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रोग (कथा) - अजित आजाद

श्री अजित आजाद
-‘चान पर घर बनतै। घरमे लोक रहतै। लोक मुदा कतयसँ आओत? कोना केँ आओत?’ मिसरजी चिन्तामे। यादवजी चिन्तामे। खान साहेब सेहो चिन्तामे। तीनू वैज्ञानिक चिन्तामे।

यादवजी मौन तोड़लनि। कहलनि- ‘लोक आओत धरतीसँ। जेना हमसभ अएलहुँ।’

खान साहेबकेँ सेहो फुरेलनि। कहलनि- ‘लोक आओत यानसँ। जेना हमसभ अएलहुँ।’

मिसरजीमे कोनो हलचल नहि। हुनक चिन्ता नहि कमलनि।

खान साहेब अचरजमे। यादवजी सेहो अचरजमे। दुनू संगे बजलाह- ‘मिसरजी ?’

मिसरजीक भक् टुटलनि। बजलाह- ‘से तँ बुझलहुँ। मुदा पहिने के आओत? के सभ आओत? के बिन परिवारक आओत? के हित-महिम संग आओत?’

खान साहेब फेरीमे। यादवजी सेहो फेरीमे। मिसरजीक कहब उचित! पहिने के आओत? ककर परिवार आओत? आओत कि नहि आओत? एकर समाधान की?

एक बेर फेर मौन। तीनू कात तकैत। समाधान तकबामे अपस्याँत।

कातमे चन्द्रयान ठाढ़ छल। यान-तिरंगा सन छल। तीन रंगक। लाल, उज्जर आ’ हरियर। तीनू रंग तीन खाढ़ीमे। बीचला खाड़ीमे चक्र। जे देखत से कहत,यान भारतक थिक। एहि पर तिरंगा बनल छैक। मुदा तीनू वैज्ञानिक अलग। हिनका सभक पोशाक सफेद। जेबी लग तिरंगा बनल। माथ पर टोपा। टोपासँ तीनूक नाक झँपाएल। तीनूक कान झँपाएल। तीनूक मुह झँपाएल। तखन कोना गप्प करै जाथि! तखन कोना गप्प सुनै जाथि। मुदा तीनू गप्प करैत। तीनू एक-दोसरक गप्प सुनैत। टोपामे मशाीन जे लागल रहैक।

तीनू धरतीक लोक रहथि। मुदा एखन चान पर रहथि। एतय खोज करबाक रहनि। मुदा खोज कोना करितथि? संकट जे आबि गेलनि। विचारक संकट? पहिने के आओत? जँ आओत तँ कोना आओत? परिवारक संग आओत कि एसकरे? भारी अवग्रहमे।

यादवजीक माथ टनकय लगलनि। ओ चाह पीबय चाहलनि। बजलाह- ‘मिसरजी चाह पीब?’

मिसरजी चहक्कर छलाह, कोना नहि पीबतथि? बजलाह- ‘हँ पीब, मुदा चाह हैत तखन ने?’

यादवजी उठलाह। यान परसँ थरमस अनलनि। खोलि केँ देखलनि,चाह रहैक। बजलाह- ‘खान साहेब अहूँ लेब?’

खान साहेबक मूड़ी हीलल-‘नहि।’ हुनका चॉकलेट खेबाक रहनि। ओ जेबीमे हाथ देलनि। जेबीमे बहुत रास रहनि। तीनटा लेलनि। एकटा मिसरजी लेल, एकटा यादवजी लेल आ’ एकटा अपना लेल। ओ मिसरजी दिस तकलनि। मिसरजी हाथमे कप रहनि। ओ यादवजी दिस तकलनि। हुनको हाथमे कप। खान साहेब कहलनि- ‘वाह ! तीनू हमरे भागमे।’ आ’ गपसँ मुहमे ध’ लेलनि।

चाह खतम भए गेलनि। चिन्ता खतम नहि भेलनि। चॉकलेट सेहो खतम। मुदा चिन्ता अनामति। के आओत पहिने? की ओ एसकरे आओत? की ओ परिवारक संग आओत? ओह! तीनू फेर गुमसुम। तीनूक फेर तीन दिशामे टकटकी। कि एकाएक मिसरजी बजलाह- ‘भेटल।’ दूनू गोटे- ‘कहू-कहू, की भेटल समाधान?’

मिसरजी बजलाह- ‘चान पर घर बनतै?’

दूनू- ‘हँ, बनतै।’

‘घरमे लोक रहतै?’

-‘हँ रहतै।’

-‘लोक अओतै धरतीसँ?’

-‘हँ, धरतीसँ।’

मिसरजीक आँखिमे चमकी। हुनक ठोर पर मुसकी। ओ बजलाह-‘बेसी ऐल-फैल कत’?’

यादवजी बजलाह- ‘एत्तहि।’

खान साहेब बजला-‘एत्तहि।’

-‘तखन अपनो सब एत्तहि। पहिने अपने सभ आएब। अपने सभक परिवार आओत। हित-महिम आओत। केहन विचार? कहू केहन विचार?’

यादवजी कहलनि- ‘नीक विचार।’ खान साहेब मुदा चुप्प। हुनक कहब तेसरे छल- ‘अपने सभ पहिने किएक? पहिने आने किएक ने? ई तँ लोभ भेल। लोभ पापक कारण थिक। हम पाप नहि करब। अहूँ सभ नहि करू।’

यादवजी कहलनि- ‘वाह! नीक विचार।’

मिसरजी कहलनि- ‘बड बढि़याँ । हमहूँ सहमत छी। मुदा---।’

-‘मुदा की?’ खान साहेब चौंकलाह।

‘तखन झगड़ा लगले रहत। सभ कहत, हमहीं पहिने। तेँ पहिने अपने सब। बुझलहुँ कि ने।’

‘मिसरजीक कहब उचित’- यादवजी बजलाह। ‘अहूँ मानि जाउ खान। एहिसँ नीक समाधान नहि। मिसरजी सूची बनाउ।’

-‘मुदा सरकार मानत?’ खान साहेब पुछलनि।

-‘मानत किएक ने? किओ तँ रहबे करत। तखन हमहीं किएक ने? हम सभ वैज्ञानिक छी। खोजी दल छी। एतय पानि तकलहुँ। हवा तकलहुँ। जीवन तकलहुँ। मेहनति लागल अछि। घाम बहेलहुँ अछि। एकर इनाम भेटक चाही।’

-‘हँ, हँ, इनाम भेटक चाही’- यादवजी गुम्हरलाह।

-‘अवश्य भेटक चाही इनाम। मुदा पुरा-पूरी चान नहि। चान अपने सभक नहि। एहि पर अनकरो अधिकार छैक’- खान साहेब तामसमे रहथि।

-‘एकदम अनसोहांत नहि। एहि पर सभक अधिकार छै’-यादवजी सहमति देलनि।

मिसरजीकेँ तामस उठलनि। -‘अहूँ ने यादव जी! लगले एमहर, लगले ओमहर। कोनो एक कात रहू।’

-‘हम खान साहेब दिस रहब। चान पर सभक अधिकार।’

-‘ठीक छै। रहू हिनके पाटीमे। सभदिन तँ रहलहुँ धरती पर। आसमान किएक नीक लागत ! भीड़मे रहबाक आदति अछि। ऐल-फैलसँ किएक रहब? हुँह।’ मिसरजी हकमय लगलाह।

यादवजी सोचमे पडि़ गेलाह। मिसरजी कहै तँ छथि ठीके। धरती पर जगह कम। ताहूमे हवा दूषित। पानि दूषित। एतय सभ किछु साफ। कोनहु हड़हड़-खटखट नहि।

एमहर यादवजी सोचमे। ओमहर मिसरजी सोचमे। खान साहेब सेहो सोचमे। एकाएक ओ हँसय लगलाह। यादव जी सेहो हँसय लगलाह। बजलाह- ‘किएक हँसलहुँ खान साहब?’

-‘मिसरजीक बात पर। हिनकर बातमे दम छनि। चलू, हमहूँ सहमत छी। चलू सपरिवार एतहि आबी। मुदा एकटा बात--- !’ -‘की बात?’ मिसरजी, यादवजी दूनू चकित।

-‘अहाँ दूनू गोटे हिन्दू। हम मुसलमान। तीन कूड़ी नहि लागत। हिस्सा लेब आधा-आधा।’

मिसरजी तामसे माहुर। बजलाह- ‘ई नहि चलत।’

यादवजी कोना चुप रहितथि। कहलनि- ‘एकदम नहि चलत। अहाँ सीनियर छी। अहाँ जे कहबµमानब। मुदा ई बात नहि। बखरा हैत तीन ठाम। तीनमे एक हीस हमर।’

-‘से नहि हैत। एकदम नहि हैत’- खान साहेब फनैत कहलनि। ‘हमरा चाही आधा चान।’

मिसरजी तामसे भेर। ओ किछु बजितथि। मुदा तखने---। एकटा आवाज गूजलµ‘थम्हू। झगड़ा नहि करू।’

तीनू वैज्ञानिक चौंकलाह। ई के बाजल? एतय ई चारिम के? एकरा बखरा नहि देबैक।

-‘हम चान छी। धरती माताक उपग्रह।’

सभ चारूभर तकलनि। कतहु केओे नहि।

सभ अवाक्। एनामे की बाजत लोक !

आवाज फेर गूजल - ‘अहाँ सभक स्वागत अछि। एतय अबै जाउ। घर बनबै जाउ। मुदा जाति-पातिक संग नहि। अहाँ सभ धरती बँटलहुँ। भगवान बँटलहुँ। आब चान बाँटब। मुदा चान नहि बाँटय देब।’

तीनूक माथ अवनत। तीनूक आँखिमे पानि।

पहिने मिसरजी बजलाह- ‘हम मिसरजी नहि।’

तखन यादवजी बजलाह- ‘हम यादवजी नहि।’

अन्तमे खान साहेब बजलाह- ‘हम खान साहेब नहि।’

तीनू संग-संग बजलाह- ‘हम सभ हिन्दू नहि छी।

हम सभ मुसलमान नहि छी हम सभ मनुष्य छी, इनसान छी।’

चान हँसय लागल। तीनूक संग नाचय लागल।

एकर किछुए दिनक बाद। चान पर लोक गेल। हेंजक-हेंज लोक गेल। मुदा---। धरतीक रोग नहि गेल। एकहुटा रोग नहि गेल।

-: सम्पर्क :-
श्री अजित आजाद 
विवेकपुरम, मधुबनी 
मोबाइल- 9304349384
ईमेल- lekhakajitazad@gmail.com

साभार- चेतना समितिक त्रैमासिक पत्रिका 'घर-बाहर' (जुलाई-सितम्बर-२०११) सं|

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तीन टा मैथिली कविता - गुंजनश्री

1. रहना नहीं देश वीराना है

मीत !
कोना रहब पार लगैत अछि
ओहि नगर मे जाहि ठामक
सुरुज गछारल हो
मोन झमारल हो
किरण जे अबैत हो चानि पर
गिरहथ विर्त हो
लगेबा लेल ताहि पर
रंग-बिरंगक फिल्टर

झूर-झमान होइत लोक जतय
बाट तकैत हो दिन घुरि अयबाक,
झुझुआन होइत जाइ जतय
सरोकारक अनिवार्य मुदा हेराइत संस्कृति ,
लतखुर्दन कयल जाइत हो जतय
लोकतंत्रक सबटा गुण-धर्म
आ एहि सभ पर
मुस्की छिड़ियबैत हो सिंहासन
भाभाक हँसय ओकर चौदहो देबान,
कमला बलान मे संविधान केँ
दहा देबाक लेल रचल जाइत हो
नित-नव व्यूह,

एहि व्यूहरचनाक ओस्ताज सबहक नगर मे
कतेक दिन बाँचल रहि सकब हम-आहाँ मीत
चलू ने कोनो आन ठाम
जतय दिन
असगन्नी पर ओलरल नितुआन
मैल-कुचैल निरासि देल गेल अंगा सँ फराक
अपन अस्तित्व गढ़बाक व्योंत मे हो
आ राति
नढ़ियाक भूखब सुनबाक अभ्यस्त कानक रकबा सँ
अपना केँ एकात क'
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2. एना किएक करैत छलाह ओ ?
एहि शताब्दीक माथ पर अप्पन समस्त उर्जाक साक्षी राखि अपन आबय बला पीढ़ीक लेल करय चाहैत रहथि ओ एकटा दसखत जकरा देखि कहल जा सकैछ जे ई पुरखा छलाह हमर जे नहि अबडेरलाह कहियो कोनो राजनितिक क्षत-विक्षत नीति केँ
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मिशन भाइसाहेब : दू पड़ाव (संस्मरण) - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

पहिल पड़ाव : छाड़इत निकट नयन बह नीरे
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