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Showing posts from July, 2018

चौपाड़िक यात्रा-कथा

पछिला लगभग पाँच बरखक सक्रीय सामाजिक आ साहित्यिक जीवन मे सब सँ बेसी जे सहयोग केलक ओ अछि फेसबुक। फेसबुके के दुआरे हमरा कैकटा प्रिय  मित्र भेटलाह आ एहि मित्र सबहक सहयोग सँ शुरू भेल साहित्यिक चौपड़िक यात्रा। 

नवल श्री 'पंकज' आ बालमुकुंद पाठक सँ भेंटघाँट आ परिचित भ' मित्रता भेलाक बाद हमरालोकनि विचार भेल जे पटना मे जे आइ-काल्हि हमरा सबहक तूर के युवा लेखक सब सक्रीय छथि तिनका सब सँ परिचय-पात आ भेँट-घाँट कोना हुए आ से नियमित रूप सँ। ताहि हेतु नियार-भास शुरू भेल। लगभग तीन मास तक हम सब विचारिते रहलहुँ। 

मुदा से एक दिन हमरा तीनू के खूब उजाहि उठल। सहमति बनल जे आइ राति सब गोटे संगे रहि एहि मामिला के फाइनल कइये देबैक। ओहि राति त' नहि मुदा परात भेने समयक तय-तमन्ना भेल आ तकरा बाद हमरालोकनि पंकज भायक मैनपुरा स्थित आवास पर साँझखन पहुँचि गेलहुँ। 

करीब 10 बजे सँ भोजन बनब प्रारम्भ भेल आ संगहि आरम्भ भेल एकटा नियमित मासिक बैसार के नियार-भास। खने किछु नाम आ नियम बनय खने किछु। एहि सब घमर्थन मे भोजन बनल आ सब गोटे भोजन क' बैसि गेलहुँ कागत-कलम ल'। हमरा कने सवेरे-सकाल सुतबाक हिस्सक अछि। कतेको ब…

मैथिली गीत

सब भाषा के अप्पन फराक गुण-धर्म होइत छैक। हेबाको चाही। मैथिली के सेहो छैक। मने जे मैथिली मे ततेक ने लालित्य छैक जे एकर सबटा भाषाइ संरचना अपनहिं एकटा गेयधर्मिताक के संग चलय लगैत छैक। मने जे एकरा गीतमय होबय मे कोनो दिकदारी नै होइत छैक। सबसँ बेसी गीते उजियायत एहि मे।

जौँ इतिहासक परिपेक्ष मे देखी त' मैथिली साहित्यक आरंभ आ भकरार होयबा मे सबसँ बेसी योगदान गीतेक छैक। ओना त' 'धूर्त-समागम' सँ शुरू भेल अछि मैथिली साहित्यक इतिहास लेखन। हालांकि अपभ्रंश साहित्य सब सेहो सबटा गीते जकाँ थिक।  आ एहियो नाटक मे गीतक प्रयोग भेल छल मुदा चूंकि ई नाटक छलैक तैं बेसी जनता धरि नै पहुँचि सकलैक। जौँ पहुँचबो करैत त' नाटक जनता बस देखि-खेला सकैत छल। आ दोसर पक्ष जे नाटकक आयोजन निसदिन त' होइत नै छल। वा भइयो नै सकैत छल। तैं निश्चिन्ती मे अपना के एहि बाटे व्यक्त नहि क' सकैत छल तत्कालीन जनमानस।  कहि सकैत छी जे जनताक हिसाबे अकलबेरा रहैक साहित्य मे। 

एहने सन समय मे अएलाह बाबा विद्यापति। आ हुनकर गीत। ऐत्तहि सँ साहित्य के गीत-विधा जनताक कंठ मे आबय लगलैक। मुदा ताहि दिन लोक सब गीत के साहित्यक विधा नही…

पिता जी द्वारा उपहृत कविता

गुंजन जी तेरा जन्मदिन तुझे सालों-साल मुबारक हो
उम्र  तेरी दिन-रात चौगुनी , ये शुभ दिन विस्तारक हो
ध्यान से सुन मेरे 'गुंजन',ये कविता है उपहारों में
इसको तुम उपहार समझ कर,रखना ना गलियारों में
तेरा ये फूलों से जीवन,में हरदम हरियाली रहे
मर्यादा के भीतर तेरे खुशियों की दिवाली रहे
तू बन प्यारा कृष्णा-कन्हैया सबके नयनों का तारा
सुन्दर मति सुज्ञान के बूते बने रहो सबका प्यारा
बढ़ते रहना अपने पथ पर उज्वल निश्छल दिनकर सा
चलते रहना अपनी धुन में सरिता के स्वर अविरल सा
अपने क्रियाकलापों से ना मान घटे परिवारों की
ऐसी कोशिश रहे सदा की बढे कोष सुबिचारों की
अपने प्रियजन घरवालों का पल-पल अनुशासित रहना
अपने सुन्दर आचरणों से सबसे आह्लादित रहना
तेरी शिक्षा वैसी जैसी सूर्य किरण की तेज प्रभा
दृढ वाणी से झंकृत करना चुप हो जाए विद्व-सभा
धन प्रिय होता है धनवानों का और विद्या है विद्वानों का
लेकिन कहता सबसे पूंजी स्वाभिमान इंसानों का
कुछ भी कठिन नहीं है जग में गर सच्ची लगन के साथ बढ़ो
शुरू करो अपनी शिक्षा और उन ग्रंथों के पास रहो
शिक्षा की हो प्राप्ति वैसी जैसे हैं मेरे अरमान
अपनी मिहनत से ये होंगे पूरा कर देंगे भगवान
सच्चा …

उठ मेरी जान…!

आज अहलभोर से ही देख रहा हूँ चहुँओर महिला दिवस की बधाई वाली फेसबुकी तख़्ती लटका लिया गया है ,अधिकांश वैसे मित्रों के द्वारा भी जो व्यक्तिगत जीवन में वो नहीं चाहते या करते हैं जो वो दिखना या दिखाना चाह रहे हैं। ये तख़्ती लटकाकर खुद को प्रगतिशील और स्त्रियों के स्वतंत्रता और सम्मान के लिए खुद को बहुत चिंतित और सेंसिटिव साबित करने का जो एक फैशन चल पडा है वो बड़ी अजीब स्थिति उत्पन्न कर रहा है। वैसे लोग जो बिलकुल भी नहीं चाहते कि महिलाएँ उस दर्जे में आयें जहाँ वो आना चाहती है, उन्होंने भी अपने गले में समाजवादी (महिलाओं के संदर्भ में) तख़्ती डालकर खुद को भागती हुई भीड़ का हिस्सा बना लिया है। मेरी एक मित्र आज मुझे बता रही थी कि “मुझे सबसे ज्यादा गुस्सा तब आता है जब ये पुरुष हमारे स्वतंत्रता की बात करते हैं। ये स्वतंत्रता की बात करना ही साबित करता है कि वे आज भी यही सोचते हैं कि हम आज भी परतंत्र है। जो परतंत्र (हालाँकि उसने ‘गुलाम’ शब्द प्रयोग किया था) है उसे ही न स्वतंत्र होने की जरुरत है, हम लोग तो हैं ही स्वतंत्र।” उसकी ऐसी बाते सुनकर मैं बहुत खुश हुआ। मन तो समझिए की कुलाँचे मारने लगा। एकदम सही बा…