड़ा सँ बेसी किछु नहि कायम भ’ रहल अछि। मैथिलीक गीतनादक मंच पर रवीन्द्र-महेन्द्रक जोड़ी सुविख्यात रहल अछि। कहल जाइत अछि जे रवीन्द्रजी गीत लिखथि, महेन्द्रजी तकर धुन बनाबथि आ स्वर सेहो देथि। यद्यपि ई धुन आ स्वरबला स्थापना आइ कएक वर्ष सँ हमरा मान्य नहि भ’ रहल अछि। महेन्द्रजीक संगीतज्ञान सँ त’ आइयो असहमते छी मुदा स्वर अवश्य नीक छलनि। जे-से। त’ तहिया सुनियैक जे रवीन्द्र-महेन्द्र ‘ममता गाबए गीत’ नामक एकटा सिनेमा बनौने छलाह। कएक बेर त’ स्वयं महेन्द्रजी सेहो ई बात बाजल करथि आ लगले एहि फिल्मक गीत- ‘अर्र बकरी घास खो’ आ कि ‘माता जे विराजै मिथिले देश मे’ प्रभृति गाबियो देथि। लोक एकरा ‘बाबा वाक्ये प्रमाणम्’ बूझि मानियो लेल करय। दू दशक सँ बेसीए धरि हमहूँ एहि भ्रम मे पड़ल रहलहुँ। जखन केदारनाथ चौधरीक टटका पोथी ‘अबारा नहितन’ पढ़लहुँ तखन एहन सन मारिते रास भ्रमक निवारण सम्भव भेल। मैथिलीक कहबी ‘माँड़ पसौलनि जीरा’ बेसीए चरितार्थ होइत रहल अछि। योग्य केँ स्थान आ श्रेय नहि देबाक हमरालोकनिक नमहर परम्परा रहल अछि। विराट केँ धकियाबय लेल लघुक पूजा-अर्चा करब हमरालोकनिक नेतक एकटा प्रमुख हिस्सा बनैत रहल अछि। लगैए जेना हमरालोकनि ने त’ मूल्यक निर्धारण जनैत छी आ ने मूल्य देब जनैत छी। अपेक्षित प्रतिबद्धताक घनघोर अभाव आ ताहि पर सँ दोयम दर्जाक चाँघुर मे फँसलि मैथिली- एक त’ गुड़ीच दोसर नीम चढ़ल सन।

केदारबाबू अपन पहिल उपन्यास चमेली रानी 2004 ई- मे लिखलनि आ तकरा बाद करार 2006 ई-, माहुर 2008 ई-, हीना मिथिला दर्शन मे धारावाहिक रूप मे 2011 ई- प्रभृति औपन्यासिक रचना सब आयल। अबारा नहितन (2012 ई-) संस्मरणात्मक उपन्यास त’ अछिए मुदा प्रचलित अभिप्राय सँ कने भिन्न स्वादक। वस्तुतः मैथिलीक पहिल फिल्म ‘ममता गाबए गीत’ कोना बनल तकर व्यथा-कथाक निस्सन आ प्रामाणिक चित्रण अछि ई पोथी। ई पोथी मिथिला- मैथिलीक मेमियायल नारेबाजी आ ताहिए नाम पर धन-जन-बल-बुद्धि हँसोथयबला चरित्र पर आ तकर तदर्थ इमानदार दरेग पर आंगुर सेहो उठबैत अछि। स्वजन केँ अनठाबय मे सेहो हमरालोकनि खूबे नाम केने छी नहि त’ एहि फिल्मक निर्माताद्वय सर्वश्री केदारनाथ चौधरी आ महंथ मदनमोहन दास केँ त’ मिथिलाक दादा साहेब फाल्के सन मान-प्रतिष्ठा द’ शिरोमणि बना क’ रहितहुँ। मुदा हाय रे हमरालोकनिक विवेक आ उदारता! नोटिसो लेबाक खगता नहि गमैत गेलहुँ अछि।

उपन्यास प्रारम्भ होइत अछि लेखकक वाल्यकाल सँ। तहिया लेखक आठमा मे पढ़ैत रहथि। प्रारम्भक चारि टा अध्याय केँ पोथीक मूल कथ्यक पृष्ठभूमि हेतु आवश्यक अध्याय कहल जा सकैत अछि। एहि मे लेखकक पढ़ाइ-लिखाइ, गाम-समाज, तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक परिदृश्य केँ अत्यंत सूक्ष्मता आ रोचकता सँ वर्णन कयल गेल अछि जाहि मे संस्मरणात्मकता आ औपन्यासकिताक अद्भुत सामन्जस्य भेल अछि। लेखक मिथिलाक सामाजिक-सांस्कृतिक ग’हसभ केँ खूबे चिन्हने-जनने छथि। प्रारम्भक एहि अध्यायसभ मे मिथिला-मैथिलीक निजगुत चिन्ता आ सुच्चा दरेग सेहो परिलक्षित होइत अछि। कलकतिया मैथिल समुदायक अपन गमैया दरेग त’ अद्भुत अछिए, एकर औपन्यासिक चित्र सेहो मार्मिक अछि। अध्ययन हेतु कलकत्ता प्रवासक क्रम मे लेखक ओतहुक लोकक मैथिलीक प्रति संवेदना केँ सेहो स्पष्ट कयने छथि। कलकत्ते मे मैथिली, एकर साहित्यिक पक्ष, एकर समाज, एहि समाज मे रचल-बसल आम लोक प्रभृति बिन्दु दिस लेखकक नजरि जाएब प्रारम्भ भ’ गेल छलनि आ ओ अबाह, धबाह आ रोगाह होबय लागल रहथि। रोग छलनि मैथिलीक, रोग छलनि मिथिलाक, रोग छलनि एकर सर्वस्तरीय उन्नयनक आ रोग छलनि एकर शैक्षिक सुधारक। तेँ त’ ओ अपन अध्ययनोपरांत कलकत्ता सँ गाम अयलाह एकटा नीक विद्यालय खोलय। मुदा पाँचम अध्याय मे हिनक भेँट महंथ मदनमोहन दास सँ होइत छनि, ट्रेन मे। दुनू गोटेक ई भेँट मैथिलीक हेतु कएक अर्थ मे ‘टर्निंग प्वाइंट’ अछि। दुनूक मित्रता गाढ़ होइत छनि। महंथजी क्वीन्स कॉलेज (इलाहाबाद)क छात्र आ केदारबाबू तहिया उदय प्रताप कॉलेज (बनारस)क छात्र रहथि। मिथिला-मैथिलीक दू टा अबारा (केदारबाबू आ महंथ मदनमोहन दासजी) मैथिली मे फिल्म बनाबय लेल तैयार होइत छथि। तैयारे नहि अपितु महंथजी त’ ताहि लेल पूँजीओ लगा दैत छथि। ई जे घटना अछि तकर किछु अतिरिक्तो महत्व अछि। मदनमोहन दासजी एक त’ महंथ दोसर भूमिहार। एकटा उपाधि (महंथ) सांसारिक काज मे बाधक आ दोसर (भूमिहार) मिथिला-मैथिलीक क्षेत्र मे योगदान लेल अजगुत सन। मुदा महंथजी दुनू कसौटी पर कसल लोक रहथि। आधुनिक शिक्षा केँ सुच्चा अर्थ मे सेहो पढ़ने रहथि। बरमहल कहल जाइत रहल जे मैथिली केँ भूमिहारवर्ग सँ अपेक्षाकृत कम समृद्धि भेटलैक। कदाचित सत्यहु होअय मुदा एहि धारणा केँ त’ एसकर महंथेजीक अवदान धकिया दैत अछि। मधुबनी लग राजनगर आ राजनगर लग मिर्जापुर। एहिए स्थानक महंथ रहथि मदनमोहन दासजी। महंथजी साहित्य-संस्कृति प्रेमी आ अंग्रेजी-हिन्दी-बाँग्ला साहित्यक गम्भीर पाठक। महंथेजी केदारबाबू केँ सिनेमा बनबय लेल सुझाव, पूँजी आ संग देलनि। से अंत धरि संग देलनि।

छठम अध्याय 1961 ई- सँ प्रारम्भ होइत अछि जखन लेखक 25 वर्षक रहथि। लेखकक शब्द मे गदहपचीसी। 1962 मे लेखक अपना नौकरी सँ इस्तीफा देलनि। एही वर्ष देश मे तेसर चुनाव भेलैक। काँग्रेसक सरकार बनल। मुदा संगहि नेतालोकनिक देशभावना सेहो विद्रूप आ स्खलित होयब प्रारभ क’ देने छल फलतः झूठ, अनीति, घूस, दाव-पेँच, छल-छप्र प्रभृति बढ़य लागल। पारस्परिक अविश्वासक नवजात वातावरण मे भारत-चीन युद्ध सेहो भ’ गेलैक। सम्पूर्ण देश अपमानित भेल छल। एहने सन किछु विषम दैशिक परिस्थितिक कारणे सम्पूर्ण देशक रचनात्मकता प्रायः थमकि गेल सन छल। लेखकक फिल्म निर्माणक योजना सेहो मकमका गेलनि मुदा पुनः 23 सितम्बर 1963 ई- क’ मित्रद्वय अपन योजनाक संग बम्बई प्रस्थान कयल। तहिया ने त’ एहि तिथिएक महत्व छल, ने एहि फिल्म निर्माण योजनेक आ ने एहि मित्रद्वयक। मुदा लोक कतबो अबडेरौक, समय सभटा अवदान केँ ओरिया क’ रखैत अछि। सेहो जँ रचनात्मक अवदान होइक त’ समकालीन लोकक आँखि मूनने रचना-सूर्य नहि झँपा सकैत छैक। उत्तर पीढ़ी ओकरा अकानि लैत छैक। उक्त तिथि, निर्माण आ अवदानक आइ किछु बेसीए महत्व अछि। आजुक बदलैत परिवेश मे लोक अपन जडि़ किंवा प्रस्थान-बिन्दुक ताकहेरक प्रति कने बेसीए सजग भेल अछि। ताहि परिप्रेक्ष्य मे जँ मैथिलीक फिल्मी लोक जँ एहि तिथि केँ अपन खुट्टा तिथि मानैत छथि त’ से उचित सेहो आ अपन पुरखाक महावदानक प्रति स्मृति-आभार सेहो। डा- भीमनाथ झा सेहो एहि तिथिक ऐतिहासिकता केँ रेखांकित करबा सन स्तुत्य काज कयल अछि।

सातम अध्याय सँ फिल्मक प्रक्रिया प्रारम्भ होइत अछि। निर्माताद्वय केँ बम्बई मे कएक तरहक अनुभव होइत छनि। उदयभानु सिंह, परमानंद चौधरी (फिल्म निर्देशक सी- परमानंद), रवीन्द्रनाथ ठाकुर (गीतकार), श्याम सागर (संगीतकार), सुमन कल्याणपुर-महेन्द्र कपूर-गीता दत्त-कृष्णा काले (गायक-गायिका), त्रिदीप कुमार (हीरो), अजरा (हिरोइन), प्यारे मोहन सहाय, कमलनाथ सिंह ठाकुर (चरित्र अभिनेता), फणीश्वर नाथ रेणु लोकनि सँ भेँट-घाँट होइत छनि। फिल्मक आनहु प्रभागक टेक्नीशियन सब ताकल जाइछ। पटना मे फिल्मक मुहुर्त होइछ। तहिया ‘तीसरी कसम’ बनेबाक सूरसार सेहो भ’ रहल छल जाहि मे सी- परमानंद अभिनय क’ रहल छलाह। तत्कालीन राज्यपाल फिल्मक मुहुर्त मे आयल छलाह। कमलनाथ सिंह ठाकुरेक नामकरण ‘ममता गाबए गीत’ एहि फिल्मक नाम रहल। तकर बादक अध्याय मे फिल्मक शूटिंग आ रोमांचक प्रसंग सब वर्णित भेल अछि, किछु अपरोजक प्रसंगक संगहि। दू मास तेरह दिनक शूटिंगक कथा यथासम्भव विस्तार सेहो पओने अछि। मुदा बम्बईक ‘लैब’ मे जा क’ बूझय जोग होइछ जे फिल्म अधे बनल अछि। निर्माता हतप्रभ! ओमहर महंथजीक महंथान पर सरकारी संकटक करिक्का मेघ। मुदा पुनः संगोर कयल जाइछ आ मास भरिक शूटिंग पुनः होइछ। तदुपरांत एडीटिंग, जे कि बेस महग। निर्मातालोकनिक जेबी हल्लुक होइते बम्बईया मैथिल आ ओतहुक मिथिला-मैथिलीक संवेदनाक पोल-पट्टी खूजय लगैत अछि। केओ मदति नहि करैत अछि, ने इनकम टैक्सक हाकिम आ ने ओतहुक मैथिल समाजसेवी बन्धुलोकनि।

तेरहम अध्याय सँ एतद्सम्बन्धित शहरिया मैथिलक छप्र आ द्वैध अपन सुच्चा रूप मे देखार होइत अछि। मित्रद्वय डिस्ट्रीब्यूटरक ताकहेर मे कलकत्ता जाइत छथि आ कलकतिया मैथिल केँ विश्वास दिया क’ फिल्म प्रदर्शन हेतु शेष खर्चक ओरियान कर’ चाहैत छथि। कलकत्ता आन जाहि कारणे मिथिला-मैथिली लेल सहयोगी सिद्ध भेल हो मुदा मैथिलीक पहिल फिल्मक मादे तँ कनौसिओ भरि सहयोगी सिद्ध नहि भेल। कलकतिया मुँहपुरुषलोकनिक निम्नकोटिक स्वार्थ, लोभ, छल-छप्र आदिक वर्णन बुलंदी सँ भेल अछि। ने त’ वितरके भेटलनि आ ने एकहु पाइक सहयोगे। पाइक कोन कथा, तत्कालीन पुरोधालोकनि सुबोलोक सहयोग देबा सँ चूकि गेलाह। सभ संस्था, धनकुबेर, शिक्षाविद्, सम्पादक, समाजसेवी, नौकरिहारा मुँहपुरुषलोकनि नाघरि घर केलनि। बाबूसाहेब चौधरी सन एकाध टा निर्लोभ, निर्भीक आ समर्पित व्यक्ति टा संग पुरलनि। निर्माताद्वय केँ ठक, फरेबी, झुठ्ठा कमीशनखोर, फनैत प्रभृति मैथिलीक सोदाहरण व्याख्या ओतहि भेटलनि। मुदा ताहू सँ विशेष उपलब्धिक बात ई जे मित्रद्वय केँ एहि महावदानक प्रति मैथिल बिड़लाक मोचंड छोट भाय द्वारा भेटलनि ‘अबारा नहितन’ सन दुत्कार-उपहार-वाक्य। कहल जाय त’ कलकत्ते मे एहि औपन्यासिक कथा केँ शीर्षक भेटैत अछि। चौदहम अध्यायक अंत वस्तुतः बेस मार्मिक अछि जतय मित्रद्वय ‘अबारा’ उपाधि ग्रहण क’ अपन मान-सम्मान आ अभिमान केँ अपनहि सोझाँ भुजरी-भुजरी होइत देखैत छथि आ अपन फिल्मक निर्माण-कार्य केँ पाप-पुण्यक तराजू पर जोखय लेल विवश भ’ जाइत छथि।

‘ममता गाबए गीत’क निर्माण-यात्र सत्ते बड़ दुखद रहल अछि। पुस्तकक अंत धरि अबैत-अबैत करेज दू टुकड़ी भ’ जाइत अछि, आँखि पनिया जाइत अछि ई बुझितो जे आइ ई पानि निरर्थक अछि, निष्प्रयोज्य अछि। कारण, तहिये जँ लोकक आँखि मे पानि रहितैक त’ आइ हमरासभक लग एकटा समर्थ फिल्म उद्योग भ’ गेल रहितय, सिनेमा-सिरियलक भरमार रहितय, रंगकर्मी-अभिनेता-निर्देशक-टेक्नीशियन सभक फौज रहितय, परभाषायी आ परसंस्कृतिक आक्रमण सँ आबंच रहितहुँ, जँ आबंच नहियो रहि सकितहुँ त’ एतेक घाहिल त’ नहिए रहितहुँ जतबा आइ छी। सांस्कृतिक-साहित्यिक चेतनाक स्तर अझुका सन नहि होइत। मिथिलाक लोकगीत शोकगीत त’ नहिएँ बनैत। मुदा जडि़क बात ई जे हमसभ अपन नायक पर गर्वे कहिया केलहुँ। जे केलहुँ से देखाउँसे। देखाउँसक गर्व अल्पकालिक होइत छैक, बल्कि अपरिपक्व होइत छैक।

अपन कॉलेजिये दिन मे मैथिलीक सांस्कृतिक मंच सँ हमर सम्पर्क होयब शुरू भ’ गेल छल। तहिया सिनेमा देखब नशेरीक अमल सन त’ नहिएँ छल मुदा प्रायः एकटा आवश्यक साप्ताहिक काज सन जरूरे छल। तहिये सँ वॉलीवुड आ हॉलीवुड सन शब्द चकबिदोर लगबैत रहल आ अनचोके सेहन्ता कर’ लगैत रही जे मैथिलीओक अपन फिल्म उद्योग होयत आ तकर नाम ‘मॉलीवुड’ राखल जायत। तहिया पटना, कलकत्ता आ कि बेगूसरायक रंगमंचीय सक्रियता बेस छल। किछु वर्ष त’ पटना मे औसतन प्रतिमास एकटा क’ नाटक होअय लागल छल। नहि नाटक त’ तकर रिहर्सले। मोटा-मोटी बारहोमास रंगकर्म। चेतना समिति, अरिपन, भंगिमा, आंगन, कला-समिति मे काज करबाक उपरा-उपरी उदाहरण। तदजन्य परिणाम सेहो। तहिया एतेक फिल्मो नहि बनैक। बिहार मे त’ कमे सम। मुदा भोजपुरी सिनेमा त’ बनिते छलैक आ एकर स्वभाषी-स्वक्षेत्री दर्शक ओकरा अलो-मलो सँ स्वागतो करैत रहल। मुदा हमरालोकनि पछुआयले रहि गेलहुँ। कते दिनक बाद पुनः एकटा फिल्म आयल ‘सस्ता जिनगी महग सेनुर’ जे कि एकरती हरहोड़ सेहो मचौलक आ कहाँदन व्यावसायिक रूपेँ सेहो ठीके-ठाक रहल। ‘नैन न तिरपित भेल’ सीरियल सहो बनल मुदा ई काजसभ परम्परा नहि बनि सकल अपितु आन्हरक डेग मात्र सिद्ध भेल। दोसर दिस समूहक सांस्कृतिक चेतना दिनानुदिन नीचे मुँहे गुड़कि रहल अछि। तखन त’ साहित्यिक चेतनाक चर्च करब बौक केँ ककहरा रटायब सन भेल। एहन स्थिति मे ‘मॉलीवुड’ शब्द असम्भव त’ नहि मुदा बेस भरिगर अवश्य लगैत अछि। पूर्वापेक्षा मैथिल समृद्ध भेलाह अछि। तेँ पाइयो छैक, लोको छैक, राज्यक स्थिति सेहो पहिले सँ नीक कहल जाइछ। कएकटा मैथिल ‘अबारा’ आब एहि मे सक्रिय सेहो छथि। मलंगियाजीक नाट्यकथ्य, नाट्यरचना आ तदनुकुल चुम्बकीय एवम् मारक-बेधक क्षमताबला चोटगर संवाद आ तदजन्य कौशल्य कएक दशक सँ देखैत आबि रहल छी। कुणालजी ‘नैन न तिरपित भेल’ सँ अपन एतद्विषयक क्षमता देखा चुकल छथि जकर उपयोग होयबाक चाही। मनोज श्रीपति ‘रक्ततिलक’ फिल्म बना क’ मिथिला-मैथिली केँ टोरन्टो फिल्म फेस्टिवल धरि पहुँचा आयल छथि आ आइ फिल्म निर्माणक क्षेत्र मे एकटा अँखिगर नाम सन भेल जा रहल छथि। सक्रिय-सांकाक्ष रंगकर्मी-अभिनेता-अभिनेत्रीक सूची मे नव-नव नाम निरन्तर जुटि रहल अछि। फिल्म निर्माणक प्रायः सभ प्रभाग मे आब मैथिल नाम खूबे अभरय लागल अछि। मुदा फिल्म निर्माणक एहि तमाम तत्व केँ एकठाम मिलाब’बला एकटा समर्थ ‘फैक्टर’क अभाव प्रायः आइयो ओहिना अछि जेना कि दू तीन दशक पूर्व छल। जतेक प्रकारक दिक्कत आ परेशानी केदारबाबू आ महंथजी केँ भेलनि, जँ बेराबेरी तकरे निदान भ’ जाय त’ मॉलीवुडक बाट स्वतः खुजि जायत। हमरा लग दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन कि आमिर-शाहरुख सन नाम त’ नहिए अछि, कुणाल, रविकिशन, मनोज तिवारी, निरहुआ आ कि पवन सिंह सन नामक सेहो अभावे अछि। एकरा लेल कोनहु एकटा कारण जिम्मेवार नहि मुदा जे आ जतबा कारण अछि से त’ एतद्विषयक चेतना केँ अबाह केनहि अछि। ‘नैन त तिरपित भेल’क बाद पाँतरे-पाँतर। जँ पूँजी किंवा विज्ञापन कारण बनैछ त’ सेहो त’ अपनहि टेटर भेल। मुदा जँ सेहन्ता आ दरेग सँ हटि क’ यथार्थक धरातल पर आबि विचार करैत छी त’ जखन मिथिला मे आन तमाम प्रकारक उद्योग चौपट्ट भ’ गेल अछि, हायाघाट-लोहट-पंडौल-सकरी-कपसिया-हसनपुर-पुर्णियाँ-कटिहारक सभटा उद्योग हाकरोस क’ रहल अछि। एहि परिप्रेक्ष्य मे मिथि्ालाक सामूहिक जनचेतना अपन सभ तरहक ‘फ्रीजिंग प्वाइंट’क रेकॉर्ड दिनानुदिन अपनहि तोड़ने जा रहल अछि, तेहन मे त’ मॉलीवुडक सेहन्ता जँ असम्भव नहि त’ मोसकिल अवश्ये लगैए। कखन हरब दुख मोर, आउ पिया हमर नगरी, दरभंगिया बाबू प्रभृति फिल्मक प्रदर्शनक अछैत अपनहि गाम मे एकघरा आ कि भगिनमान सन मोजर, ‘अपन गाम अपन लोक’क निःशब्द परलोकगमन प्रभृति मारिते रास टटका घटना सब देखि क’ त’ मोसकिल बढ़ले जाइत अछि।

आदर बिलहबाक जे सामूहिक आ कि संस्थानिक क्रिया-प्रक्रिया अछि से चोटमरू अछि। ओहिठाम दियादी भोज चलि रहल अछि। उबरत तखन ने सौजन्नी। संस्थासभ मे निष्पक्ष विचार देब’बला वृत्ति आ मानसिकता दुनू मे खूबे ह्रास भेल अछि। प्रायः सभ संस्था अपन मोतियाबिन्दक तह केँ दिनानुदिन मोटे कयने जा रहल अछि। अपरोजक-अपचेष्टक साहित्यिक संस्करण आ संस्कारक गुण-धर्म मे वृद्धिए भेल अछि जे कि हमरालोकनिक सामूहिक चरित्र आ परिचिति सेहो बनल जा रहल अछि। तेहन विकट स्थिति मे एहि दुनू अबाराक आवारगी केँ साहित्यिक किंवा संस्थागत प्रशंसा भेटत से अपेक्षा करबाक हिम्मति नहि होइत अछि मुदा ताहि सँ एहि पोथीक बहुद्देशीय विशेषता कम नहि भ’ जाइत छैक।

अजरा, केदारनाथ चौधरी, महंथ मदनमोहन दास, सी परमानंद, श्याम शर्मा, उदयभानु सिंह लोकनिक फोटो आ कि एहि फिल्मक पोस्टर पर्यन्त हमहूँ नहि देखने रही, फिल्मक कोन कथा! ‘आबारा नहितन’ प्रारम्भे होइछ चारि पेज मे हिनकालोककि फोटो सँ आ अंत होइछ एहि फिल्मक गीतसभ सँ। एहि पुस्तकक पाठ्यप्रवाह, स्वभुक्त घटनावलीक ठोस आ कटु यथार्थ-चित्रण, एकर चुम्बकीय औपन्यासिकता, लेखकीय कथ्यक पुष्टि करैत ऐतिहासिकता, प्रामाणिकता, हिन्दी फिल्मक संक्षिप्त आ आरम्भिक इतिवृत्त, स्वातंयोत्तर भारतक विदेश नीति आ एकर तीत-मीठ प्रभाव, उपन्यासक नायक मित्रद्वयक द्वन्द्व-संघर्षादि एकर किछु उत्तम पक्ष मे सँ अछि।

मैथिल कएक अर्थ मे अपना लोकक लेल कृतध्न समाज रहल अछि। एकर मारिते रास उदाहरण उपस्थितो कयल जा सकैत अछि। अपन वस्तुक महत्व केँ अबडेरैत रहल ई समाज सदति परानुरक्तिक परिचय दैत रहल अछि। तेँ ई सम्भव अछि जे मारिते रास आन-आन महत्वपूर्ण तिथि सन 23 सितम्बर 1963 ई- सहित एकर ऐतिहासिक-सांस्कृतिक महत्व केँ ई समाज बिसरि जाय, हमर सांस्कृतिक दारिद्रड्ढ आ पराघमुखी चेतना बढ़ले जाय, अगिला पाँच दशक पर्यन्त मॉलीवुड शब्दक प्रति हमर मोह मात्र एकटा मोहे बनल रहय, मुदा देर छैक अन्हेर नहि छैक। मैथिलीओक फिल्म निर्माण मे गति आओत, आ से अवश्ये आओत। एकर सूरसार त’ होबय लागल अछि। हँ, ई मानैत छी जे पछतीया रोटी खाएब मैथिलीएक कपार मे रहल अछि। आन ठाम त’ अपन जडि़ किंवा प्रस्थान-विन्दुक ताकहेर जोरो पकड़लक अछि। देखाँउसे मिथिलोक लोक तकताह। आ से जखन मैथिलीक फिल्मक जडि़ कोड़ताह त’ ‘ममता गाबए गीत’ अभरबे करतैक, आ तेँ ई निर्माण-दल आ एकर योगदान क्रालक्रमेण अपन बहुअर्थी प्रासंगिकता बढ़ौनहि चलत।

दादा साहेब फाल्के केँ भारतीय सिनेमाक प्रथम पुरुष होयबाक श्रेय प्राप्त छनि। ताहि अर्थ मे एहि मैथिल फाल्केक भूमिका कने न्यून, कने झूस सन अभरैत अछि कारण ई लोकनि फिल्म त’ बनौलनि मुदा एकर उत्तरांश अपूर्ण छल जकरा पूर्ण कए प्रदर्शित करौलनि रवीन्द्रनाथ ठाकुर सेहो कि त’ 16-17 वर्ष बाद। तथापि विजय कुमार मिश्र (दरभंगा) अपन पत्रकाररूपक परिचय दैत एहि मैथिल फाल्के आ हुनक रचना केँ रचना (अक्टूबर-दिसम्बर, 2004 अंक) मे लिखि एकटा भरल पोखरि मे ढेप फेँकि देलनि। हिलकोर भ’ रहल अछि आ ई तरंग जरूरे अपन गंतव्य धरि पहुँचत से हमरा सन लोक केँ विश्वास भ’ रहल छैक। ई हम गमियो रहल छी आ गछियो रहल छी, तथापि एहि पुस्तकक अंतिम बात, अंतिम प्रश्न-

‘‘फिल्म पूरा बनि गेलैक तकर सूचना पाबि हमरा दुख नहि प्रशन्नता भेल छल। मुदा एकटा जिज्ञासा मोन मे रहिए गेल रहए। की हम (केदारबाबू) आ मदनभाइ मैथिल समाज मे अपरिचित सँ परिचित भेलहुँ? जवाबक प्रतीक्षा मे मदनभाइ संसार त्यागि विदा भ’ गेला। मुदा हम एखन तक प्रतीक्षा मे जिबिते घुमि-फिरि रहलहुँ अछि।’’

हमरा बौक बनौने जा रहल अछि आ ओह-आह करैत लेखकक निजगुत उत्तर तकबाक ब्योँत मे लागि जाइत छी।

किछु विषय तात्विक रूपेँ आइयो ओहिना अछि जहिना 5-6 दशक पूर्व छल। एहि संदर्भ मे एहि पुस्तकक कथ्य-सीमा सँ बाहर आबि गम्भीरतापूर्वक विचार-विमर्श करबाक खगता छैक। केदारबाबू आ महंथजी दुनू गोटे फिल्म बनबय विदा भेलाह। एहि निर्माण-यात्रक पहिल विडम्बना त’ ई छल जे ओ लोकनि ओहि नव क्षेत्र मे काज करबा लेल प्रवृत्त भेलाह जकर कि मिसियो भरि प्राथमिक ज्ञान नहि छलनि। जे जेना कहलकनि तहिना होइत गेलाह। एहन सन जेना निर्मितिजन्य अपन कोनहु टा योजना नहि। तकर जँ ई लोकनि प्रायः खगतो नहि गमलनि त’ सेहो कोनो नान्हि टा आश्चर्य नहि। गहराइक थाह-पता लेने बिनु आ हेलबाक कौशल अरजने बिनु हेलिया सदति डूमैत रहल अछि। से एहू फिल्मक संग भेल। पुस्तक मे वर्णित समस्त परेशानी प्रकारान्तर सँ अपेक्षित पूर्वज्ञान-पूर्वयोजनाक अभावक कारणेँ सेहो छल। उत्तरकालिक दोख त’ बम्बईया कि कलकतिया मैथिल के बाद मे देल जाय। निर्माता मित्रद्वयक नेयार-भास त’ ततबे कचिया आ दोखाह-रोगाह छलनि जे बम्बई जाइते ध्वस्त भ’ गेल आ आन मिथक, आन कथा पर फिल्म बनल। कोनहु धार्मिक कथावस्तु पर सिनेमा बनल रहैत त’ उमेद करैत छी जे ई हाल नहि होइत। फिल्म निर्माणक अपन संस्कृति छैक आ अपन प्रक्रिया छैक जे कि कएक अर्थ आ कएक क्षेत्र मे समकालीन समाजक मनोविज्ञान कि दशा-दिशा सँ निरपेक्ष नहि भ’ सकैत अछि। बाकस मे बंद एहि अपूर्ण फिल्म केँ पूर्ण क’ रवीन्द्रजी प्रदर्शनक स्थिति धरि अनलनि त’ ताहि सँ रवीन्द्रजी केँ जे अर्थ लाभ भेल होनि, मैथिल समाज केँ त’ एकटा ऐतिहासिक लाभ चट द’ भ’ गेलैक।

मैथिली फिल्म निर्माणक अझुको स्थिति प्रशंसनीय नहि अछि। बम्बइया आँखि सँ मिथिलाक फोटो खिचबाक षड्यंत्र थम्हि नहि रहल अछि। कोनहुटा निर्देशक मैथिली फिल्म केँ अपन निजता आ परिचितिक संग विकसित करबाक आग्रही नहि देखाइत छथि। ई एकटा नमहर बाधक तत्व अछि। दोसर बात जे मिथिलाक जनसामान्य मे अपन भाषा-साहित्य आ संस्कृतिक प्रति दरेगे कतेक रहि गेल छैक! जे गोटपगरा फिल्म बनैए तकर रिव्यू धरि नहि छपि पबैए। फिल्मी लोकक साक्षात्कार कत’ आबि रहल अछि? फिल्मी पत्रिकाक ओरियाओन किएक ने होइत अछि? ‘परिकल्पना’ (सम्पादक- किसलय कृष्ण) एक अंकक बाद तेहन ने अकल्पनीय पतनुकान लेलक जे एकर दोसर अंक नहि आयल। मैथिलीक दरभंगिया समाचार-पत्र ‘मिथिला आवाज’ (दैनिक) सँ एतद्क्षेत्रीय सम्भावना बनल छल मुदा ओहो गहनमरू भ’ क’ बंद होयबाक बाट जोहि रहल अछि।

अदौ सँ ल’ क’ आइ धरि मैथिली दोयम दर्जाक लोकक मुखियागिरी गछार सँ मुक्त नहि भेल अछि। एकर फिल्म सेहो छूटल नहि अछि। तेँ एकर प्रोडक्शनो दोयम दर्जाक होइत रहल अछि। नहि त’ 50 वर्षक सुदीर्घ कालखंड मे एकहुटा ‘पैरेलेल’ आ कि ‘क्लासिकल’ फिल्म एहन नहि बनल जकर गुणवत्ताक तुलना आन क्षेत्रीय भाषाक फिल्मक संग कयल जाइत। मुदा जतय निर्माण पर संकट हो ओतय तुलना पर गप करब त’ नितान्त मूर्खता अछि। विराट सम्भावनाक अछैत एकटा नमहर शून्य पसरल एहि मैथिली फिल्म निर्माणक क्षेत्र मे आइयो अँखिगर लोकसभक बाट जोहल जा रहल अछि। मुदा इहो बात संगहि सत्य अछि जे सिर्फ वीरता सँ आ कि सिर्फ चतुराइ सँ कोनो संग्राम नहि जीतल जा सकैए। विजय लेल दुनूक संयोग आवश्यक। 

डॉ. कमल मोहन चुन्नू
साभार- पुर्वोत्तर मैथिल, अंक-30, जनवरी-मार्च 2014