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कृष्णमोहन झाक किछु कविता

मिथिलाक मधेपुरा जिलाक जीतपुर गाम मे 1968 ईस्वी मे जनमल कृष्णमोहन झा  दिल्ली विश्वविद्यालय सँ हिन्दी मे एम.ए आ जेएनयू सँ एम.फिल. आ पीएचडी छथि आ सम्प्रति असम विश्विद्यालय, सिलचर मे हिन्दीक प्रोफेसर छथि । हिन्दी मे एकटा कविताक पोथी 'समय को चीरकर' प्रकाशित-प्रसंशित छनि । 'कन्हैया स्मृति सम्मान' आ 'हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार' सँ सम्मानित कृष्णमोहन झा ई मानैत छथि जे हुनकर कोनो कविता कोनो विचारधाराक अनुगमन नै करैत अछि मुदा ओ संगे इहो मानैत छथि जे विचारधाराक भूमिका केँ खारिज करबाक ई तात्पर्य नै जे कविताक नाम पर मूल्यविहीन फोंक पद्याभ्यास केँ प्रस्तावित करी । कृष्णमोहन जीक अनुसार हुनक कविता मनुक्खक स्वाधीनता आ गरिमाक रक्षा लेल प्रयत्नशील अछि । ओ दिन-राति, चलैत-बुलैत, सुतैत-उठैत ओहि 'स्पेस' केँ तकबा आ रचबा लेल बेकल रहैत छथि जाहि ठाम जीवन असंख्य रूप मे क्रियाशील रहैत अछि । मैथिली मे हिनक एकटा कविता संग्रह 'एक टा हेरायल दुनिया' अन्तिका प्रकाशन सँ प्रकाशित छनि । प्रस्तुत पांचो कविता उक्त संग्रहे सँ लेल गेल अछि । इच्छा भेला उत्तर कृष्णमोहन जी सँ jha.krish@yahoo.com पर संपर्क कयल जा सकैत अछि ।


1. अहाँ केँ केओ सोर करैयै

रोज राति मे अहाँ केँ केओ सोर करैयै

सिनेमाक अंतिम शो खत्म भेलाक बाद
जखन लोकबेद घरमुँहाँ बरद जकाँ घुरि जाइत अछि
अपन-अपन ठेकान पर

सोसायटीक चौकीदार
एक बेर आर अपन सीटी बजा क'
पहाड़क स्मृति मे डूबल जखन
बिला जाइत अछि एकटा प्रदत्त अन्हार मे

जखन रातिक परती खेत केँ
अपन सहस्त्र फार सँ चीरैत-फाड़ैत पड़ा जाइत अछि
हकासल-पियासल एकबजिया ट्रेन
बहुत दूर सँ अहाँक नाम ल' क'
केओ सोर करैयै

अहाँ गाढ़ नीन्द मे रहै छी मातल
कि हठात भीजि जाइत अछि सगर देह
आ भलारि जकाँ काँप' लगैत अछि अहाँक प्राण
अहाँ उठि क' बैसै छी
जल पीबै छी
आ जहिना करट बदलि क' कोनो आन ठाम
लगब' चाहै छी अपन ध्यान
कि एकटा करुण-कातर आवाज सुनि क'
फेर ठाढ़ भ' जाइत अछि अहाँक कान

अहाँ सुतै छी आ उठै छी
उठै छी आ सुतै छी
सुतैत-उठैत अपन अनिद्राक मरुथल केँ
एकटा बूढ़ जर्जर ऊँट जकाँ कहुना पार करै छी
राति भरि जपैत भगवानक नाम

मुदा एकटा अनुत्तरित गाम
बेर-बेर अपन नाम आ अपन ठाम बदलि क'
बहुत दूर सँ अहाँ केँ सोर करैयै
•••
अहाँ केँ सोर करैयै
बिढ़नीक छत्ताक ऊपर मे लटकल एकटा डमहा लताम
गुनेसर साहक दुआरि पर ठाढ़ तेतरिक गाछ
आ खलिफाक आड़ाक सिनुरिया आम

अहाँ केँ सोर करैयै
एकटा टुटलहा स्कूल
धूरा पर खसल जेना सुखलहा फूल

अहाँ केँ सोर करैयै
चुबैत घर आ नोनियाँ लागल देबाल
बाट तकैत खड़ाम आ फोटो मे लागल मकराक जाल

अहाँ केँ सोर करैयै गाछ-पात लोकबेद आँगन आ दुआरि
एक आँगुर धँसल आँखि कि टूटल केबाड़ ?

अहाँ केँ सोर करैयै अहीँ सँ छूटल
अहाँक अभिशप्त अंश
खाइत-पिबैत सुतैत-उठैत वैह मारैत अछि दंश

अइ दुनियाँ मे माँगै छै सभ चीज अपन-अपन हिसाब
ओ पाँच घंटाक बाद मांगय कि पचास बरखक बाद


2. फुलडालीक कनेर

जिलेबीक काँट जकाँ
हम अहाँक धानक लाबा सन तरबा मे गड़ि जायब
आ किछु दिन धरि बिसबिसायब

चतुर्थीक औंठी आ बरसाइतक मेंहदी जकाँ
हम अहाँक विकल संसर्ग मे आयब
आ असंख्य सुग्गा बनि
अहाँक मोन मे उड़ियायब

हम त' फूलडालीक कनेर छी
अहाँक लौलसा मे भीजल देवता पर चढ़ब
आ पराते
हजारो-हजार मौलायल फूलक संगे
नहि जानि कोन धार-पोखरि मे विलीन भ' जायब


3. बुद्ध सँ

नहि तथागत
एना नहि भेटैत अछि मुक्ति

अहाँ त' कहियो
दूधक गंध सँ सुवासित चिलकाक
भमरा सन आँखि केँ निहारैत
पल प्रतिपल
अपना केँ पुनर्जन्म लैत देखिये नहि सकलहुँ

अहाँ त'
हाड़तोड़ मेहनतक बाद
रोटी आ पियाउजक अमृत स्वाद सँ अनवगते रहलहुँ
आ आखर मचान पर
निन्नक प्राचीन मदिरा सँ
आचमन कइये नहि सकलहुँ कहियो

कोनो एहन क्षण मे
जखन ई जीवन
जर्जर पलस्तर जकाँ झहरि रहल हो बाहर
आ भीतर एकटा झंझावात उठि रहल हो
तखन कोनो स्त्रीक छाह मे कहियो
कोनो अर्थक संधान करब अहाँ सँ पारे नहि लागल

फेर अहाँ की जान' गेलियै जे की होइ छै मुक्ति


4. बभनगमाबाली भौजीक जीवनक महत्वपूर्ण घटना सभक एकटा संक्षिप्त विवरणिका

आ से ऐहन अहिबाती के हेती
जे बभनगमाबाली भौजीक सोहाग-भाग देखि जरि नै जेती

ओना मानलहुँ
जे हुनका पोथी-पतराक दर्शन नै भेलनि

मानलहुँ जे पाबनि-तिहारे हुनका तेल-कूड़ भेटलनि

मानलहुँ जे चाभीक गुच्छा
ओ कहियो अपन आँचर मे नहि बान्हि सकलीह

इहो मानलहुँ जे लाख कबुलाक बादो
आजीवन ओ दोसर पुत्र-रत्न प्राप्त नहि क' सकलीह

मुदा निस्सन्देह
एकटा भरल-पुरल जीवन केँ छाँटैत-फटकैत
अपन 37 बरखक बयस मे ओ
38289 टा सोहारी पकेलीह
2173 डेकची भात पसेलीह
13000 बेर बरतन-बासन मँजलीह
307 बेर आँगन निपलीह
47 टा साड़ी आ 92 टा ब्लाउज पहिरलीह
275 राति भूखल सुतलीह
हुनका 3 बेर भेटलनि सम्भोगक सुख आ 949 बेर भेलनि बलात्कार
बेटी जनमौलनि 4 टा आ 5 बेर
भेलनि गर्भपात

मुदा ई देखू सभ सँ मार्मिक बात
जे ठीक बरसातिक प्रात
जखन हुनक सीथ रहनि सिनुर सँ कहकह करैत
आ भरल रहनि लहठी सँ हाथ-
तखन अपन स्वामीक आगू
बिना अन्न-जल ग्रहण कयने ओ भ' गेलीह विदा


5. एहेन समय मे अहाँक समाद भेटल

जहिना कटहरक सगर देह
असंख्य काँट सँ छारल रहैत अछि
ठीक ओहिना
नगरक समस्त डगर
अछि पुलिस सँ ठसाठस भरल
आ बैरिकेड सँ गतानल
एखन हँसबाक अर्थ अछि अपराध
आ कनबाक विद्रोह
आ विद्रोहक सजाय मृत्युदंड सुनिश्चित अछि

एहेन समय मे अहाँक समाद भेटल
जे कविता बिना
अहाँक घर अछि बथान बनल
चिनुआर पर ठाँ नहि
चूल्हि मे नहि अछि आगि
लोटा मे पानि नहि
फुलडाली मे नहि रहैत अछि फूल
कविता लेल अहाँ सभ बेकल छी
हाथ-पयर रहितो बनल छी लोथ-नाँगड़-लूल्ह...

तैं
सिंगार-पटार नहि
गाड़ी-ओहार नहि
भाइ-बापक संग नहि--सनेस-भार नहि
बेटी केँ हम
जहिना-तहिना पढ़िये साड़ी मे पठा रहल छी

एहेन समय मे आब केओ
समय पर कतहुँ सँ विदा होअय
आ समय पर पहुँचि जाय
एहि जीवन मे
नहि बचल तकर अवकाश

तैं
राति मे
आकि भिनसराक आसपास
जँ पुबरिया घरक केबाड़ खुलबाक भान होअय
तँ चोर-चोर कहि क' चिकरि नहि उठब

भ' सकैयै
ओसार पर थरथर कँपैत आ घाम मे भिजैत
अहाँक आगू मे बेचारी कविता ठाढ़ हो
एहि बात केँ लगभग प्रमाणित करैत--
जे एहि सभ्यताक चमचम करैत समियाना मे
भाला आ बरछी जखन
मनुक्खक अँतड़ी केँ ताकि रहल हो
मनुक्खक कोनो कला कोनो स्वप्न कोनो कविता
चोरे बनिक' अपन प्राण बचा सकैत अछि

श्री कृष्णमोहन झा

* कृष्णमोहन जीक फोटो हुनकहि फेसबुक वाल सँ लेल गेल अछि ।


Comments

चर्चित पोस्ट

तीन टा मैथिली कविता - गुंजनश्री

1. रहना नहीं देश वीराना है

मीत !
कोना रहब पार लगैत अछि
ओहि नगर मे जाहि ठामक
सुरुज गछारल हो
मोन झमारल हो
किरण जे अबैत हो चानि पर
गिरहथ विर्त हो
लगेबा लेल ताहि पर
रंग-बिरंगक फिल्टर

झूर-झमान होइत लोक जतय
बाट तकैत हो दिन घुरि अयबाक,
झुझुआन होइत जाइ जतय
सरोकारक अनिवार्य मुदा हेराइत संस्कृति ,
लतखुर्दन कयल जाइत हो जतय
लोकतंत्रक सबटा गुण-धर्म
आ एहि सभ पर
मुस्की छिड़ियबैत हो सिंहासन
भाभाक हँसय ओकर चौदहो देबान,
कमला बलान मे संविधान केँ
दहा देबाक लेल रचल जाइत हो
नित-नव व्यूह,

एहि व्यूहरचनाक ओस्ताज सबहक नगर मे
कतेक दिन बाँचल रहि सकब हम-आहाँ मीत
चलू ने कोनो आन ठाम
जतय दिन
असगन्नी पर ओलरल नितुआन
मैल-कुचैल निरासि देल गेल अंगा सँ फराक
अपन अस्तित्व गढ़बाक व्योंत मे हो
आ राति
नढ़ियाक भूखब सुनबाक अभ्यस्त कानक रकबा सँ
अपना केँ एकात क'
चन्द्रमाक आभा मे नहयबाक सूर-सार करैत हो...


2. एना किएक करैत छलाह ओ ?
एहि शताब्दीक माथ पर अप्पन समस्त उर्जाक साक्षी राखि अपन आबय बला पीढ़ीक लेल करय चाहैत रहथि ओ एकटा दसखत जकरा देखि कहल जा सकैछ जे ई पुरखा छलाह हमर जे नहि अबडेरलाह कहियो कोनो राजनितिक क्षत-विक्षत नीति केँ
हुनका आजीवन…

मिशन भाइसाहेब : दू पड़ाव (संस्मरण) - डॉ. कमल मोहन चुन्नू

पहिल पड़ाव : छाड़इत निकट नयन बह नीरे
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कियैक त' ई स्पर्श
सिर्फ ओकरे स्पर्श टा नहि छैक
ई दू शताब्दीक स्पर्श थिकैक
जकरा अंगेजने अछि दादी
अप्पन झूर-झमान भेल लटकल
मुदा दपदप करैत चमड़ी मे

दू शताब्दीक दू टा पीढ़ीक मिलान पर
ठाढ़ हेबा सँ पहिने
ओ रहैक एन-मेन हमरे-आहाँ सन,
ओकरो रहैक मनोरथ
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मुदा बाबा
से नै पुरौलथिन आस,
संग के कहय
अन्तिमों क्षण मे
नहि सामीप्य भेलैक प्राप्त,

आ ताहि दिन सँ दादी
भ' गेल अछि एसगर
मुदा ई बात कहैत नहि छैक ककरो
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